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Opinion: क्या है बोडो शांति समझौते की अहमियत

अमित पांडेय | News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 7:59 PM IST
Opinion: क्या है बोडो शांति समझौते की अहमियत
बोडो समूहों के साथ सरकार ने समझौते पर हस्‍ताक्षर किए.

पिछले 4 सालों में बोडो के गुटों के प्रतिनिधि और सरकारी नुमाइंदों के बीच 30 बार बातचीत हो चुकी है.

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  • Last Updated: January 27, 2020, 7:59 PM IST
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असम का बोडो शांति समझौता जोकि गृह मंत्रालय में हुआ वह कई मायने में ऐतिहासिक है. हमनें उन तमाम पहलुओं को खंगालने की कोशिश की. साथ ही उससे जुड़े लोगों से भी बात की. असम के लिए पिछले 50 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि सशस्त्र बोडो संगठनों के नुमाइंदों ने भारत सरकार के पास आकर समझौता किया. हिंसाग्रस्त बोडोलैंड आंदोलन का स्थायी समाधान एक समझौते के तहत संविधान के दायरे में हुआ. इसके बाद उल्फा ही असम में एकमात्र बड़ा संगठन बचा है जिसने हिंसा का रास्ता अख्तियार कर रखा है.

पहले भी बातचीत होगी थी लेकिन आगे नहीं बढ़ पाती थी
ओहन जालू, एनडीएफबी यानी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के जनरल सेक्रेटरी हैं. न्‍यूज 18 इंडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि 2006 से 2013 तक वह हथियार के जरिए संघर्ष कर रहे थे. आए दिन आम नागरिकों पर हमला करना सुरक्षाबलों से लड़ाई करना उनकी रोज की गतिविधियों में शामिल था. लेकिन 2012 में उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया. सरकारी नुमाइंदे उनके पास बातचीत के लिए आने लगे लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि थोड़ी बहुत बातचीत शुरू होने के बावजूद वह आगे नहीं बढ़ पाती.

करीब 7 साल तक तीन वार्ताकारों के जरिए इस बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा लेकिन कभी अंजाम तक नहीं पहुंच पाया. 2019 में एक बार फिर इस बातचीत का दौर शुरू हुआ लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग थे. बातचीत किसी एक गुट से नहीं की गई बल्कि अलग-अलग सारे 6 गुटों से एक साथ की गई. इन छह गुटों में से 4 हिंसा में शामिल थे जबकि दो गुटों ने सामाजिक मंचों के जरिए अपनी मुहिम छेड़ रखी थी. आखिरकार नवंबर 2019 में भारत सरकार, असम सरकार और इन बोडो गुटों के नुमाइंदों के बीच कई बिंदुओं पर सहमति बनी और 27 जनवरी 2020 को ऐतिहासिक समझौता हुआ.

सरकार और बोडो गुटों के बीच 30 बार बातचीत हुई
नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के चेयरमैन रंजन दईमरी ने न्‍यूज 18 से बातचीत में कहा कि पिछले 4 सालों में बोडो के गुटों के प्रतिनिधि और सरकारी नुमाइंदों के बीच 30 बार बातचीत हो चुकी है. तब जाकर यह समझौता हुआ. रंजन को कुछ सालों पहले बांग्लादेश में गिरफ्तार किया गया था. उस वक्‍त वे गुट के चेयरमैन थे. जिसके बाद 3 साल तक वह जेल में थे. फिर वह रिहा हुए लेकिन केस चलता रहा और पिछले साल जनवरी के महीने में उन्हें सजा हुई. फिलहाल वह जेल में अपनी सजा काट रहे हैं और 4 हफ्ते की अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर आए हैं. आज उन्होंने भी इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किया है.

सरकार का दावा- भाषा और संस्‍कृति रहेगी सुरक्षितभारत सरकार भी इस समझौते को लेकर यह दावा कर रही है कि जितने भी इलाके बोडोलैंड में पड़ते हैं, वहां की भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी. इस इलाके के आर्थिक विकास के लिए सरकार ने 1500 करोड़ रुपये का प्रारंभिक बजट बनाया है. इस इलाके के विकास कार्य की निगरानी एक कमेटी करेगी.

कई संगठन कर चुके हैं आत्‍मसमर्पण
पिछले पांच सालों में पूर्वोत्तर में अलग-अलग प्रतिबंधित संगठनों के महत्वपूर्ण सदस्य या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या फिर गिरफ्तार हो चुके हैं. सोमवार को समझौते में शामिल हुए बोडो संगठन असम में सक्रिय अंतिम गुटों में से एक हैं जो हिंसा की वारदात में शामिल थे. इस समझौते के बाद भारत सरकार को उम्मीद है कि एक संवाद और शांति प्रकिया के तहत उपद्रवियों को मुख्य धारा में शामिल करने का सिलसिला शुरू होगा.

पिछले एक महीने में पूर्वोत्तर समस्या से जुड़े तीन बड़े और ऐतिहासिक समझौते भारत सरकार ने किए हैं. त्रिपुरा में 80 से ज्यादा सशस्त्र लोगों का समर्पण, मिजोरम त्रिपुरा के बीच ब्रू-रियांग शरणार्थियों को स्थायी निवास देना और अब बोडो शांति समझौता. इस समझौते के तहत इस गुट के सदस्यों को आर्थिक मदद भी सरकार की तरफ से मुहैया करवाई जाएगी. इसकी मांग ये गुट पिछले कई दिनों से कर रहे हैं.

समझौते से पहले सरकार ने कही थी ये बात
इस समझौते में केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि गृहमंत्री अमित शाह, असम सरकार के प्रतिनिधि राज्‍य के मुख्‍यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडोलैंड के चार गुटों के नेता मौजूद थे. इस समझौते से इन गुटों को अपने इलाके में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का भी मौका मिलेगा. इस समझौते से पहले भारत सरकार ने ये साफ किया है कि असम की एकता बरकरार रहेगी और उसकी सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा. यह समझौता भारतीय संविधान के दायरे में होगा.

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडोलैंड को भारत सरकार ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित किया था. समझौते के बाद न्‍यूज18 इंडिया के सवाल पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अन्य आतंकी संगठनों से भी लगातार मोदी सरकार अपील कर रही है कि वह हथियार छोड़ शांति की प्रक्रिया में शामिल हों. असम के विकास में अपना पूरा सहयोग करें. इसी रणनीति पर मोदी सरकार काम कर रही है. जिसके बाद पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े अधिकारियों का दावा है कि आने वाले दिनों में अन्य कई इस तरीके के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार और संबंधित पक्षों में सहमति बनेगी.

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First published: January 27, 2020, 7:57 PM IST
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