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जानिए रामायण के कुंभकर्ण के बारे में आशुतोष राणा ने अपनी किताब में क्या लिखा है

जानिए रामायण के कुंभकर्ण के बारे में आशुतोष राणा ने अपनी किताब में क्या लिखा है

एक्टर आशुतोष राणा ने अपनी किताब रामराज्य में  कुम्भकर्ण पर एक नई स्थापना दी है.

एक्टर आशुतोष राणा ने अपनी किताब रामराज्य में कुम्भकर्ण पर एक नई स्थापना दी है.

कुंभकर्ण को महान वैज्ञानिक मानते हैं फिल्म एक्टर आशुतोष राणा. उनके मुताबिक रावण ने जानबूझ कर उसके छह महीने सोने वाली बात का प्रचार करा रखा था. अपनी नई किताब रामराज्य में आशुतोष ने इस पर क्या कुछ लिखा है पढ़िए

रामायण या अन्य रामकथाओं में कुंभकर्ण बहुत ही रोचक और विचित्र कैरेक्टर है. रावण और विभीषण का सगा भाई होने के बाद भी ये छह महीने सोता है और छह महीने जागता है. इसका आकार-प्रकार ऐसा है कि ये लोगों के मन में बस जाता है. इसकी विचित्रता सबको बांध लेती है. इसके आकार प्रकार को लेकर बहुत सी कथाओं में बहुत तरह की बातें की जाती हैं. लेकिन सबसे अलग बात की है फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा ने. आशुतोष ने अपनी किताब रामराज्य में लिखा है – “रावण इस सत्य को जानता और मानता भी था कि रावण यदि मस्तिष्क है तो कुंभकर्ण उसकी भुजा.”

दोनो भाइयों में बहुत प्रेम था
आशुतोष राणा के इस चिंतन में कहीं कोई शक नहीं है. रामकथा को लेकर प्राचीन साहित्य में भी इसी तरह की व्याख्या मिलती है. दोनों भाई एक दूसरे से बहुत प्रेम करने वाले बताए गए हैं. दोनों बहुत बलशाली बताए गए हैं. रावण के पास दस सिर थे तो कुंभकर्ण भी कम नहीं था. ज्यादातर कथाओं में तो कुंभकर्ण का आकार प्रकार इस तरह का बताया गया है कि दूसरा कोई उसकी बराबरी का नहीं था. बहुत सारे क्षेत्रों में लोक में तो यहां तक कह दिया गया कि लंका में कोई भी 52 हाथ से कम नहीं था. कुंभकर्ण का आकार तो बांसों में नापा गया है.

छह सौ बांस लंबा था?
आशुतोष भी अपनी किताब में लिखते हैं -“जगत में यह किंवदंती व्याप्त हो गई कि कुंभकर्ण की देह छह सौ बांस लंबी और सौ बांस चौड़ी है.” हालांकि किताब में बताया गया है कि एक बांस का मतलब पूरे बांस की लंबाई नहीं बल्कि सवा तीन गज का होता है. हालांकि इस हिसाब से भी छह सौ बांस कोई कम नहीं होता.

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आशुतोष राणा ने रामकथा पर एक पुस्तक लिखी है रामराज्य


आशुतोष राणा का अपना चिंतन
इतना लिखने के बाद भी आशुतोष राणा ने एक ऐसा तर्क दिया है जिससे उनकी किताब की पठनीयता तो बढ़ती ही है, उनकी अपने चिंतन का प्रमाण भी मिलता है. आशुतोष लिखते हैं – “कुंभकर्ण विकट योद्धा ही नहीं, एक महान वैज्ञानिक भी था. रावण के समस्त प्रयोग, वैज्ञानिक सूत्रों आविष्कारों को मूर्त रूप प्रदान करने का कार्य कुंभकर्ण किया करता था. उसके द्वारा किए जा रहे भीषण वैज्ञानिक आविष्कारों को संसार से गुप्त रखने के लिए रावण ने संपूर्ण जगत में प्रचारित कर दिया था कि उसका भाई वर्ष में छह मास निद्रामग्न रहता है. कुंभकर्ण की एकाग्रता अध्ययन, उसकी साधना में कोई किसी प्रकार का कोई व्यवधान न उत्पन्न हो सके इसके लिए रावण ने एक राजाज्ञा भी पारित कर दी थी कि कुंभकर्ण की निद्रा में व्यवधान पहुंचाने वाले व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जाएगा.”

मानव आकार वाले लोहे के विशाल वाहन में था
आशुतोष की किताब में रावण के कहने के बाद जब कुंभकर्ण युद्ध में उतरता है तो वो नगर के द्वार से नहीं निकलता, बल्कि दीवार लांघ कर बाहर निकलता है. आशुतोष लिखते हैं कि दरअसल –“वह मनुष्य जैसे दिखाई देने वाले अपने अत्याधुनिक लौह यंत्र में सवार था. उस यंत्र को देखने पर ऐसा प्रतीत होता था जैसे कोई अत्यंत विशाल पर्वत के आकारवाला लौह मनुष्य धरती पर पैर पटकते हुए चल रहा हो. उसके चलने से धरती में कंपन होता था.” वे ये भी लिखते हैं -“वानर सेना द्वारा चलाए जा रहे शूल, बाण, पत्थर कुंभकर्ण से टकरा कर निष्प्रभावी होकर धरती पर गिर रहे थे. हा राम हा राम की ध्वनि से पूरा रणक्षेत्र गुंजित हो उठा.” गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस में भी कुंभकर्ण के आने पर ऐसा ही युद्ध का वर्णन मिलाता है.

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Tags: Ashutosh rana, Ramayan, Ramcharit Manas

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