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पश्चिम बंगाल में इस बार के चुनाव में जाति की चर्चा क्‍यों हो रही है...

कोतल दलित आदिवासी महिला थीं. 1985 में उन्‍होंने लोधा शाबर जनजाति से पहली महिला स्नातक बनने का गौरव हासिल किया था. (Pic- News18)

कोतल दलित आदिवासी महिला थीं. 1985 में उन्‍होंने लोधा शाबर जनजाति से पहली महिला स्नातक बनने का गौरव हासिल किया था. (Pic- News18)

West Bengal Elections: पर्यवेक्षकों के अनुसार जाति का अंतर्विरोध हमेशा पश्चिम बंगाल में रहा है. विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य सहित कई कारणों ने इस चुनावी मौसम में जातिगत बहस को मुख्यधारा में ला दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2021, 1:03 PM IST
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मारिया शकील/सुजीत नाथ


नई दिल्‍ली. 'मैं इसे और नहीं सह सकती.' यह बात अगस्‍त 1992 में पश्चिमी मिदनापुर के हॉस्‍टल में सुसाइड करने वाली चुनी कोतल ने आत्‍महत्‍या से कुछ देर पहले अपने परिवार से कही थी. कोतल दलित आदिवासी महिला थीं. 1985 में उन्‍होंने लोधा शाबर जनजाति से पहली महिला स्नातक बनने का गौरव हासिल किया था. उन्‍होंने इसके बाद हॉस्‍टल सुप्रिंटेंडेंट के रूप में नौकरी की थी. लेकिन उनकी समस्‍या का दौर तब शुरू हुआ जब वह विद्यासागर यूनिवर्सिटी से मास्‍टर्स की पढ़ाई कर रही थीं.

उन्‍हें उनकी नीची जाति के लिए अपमान का सामना करना पड़ा था. जो कि भेदभावपूर्ण था और उन्‍हें जातिवादी दासता भी झेलनी पड़ी. कोतल उसे और नहीं सह सकती थीं. उनके भतीजे मृणाल ने बताया, 'वह सिर्फ 27 साल की थीं. वह अपनी जातिगत पहचान के लिए संघर्ष कर रही थीं. यह दुखद घटना थी. उन्‍हें उनकी उच्‍च शिक्षा की पढ़ाई के दौरान अपमान का सामना करना पड़ा था.'
मृणाल ने कोतल चैरिटेबल ट्रस्ट शुरू किया है. यह आदिवासी लोगों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए काम करता है. वह कहते हैं कि कोतल पश्चिम बंगाल में इस तरह के भेदभाव का सामना करने वाली एकमात्र व्यक्ति नहीं थीं. जिसे परंपरागत रूप से जाति का अपनी राजनीति और समाज पर न्यूनतम प्रभाव वाला राज्य माना जाता है.



मृणाल ने बताया कि आदिवासी और निचली जाति के कई समुदाय हैं जो अभी भी भेदभाव का सामना कर रहे हैं. यहां तक कि राजनेता भी हमें वोट बैंक की राजनीति के लिए निशाना बना रहे हैं. कोतल की मृत्यु ने पूरे बंगाल में सदमे की लहरें भेजीं, जिससे राज्य के सामाजिक-राजनीतिक हलकों में गर्म बहस पैदा हुईं, जो 'भद्रलोक (जेंटलमैन)' के प्रभुत्व में थी. सड़कों पर विरोध प्रदर्शन और रैलियां हुईं. लेकिन जैसे ही मुद्दे पर धूल जमी, जातिगत बहस ने एक बार फिर से जोर पकड़ा.

पर्यवेक्षकों के अनुसार जाति का अंतर्विरोध हमेशा पश्चिम बंगाल में रहा है. विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य सहित कई कारणों ने इस चुनावी मौसम में जातिगत बहस को मुख्य धारा में ला दिया है.

जाति या वर्ग
पर्यवेक्षकों के अनुसार वाम मोर्चा ने 1977 से 2011 तक पश्चिम बंगाल पर शासन किया. उसने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए पिछड़े वर्गों को संगठित किया, लेकिन जाति के नाम पर नहीं. साम्यवादियों ने सामाजिक कुलीन और धनी लोगों के खिलाफ निचली जातियों को सशक्त बनाने की कोशिश की, जिन्हें वे वर्ग दुश्मन कहते थे. एक तरह से इस वर्ग के संघर्ष ने बंगाल के विकास और अर्थव्यवस्था पर बाधा डाली. राज्य से कई उद्योग लंबे समय से दूर जा रहे थे. विशेष रूप से श्रमिक संगठनों द्वारा की जाने वाली हड़ताल और विरोध के कारण. इन संगठनों में निचली जाति के लोग हावी थे.

जातिगत राजनीति की शोधकर्ता और कोलकाता की जाधवपुर यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस की पूर्व प्रोफेसर देबी चटर्जी के अनुसार वाम मोर्चा या कुछ हद तक कांग्रेस (जो कि वाम मोर्चे से पहले बंगाल पर शासन करती थी) ने ग्रामीण बंगाल में कुलीनों को उपहास करके जातियां जुटाई थीं. उनकी राजनीति अर्थव्यवस्था पर आधारित थी और हम सभी जानते हैं कि उसके बाद क्या हुआ...श्रमिक संगठनों के मुद्दों और हमलों के कारण.

वामपंथियों ने ग्रामीण दलितों और आदिवासी लोगों को सशक्त किया, जिन्होंने निम्न जाति समूहों को समाज, क्लबों और छोटी गांव समितियों की सामान्य छत के नीचे लाने की कोशिश की. उन्हें कुछ मामलों में निर्णय लेने की शक्तियां भी दी गईं. इस प्रकार वामपंथियों ने लोगों को जातियों के आधार पर अलग किए बिना राजनीतिक लाभ प्राप्त किया.

दशकों से बंगाल में दैनिक समाचार पत्रों के वैवाहिक पेजों ने भारत की इस सांस्कृतिक राजधानी में जाति कारक के बारे में चुपचाप बात की है. चटर्जी ने कहा कि जाति का कारक हमेशा बंगाल में रहा, लेकिन उन्होंने (वामपंथियों ने) सामाजिक रूप से दबे-कुचले लोगों को एक अलग तरीके से संगठित किया. चटर्जी के अनुसार इस मुद्दे पर अब खुलकर चर्चा हो रही है क्योंकि निचली जाति के समूह, विशेष रूप से शिक्षित नई पीढ़ी, अपने अधिकारों के बारे में मुखर हो रहे हैं. यह राजनीतिक पार्टियों को खुले तौर पर उन लोगों को लुभाने के लिए रणनीति बनाने के लिए मजबूर कर रहा है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2011 में बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत करते हुए वामपंथी गढ़ को तोड़ दिया था. उनकी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने मटुआ, राजबांशी, कामतापुरी, गोरखा, संथाल, लोढ़ा शबर, मुंडा, बगदिस और बाउरी जैसे सामाजिक समूहों के समर्थन के साथ सत्ता में वापसी की. उनकी सरकार ने प्रमुख दुआरे सरकार (द्वार पर सरकार) कार्यक्रम के हिस्से के रूप में 18 लाख जाति प्रमाण पत्र वितरित किए हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को इन समूहों के नेताओं का भरपूर सहयोग मिला. इनमें मटुआ नेता बीनापाणी देवी ठाकुर भी शामिल थीं, जिनकी मौत 5 मार्च 2019 को हुई थी.

बहस की शुरुआत
CNN-News18 उत्‍तर 24 परगना जिले के ठाकुरनगर में मटुआ लोगों के मंदिर ठाकुरबाड़ी पहुंचा. वहां पुजारी रोजाना की पूजापाठ के लिए इस्‍तेमाल होने वाली चीजें जुटा रहे थे. बशीरहाट के निवासी स्‍वपन रॉय वहां अपनी बेटी तिषा के साथ तुलसी माला प्राप्‍त करने के लिए इंतजार कर रहे थे. इस चुनाव में तिषा पहली बार वोट डालेगी. वह गौरवांवित मटुआ हैं जो बांग्‍लादेश के दलित रेफ्यूजी हैं और बंगाल में बड़े हिस्‍सेदार नामसूद्र से है. वह चाहती हैं कि केंद्र सरकार जल्‍द से जल्‍द नागरिकता संशोधन एक्‍ट या सीएए को लागू कर दे. यह 2015 से पहले पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान और बांग्‍लादेश से भारत आए हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी लोगों को नागरिकता प्रदान करेगा. तिषा चाहती है कि उसका बंगाल भी विकास करे.

तिषा कहती है, 'मैं मटुआ समुदाय से हूं. मैं इसे लेकर काफी भावुक हूं. मैं सम्‍मान के साथ रहना चाहती हूं. इसलिए हम सीएए का समर्थन कर रहे हैं. दूसरे समुदायों की तरह हम भी समाज में अपना स्‍थान चाहते हैं.'

कोलकाता में इस बार पहली बार वोट डालने जा रहे अनंत गुप्‍ता कहते हैं कि लोग असल में जातिगत कारकों की चर्चा बीजेपी के बढ़ने के साथ ही कर रहे हैं. हम भी इसकी चर्चा करते हैं. लेकिन सीमित तौर पर. मैं मारवाड़ी हूं और बनिया समुदाय से संबंद्ध हूं. लेकिन क्‍या हम जाति की चर्चा दूसरों के लिए भेदभाव के रूप में करें. इसका जवाब 'नहीं' है.

लेकिन सभी उनके विचार से सहमत नहीं हैं. जाधवपुर यनिवर्सिटी की प्रोफेसर मरूना मुर्मू से पूछने पर उन्‍होंने इसके बारे में बताया. मुर्मू आदिवासी हैं. उन्‍होंने पिछले साल कोविड 19 महामारी के कारण यूनिवर्सिटी के फाइनल ईयर और फाइनल टर्म एक्‍जाम को रोकने के फैसले पर सोशल मीडिया को लेकर चिंता व्‍यक्‍त की. उसके बाद जो हुआ वो बुरा सपना था. मुर्मू की अकादमिक साख पर सवाल उठाने वाले कोलकाता के एक छात्र ने उनकी आलोचना की थी. उसने दावा किया था कि उन्हें कोटा प्रणाली के कारण नौकरी मिली और उन्‍हें आदिवासी वंशावली की याद दिलाई गई.

मुर्मू कहती हैं, 'मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे बंगाल में जातिवादी टिप्पणी का सामना करना पड़ेगा. मैंने केवल यह कहा था कि जीवन लंबा है और कोविड-19 के कारण एक साल परीक्षाएं नहीं हुईं तो कुछ नहीं होगा. लोगों ने मूल मुद्दे पर जाने के बजाय मेरी जाति और कोटा के बारे में टिप्पणी करना शुरू कर दिया. मैं एक आदिवासी समुदाय से संबंध रखती हूं और मुझे लगता है कि मुझे आपत्तिजनक टिप्पणी किए बिना करंट अफेयर्स पर अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है.'

सतही अंतर्विरोध
मटुआ समुदाय के जाने-माने नेता और डॉक्‍टर आशीष ठाकुर कहते हैं कि बंगाल में दशकों से निम्न जाति के लोगों के बीच एक अंतर्विरोध रहा है. उन्होंने कहा कि वे सशक्त होना चाहते थे लेकिन ऊंची जाति के लोगों के वर्चस्व वाले समाज में उन्हें मुश्किल हो रही थी.

दक्षिण 24 परगना के पातुली के रहने वाले डॉ. ठाकुर कहते हैं, 'अतीत में हमने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समुदायों के लोगों को सड़कों पर मारते देखा है, लेकिन यह बहुत ध्यान आकर्षित करने में विफल रहा है. 2010 में अन्य निचली जाति समूहों द्वारा समर्थित लगभग 3 लाख मटुआ लोग और शरणार्थी कोलकाता में एस्प्लेनेड में इकट्ठा हुए थे. उनकी मांग थी कि मंडल कमीशन को लागू किया जाए और उनकी बेहतरी की जाए. यह पहली बार था कि बंगाल में जाति कारक खुले तौर पर और प्रमुखता से महसूस किया गया था.'

उनके अनुसार निचली जातियों के लिए राजनीतिक मोर्चे पर सीमित तरीके से बातचीत हुई. दुर्भाग्य से यह कभी भी बंद नहीं हुआ क्योंकि वामपंथी, कांग्रेस, टीएमसी और बीजेपी जैसे राजनीतिक दल कभी ऐसा नहीं चाहते थे...यह दलितों के बीच एकता की कमी और मुख्यधारा के दलों में उनके बीच कुछ वर्गों की निष्ठा के कारण भी था. यही कारण है कि बंगाल में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी जातियों के आधार पर राजनीतिक दल नहीं हैं.

डॉ. ठाकुर का कहना है कि बंगाली इस मुद्दे पर चुप्पी पसंद करते हैं क्योंकि अगर वे कहते हैं कि वे जाति में विश्वास करते हैं, तो वह समाज में प्रगतिशील छवि खो देंगे. उनका कहना है कि लोगों ने जाति से हताशा पर चर्चा शुरू कर दी है क्योंकि मंडल आयोग की सिफारिशों को बंगाल में तार्किक रूप से लागू नहीं किया गया था. अब जब चुनाव है, तो बीजेपी और टीएमसी दोनों ही ओबीसी श्रेणी में कुम्होकर, महिषास, सहस और तेली आदि जातियों को शामिल करने के लिए एक आयोग बनाने का वादा कर रहे हैं. लोगों को राजनेताओं द्वारा जाति में विश्वास करने के लिए बताया जा रहा है.

वह कहते हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर निचली जातियों में भी गहरे विभाजन हैं. एक अमीर आदिवासी परिवार एक ही जाति के गरीब आदमी या महिला को खाने की मेज पर बैठने की अनुमति नहीं देता. यह भेदभाव भी यहां है.

(यह रिपोर्ट अंग्रेजी से अनुवादित है. इसे पूरा पढ़ने के लिए यहां Click करें.)
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