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Lok Sabha Election 2019: पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में कुर्मी वोटर्स पर चढ़ता दिख रहा भगवा रंग

पिछले दो बार से यह सीट बीजेपी के पास है.

पिछले दो बार से यह सीट बीजेपी के पास है.

पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से झाड़ग्राम एक ऐसी सीट है जहां से टीएमसी, बीजेपी और वाम दलों के बीच कड़ी टक्कर है और ये सभी पार्टियां आदिवासी कुर्मी समाज को लुभाने की कोशिश कर रही हैं.

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    इस बार के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में तीनों राजनीतिक ताकतों के भाग्य का फैसला कुर्मी वोट बैंक तय करेगा. ओबीसी समुदाय से आने वाले कृषि प्रधान कुर्मी जाति के लोग इस संसदीय क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं. पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से झाड़ग्राम एक ऐसी सीट है जहां पर टीएमसी, बीजेपी और वाम दलों के बीच त्रिकोणीय टक्कर है. ये सभी पार्टियां आदिवासी कुर्मी समाज को लुभाने की कोशिश कर रही हैं.

    35 से 40 फीसदी कुर्मी वोटर
    कोलकाता से करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित झाड़ग्राम संसदीय क्षेत्र में करीब 35 से 40 फीसदी कुर्मी वोटर हैं. यही वो समुदाय है जिसने 2014 में 42 सालों बाद वाम प्रत्याशी को हराने में ममता बनर्जी की मदद की थी. झाड़ग्राम में 1977 से 2009 तक सीपीएम का दबदबा रहा. लेकिन 2014 में टीएमसी की उमा सोरेन ने सीपीएम के पुलिन बिहारी बस्के को 3,47,883 वोटों से हराकर उनका वर्चस्व खत्म कर दिया.

    टीएमसी से बिरबाहा सोरेन मैदान में
    अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित झाड़ग्राम सीट से इस बार ममता बनर्जी ने बिरबाहा सोरेन को मैदान में उतारा है. दरअसल मौजूदा सांसद उमा सोरेन कुर्मियों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई थीं. कुर्मी वोटरों को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 6 मई को झाड़ग्राम और गोपीबल्लवपुर में दो अलग-अलग जनसभाएं की थीं.

    बीजेपी के पक्ष में लहर?
    1962 से सभी राजनीतिक पार्टियां कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा दिलाने का वादा कर वोट मांगती रही है. कुर्मियों की ये मांग लंबे समय से चली आ रही है. इस बात की ओर इशारा करते हुए कि इस बार हवा बीजेपी के पक्ष में है, पश्चिम बंगाल आदिवासी कुर्मी समाज के सचिव राजेश महतो कहते हैं कि शिमला अधिसूचना 1913 के तहत कुर्मी समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा प्राप्त था. 1931 में उन्हें इस सूची से हटा दिया गया. 1950 में एक नयी सूची तैयार की गई, लेकिन उसमें भी कुर्मियों को अनुसूचित जनजाति में नहीं रखा गया. इस बाबत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को ज्ञापन भी सौंपे गए. लेकिन अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है.



    पंचायत चुनावों में बीजेपी ने फहराया था परचम
    पिछले साल पंचायत चुनावों में बीजेपी झाड़ग्राम में अपने पैर पसारने में कामयाब रही थी. इन चुनावों में पार्टी को करीब 35 फीसदी वोट हासिल हुए थे. सत्ताधारी टीएमसी को करीब 45 फीसदी वोट हासिल हुए थे, लेकिन कुर्मी वोट बैंक के बंट जाने से झाड़ग्राम जिले में वो पिछड़ गई. माओवादियों के वर्चस्व वाले ज्यादातर इलाकों में बीजेपी ने पंचायत चुनाव जीता था जिसमें झाड़ग्राम और लालगढ़ भी शामिल हैं. ये इस बात के संकेत दे रहा है कि कुर्मी समुदाय एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है जो उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा हासिल करने में मदद कर सके. वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो टीएमसी के खिलाफ बीजेपी एक बड़ी ताकत के तौर पर उभरी है.

    मिल पाएगा अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा!
    इस मौके को भुनाने के लिए बीजेपी ने यहां से एक मज़बूत प्रत्याशी, आईआईटी इंजीनियर कुंवर हेमब्रम को मैदान में उतारा है. वहीं सीपीएम से यूट्यूब स्टार देवोलीना हेमब्रम अपनी किस्मत आज़मा रही हैं.  कांग्रेस की तरफ से जोगेश्वर हेमब्रम इस सीट से चुनौती दे रहे हैं. रविवार 12 मई को झाड़ग्राम में वोटिंग का दिन है और ये देखना दिलचस्प होगा कि अनुसूचित जनजाति की उनकी मांग को पूरा करवाने के लिए कुर्मियों का झुकाव किस ओर होगा.

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