अपना शहर चुनें

States

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: कांग्रेस और वामदल 2016 में जीती हुई सीटें अपने पास रखेंगे

ममता की परेशानी सिर्फ ये पार्टियां ही नहीं हैं, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी भी बंगाल के चुनाव में ताल ठोंकने को तैयार हैं. (News 18 Creative)
ममता की परेशानी सिर्फ ये पार्टियां ही नहीं हैं, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी भी बंगाल के चुनाव में ताल ठोंकने को तैयार हैं. (News 18 Creative)

West Bengal Assembly Polls: कांग्रेस और लेफ्ट के गठबंधन को देखें तो 2016 में उन्हें 37 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे. ममता बनर्जी के पास 44 फीसद से ज्यादा वोट थे. ऐसे में लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन को कम करके आंका जाना जल्दबाजी होगी.

  • Last Updated: January 25, 2021, 11:30 PM IST
  • Share this:
कोलकाता. कांग्रेस (Congress) और वाम दलों (Left) ने सोमवार को फैसला किया कि पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव (West Bengal assembly polls) में 2016 के चुनाव में जीती हुई सीटों को अपने-अपने पास रखेंगे. वाम-कांग्रेस गठबंधन ने 2016 में 77 सीटों पर जीत हासिल की थी. इसमें से कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली थी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘आज हमने फैसला किया कि हम 44 और 33 सीटें अपने-अपने पास रखेंगे जिसपर कांग्रेस और वाम दल को जीत मिली थी. बाकी की 217 सीटों को लेकर चर्चा चल रही है.’’ उन्होंने उम्मीद जतायी कि इस महीने के अंत तक सीट बंटवारा समझौते का काम पूरा हो जाएगा. पश्चिम बंगाल वाम मोर्चा के अध्यक्ष और माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य बिमान बोस ने कहा कि संयुक्त प्रचार अभियान पर भी चर्चा हुई. जिस बैठक में यह फैसला हुआ उसमें बोस भी मौजूद थे. पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए इस साल अप्रैल-मई में चुनाव होने की संभावना है.

2016 विधानसभा चुनाव में अन्य दलों के प्रदर्शन की बात करें तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को 211 सीटों पर जीत मिली थी. बीजेपी को 3 सीटों पर विजय मिली और उसे 10 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल हुआ. 4 सीटों पर अन्य ने कामयाबी पाई. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में बीजेपी (BJP) को 18 सीटें मिलने के बाद माना जा रहा है कि इस बार का विधानसभा चुनाव टीएमसी और बीजेपी के मुख्य रूप से लड़ा जाएगा, लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट के गठबंधन को देखें तो 2016 में उन्हें 37 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे. ममता बनर्जी के पास 44 फीसद से ज्यादा वोट थे. ऐसे में लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन को कम करके आंका जाना जल्दबाजी होगी.





यही वजह है कि ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) अपनी रैलियों में बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस को तीन भाई बता रही हैं. ममता की परेशानी सिर्फ ये पार्टियां ही नहीं हैं, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) भी बंगाल के चुनाव में ताल ठोंकने को तैयार हैं. ओवैसी के साथ ही नई पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी चिंता का विषय साबित हो सकती है. दरअसल पिछले सोमवार को इस नई पार्टी को लॉन्च किया गया है. पूरे देश में मुस्लिमों के पवित्र स्थल फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरज़ादा अब्बास सिद्दीकी ने इस पार्टी को लॉन्‍च किया है. अब्बास सिद्दीकी का कहना है कि उनकी पार्टी मुस्लिमों के साथ ही आदिवासी और दलितों के लिए काम करेगी, लेकिन यह पार्टी भी टीएमसी के मुस्लिम वोटबैंक पर असर डालेगी.

बंगाल में मुस्लिम वोटरों को ममता बनर्जी का आधार वोट माना जाता है और ओवैसी के साथ फुरफुरा शरीफ दरगाह की नजर बंगाल के मुस्लिमों वोटरों को आधार बनाकर राज्य में अपनी सियासत को खड़ा करना है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज