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एक कारसेवक की कहानी, जिसका बाबरी विध्वंस देखकर दिल टूट गया

अभिजित देशपांडे

बाबरी विध्वंस की बरसी पर न्यूज18 से खास चर्चा में अभिजित देशपांडे ने बताया कि कैसे 'कारसेवा' के नाम पर उन्माद फैलाया गया.

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    (अक्षय  शितोले)

    तारीख 06 दिसंबर 1992... वक्त सुबह के करीब नौ बजे... बाबरी मस्जिद से थोड़ी दूरी पर कारसेवकों का सैलाब उमड़ रहा था... उसी वक्त भजन और कीर्तन की शुरुआत भी हो गई थी... पूरे इलाके में 'जय श्री राम' की गूंज थी... धीरे-धीरे वक्त गुजरता जा रहा था... 10 बजे के करीब सभी बड़े नेताओं ने मंच पर अपनी आमद दे दी थी... भाषणों में बोली जा रही भड़काऊ बातों से माहौल गरमाने लगा था... 10:30 से 11 बजे के बीच कुछ कारसेवकों ने मस्जिद के गुंबद पर चढ़ना शुरू कर दिया था... नेताओं ने अपने भाषण बंद कर दिए और सभी वहां से निकल गए... भीड़ का उन्माद बढ़ता ही जा रहा था... मैं करीब चार बजे उस जगह पर पहुंच सका, जिसे इतिहास में 'बाबरी मस्जिद' के रूप में याद किया जाता है.

    26 साल पुरानी ये कहानी एक कारसेवक की है... जिसकी अब पहचान 'एक होता कारसेवक' यानी 'एक कारसेवक था' के रूप में होती है... ये पूर्व 'कारसेवक' अभिजित देशपांडे हैं. मुंबई के कॉलेज में प्रोफेसर अभिजित देशपांडे उन लाखों कारसेवकों में एक थे, जिन्होंने राम मंदिर बनाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से अयोध्या के लिए कूच किया था. सपना राम मंदिर बनाने का देखा था, लेकिन विध्वंस देख उनका दिल टूट गया और उन्होंने हमेशा के लिए यह राह छोड़ दी.

    बाबरी विध्वंस की बरसी पर न्यूज18 से खास चर्चा में अभिजित देशपांडे ने बताया कि कैसे 'कारसेवा' के नाम पर उन्माद फैलाया गया और उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि कारसेवा का उद्देश्य धार्मिक न होकर राजनीतिक था. गलत बातों का प्रचार करते हुए वहां मौजूद लोगों को एक तरह से बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए उकसाया गया था. अब आगे की कहानी, अभिजित देशपांडे की जुबानी.

    'नेताओं के भाषणों के साथ ही 'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो' का नारा बुलंद होते जा रहा था. 11 बजे आसपास भीड़ में शामिल लोग अचानक मस्जिद के गुंबद पर चढ़ गए. मुझे कुछ देर के लिए समझ में नहीं आया और फिर मंच पर शामिल नेता एक-एक कर वहां से निकल गए. मस्जिद का गुबंद और वहां हो रही 'कारसेवा' मुझे साफतौर पर नजर आ रही थी, लेकिन वहां पहुंचना लगभग असंभव था. जनसैलाब को पार करते हुए मुझे वहां पहुंचने में शाम के चार बज गए.

    अभिजित बताते हैं, 'बाबरी मस्जिद की जगह पर पहुंचने के बाद मैंने जो देखा, वह हैरान कर देने वाला था. वहां गेती-फावड़े और मलबे को हटाने के लिए तगारी मौजूद थी. सुनियोजित तरीके से वहां विध्वंस का काम चल रहा था और देखने में कतई यह नहीं लग रहा था कि यह सबकुछ अचानक हुआ हो. अंधियारा घिरने के साथ ही सेना की नौ टुकड़ियों ने अयोध्या में मोर्चा संभाल लिया. हम सभी को विशेष ट्रेन के जरिए अपने-अपने घर रवाना कर दिया गया.'

    'ट्रेन से अयोध्या से परभणी तक का सफर बेहद भयावह था. यह सफर तीन दिनों में पूरा हुआ और मैं 9 दिसंबर को घर पहुंच सका. सभी छोटे और बड़े स्टेशन सुनसान थे. हर जगह सड़कों पर भी सन्नाटा छाया हुआ था. उस वक्त प्रचार माध्यम के व्यापक नहीं होने की वजह से पता नहीं चला कि आखिर चल क्या रहा है, लेकिन अहसास जरूर हो गया कि ऐसा कुछ हो रहा है, जिससे पूरा देश हिल गया है.'

    अभिजित उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, 'अयोध्या से लौटने के बाद अजब तरह की बैचेनी थी. पूरे देश से हिंसा और कर्फ्यू की खबरें आ रही थी. मन में यह बात कचोटने लगी थी कि मैं इसके लिए अयोध्या नहीं गया था, जिस विध्वंस को अपनी आंखों से देखा वह सिर्फ एक इमारत के जमींदोज होने तक सीमित नहीं था. वह भले ही एक धर्म से जुड़ा स्थल था, लेकिन हमला सर्व धर्म समभाव पर था.'

    यह बैचेनी और दिल को कचोटने वाली बातें अभिजित को खींचकर मुंबई लेकर आ गई. यहां उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखने के साथ किताबें भी भरपूर पढ़ी और इससे मिले ज्ञान से एक नए अभिजित का उदय हुआ.

    'भारतीय संस्कृति का वृहद इतिहास किताब ने मेरी सोच को पूरी तरह से बदल दिया. धर्म से लगाव कम होता गया और मैंने खुद को भारतीय संस्कृति के करीब पाया. साथ में पढ़ाई जारी रखी, जिससे समाज और समसामयिक मसलों पर मेरी अपनी राय बदलती गई और मैं खुद को बेहतर इंसान के रूप में गढ़ सका.'
    अभिजित देशपांडे ने कारसेवा और उससे जुड़े अनुभव पर एक किताब भी लिखीं, जिसे नाम दिया 'एक होता कारसेवक. इसमें उन्होंने 1989 में परवान चढ़ना शुरू हुए राम मंदिर आंदोलन से लेकर खुद में आए बदलावों को शब्दों में ढाला है. मौजूदा हालत पर वह बस इतना कहते है कि अच्छा इंसान बनने के लिए किसी को धार्मिक कट्टर होने की जरूरत नहीं है. उन्हें लगता है कि अब राम मंदिर का मुद्दा पहले जैसा प्रभावी नहीं ठहरेगा.'

    अभिजित देशपांडे अभी एक निजी कॉलेज में प्रोफसर हैं और साथ में फिल्मों पर गहरी समझ रखने की वजह से वह कई फिल्म फेस्टिवल के ज्यूरी बोर्ड में शामिल है.

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