5 प्वाइंट में जानें क्या है RTI संशोधन बिल और क्यों विपक्ष कर रहा है इसका विरोध?

विपक्षी पार्टियों का कहना है कि अगर सरकार को आरटीआई अफसरों की नियुक्ति और उनकी सैलरी के बारे में फैसला करने का अधिकार दे दिया गया तो आरटीआई अफसरों की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी.

News18Hindi
Updated: July 24, 2019, 11:32 AM IST
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लोकसभा में सोमवार को सूचना का अधिकार विधेयक शोर-शराबे और हंगामे के बीच पारित हो गया. इस दौरान विपक्षी पार्टियों ने इस कानून में किए गए बदलावों को इसे कमजोर करने वाला बताया और इसका विरोध किया. विपक्ष ने मांग की कि इस संशोधन विधेयक को पहले संसद की सलेक्ट कमेटी को भेजा जाए और वहां पर इसकी जांच हो.

विपक्ष का इसे राज्यसभा में रोकने का भी प्लान है, जहां पर सत्ताधारी दल NDA के पास अभी भी बहुमत नहीं है. इसके बाद से इस बिल के बदलावों को लेकर काफी चर्चा है. हम आपको मात्र पांच बिंदुओं में बता रहे हैं कि बिल में क्या बदलाव हुआ है. और इन बदलावों पर क्यों इतना हो-हल्ला मचा हुआ है-

# पहला आरटीआई एक्ट 2005 में आया था और इसने भारतीय नागरिकों को किसी भी मामले में, कार्यपालिका और दूसरे भी संस्थानों से जुड़ी जानकारी मांगे जाने के 30 दिनों के अंदर दिए जाने का अधिकार दिया था. आलोचकों का मानना था कि इसके दो बहुत महत्वपूर्ण नियमों के बदले जाने से, बिल का प्रभाव कम हो जाएगा.

# प्रस्तावित बदलाव में आरटीआई एक्ट के भाग 13 में बदलाव किया जाना है. इसके बाद सरकार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल में बदलाव कर सकेगी. पहले यह 5 साल या 65 वर्ष की उम्र, जो भी पहले हो तब तक के लिए था. इसके अलावा हुए बदलावों में सरकार को उनकी सैलरी, भत्ते और कुछ दूसरे मदों को भी नियंत्रित करने का अधिकार मिल गया है.

# इस बिल के सेक्शन 16 में RTI एक्ट में ऐसे ही बदलाव राज्य स्तर पर लाने की बात भी की गई है.

# विपक्षी पार्टियों ने यह तर्क दिया है कि सरकार को इन अधिकारियों की नौकरी और सैलरी पर अधिकार देने से RTI अधिकारियों की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी. विपक्ष ने इन सुधारों को RTI हटाओ बिल का नाम भी दिया है. उन्होंने दावा किया है कि इससे ईमानदार अफसर भी किसी संवेदनशील जानकारी को जारी करना बंद कर देंगे क्योंकि उन्हें डर रहेगा कि ऐसा करने से उनकी नौकरी और उनकी सैलरी पर बन आएगी.

# सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि मनमोहन सिंह सरकार ने जल्दी-जल्दी में इस कानून को बना दिया था और उन्होंने कई सारे पक्षों पर ध्यान नहीं दिया. सरकार के ये बदलाव इन्हीं गलतियों को सुधारने का प्रयास हैं. सरकार ने कुछ गलतियों का हवाला भी दिया, जैसे कि सरकार ने केंद्रीय सूचना आयुक्त की शक्तियों को लोअर कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है जबकि इसका स्तर सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर माना जाता है. ऐसी चीजों को भी बदलाव में शामिल किया गया है.
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First published: July 23, 2019, 8:00 AM IST
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