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अभिजीत बनर्जी से पीएम मोदी की मुलाकात के मायने

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: October 22, 2019, 8:54 PM IST
अभिजीत बनर्जी से पीएम मोदी की मुलाकात के मायने
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के आलोचक रहे नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी से पीएम की मुलाक़ात के मायने...

प्रतिभा और सम्मान की राह में विचारधारा को आड़े नहीं आने दे रहे पीएम मोदी

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  • Last Updated: October 22, 2019, 8:54 PM IST
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अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in Economics) हासिल करने वाले अभिजीत बनर्जी (Abhijit Banerjee) ने आज यानी मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) से 7 लोक कल्याण मार्ग जाकर मुलाकात की. इस मुलाकात की तस्वीरें खुद पीएम मोदी ने ट्वीट कर सार्वजनिक कीं. इसके थोड़े समय बाद ही अभिजीत बनर्जी की भी कैमरे के सामने दी गई प्रतिक्रिया सामने आई. पीएम मोदी की तारीफ में शब्दों की कोई कमी नहीं आने दी बनर्जी ने. खुद पीएम के ट्वीट में भी बनर्जी के लिए भरपूर सम्मान था, साथ में उनकी उपलब्धियों पर गर्व का भाव भी.

पीएम का ट्वीट और बनर्जी की टिप्पणी एक बड़े वर्ग को अचंभित करने वाली थी. शायद इस वर्ग को ये लग रहा था कि बनर्जी विचारधारा से वामपंथी हैं और जिनकी शिक्षा जेएनयू जैसे वामपंथियों के गढ़ में हुई है और मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की वो अक्सर आलोचना करते रहते हैं, आखिर पीएम मोदी उन्हें लेकर इतनी गर्मजोशी कैसे दिखाई. या फिर बनर्जी उनकी तारीफ करते क्यों नहीं अघाए! बनर्जी को नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद भी पीएम मोदी का ट्वीट आया था. हालांकि पार्टी के ही कुछ नेताओं का बयान उनकी वामपंथी विचारधारा की बात करते हुए आया और साथ में कांग्रेस की न्याय योजना में उनके योगदान का उल्लेख भी हुआ.

मोदी की पहले भी तारीफ कर चुके हैं बनर्जी, मोदी भी करते हैं सम्मान
जहां तक बनर्जी या फिर पीएम मोदी का सवाल है, दोनों ने एक-दूसरे के प्रति लगातार आदर का भाव बनाए रखा है. नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद से ही नहीं, बल्कि कई वर्ष पहले से. इसका खुलासा खुद बनर्जी ने किया, जब उन्होंने साफतौर पर स्वीकार किया कि वो गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी के कामकाज की काफी सराहना करते रहे हैं. यही नहीं, गुजरात सरकार के साथ उन्होंने तब काम भी किया है, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे.

सवाल ये उठता है कि एक दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी के पिछले दो दशक से सबसे बड़ा चेहरा रहे मोदी आखिर एक घोषित वामपंथी अर्थशास्त्री को अपने साथ कैसे जोड़ पाए या फिर यूं कहें कि जोड़ना क्यों कबूल किया. दरअसल, यही मोदी की खासियत रही है. एक समय के अपने आलोचकों को भी अपने साथ काम करने में मोदी ने कोई हिचक नहीं दिखाई. ऐसे नामों की संख्या काफी बड़ी है.



गुजरात में मोदी ने बनर्जी को साथ जोड़ा था
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जहां तक अभिजीत बनर्जी का सवाल है, मोदी ने बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री उन्हें एक नहीं, दो-दो परियोजनाओं से जोड़ा था. दोनों परियोजनाएं पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या से निजात पाने से जुड़ी थीं. दरअसल, बनर्जी को अपने साथ जोड़ने से पहले ही मोदी जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर काफी सतर्क हो चुके थे. पूरे देश में गुजरात ऐसा पहला राज्य बना था, जिसने दशक भर पहले जलवायु परिवर्तन को लेकर अलग विभाग की रचना की थी. जलवायु परिवर्तन पर्यावरण से जुड़ा हुआ मसला है और प्रदूषण जलवायु परिवर्तन की समस्या का प्रमुख कारण है.



मोदी ने इन्हीं ज्वलंत समस्याओं का हल ढूंढते हुए अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर की भी मदद ली. दोनों ने जिस संस्था J-Pal, जिसका पूरा नाम अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब है, की नींव 2003 में डाली थी, उसी संस्था को गुजरात के सीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी ने इनवार्मेंटल ऑडिट को मजूबत करने और इमिशन ट्रेडिंग स्कीम को लांच करने के लिए जोड़ा.

दस साल पहले शुरू हुई थीं दोनों परियोजना
2009 से 2011 के बीच में इन दोनों परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ. गुजरात सरकार की संस्था गुजरात पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के साथ मिलकर जे-पाल ने काम किया और इस सिलसिले में बनर्जी की पत्नी एस्थर तो बार-बार गुजरात आती रहीं. यहां तक कि औद्योगिक संयंत्रों से प्रदूषण को कम कैसे किया जाए या फिर आम आदमी को इसके लिए कैसे जागरूक किया जाए, इस पर भी काम हुआ. उस समय गुजरात पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सदस्य सचिव रहे हार्दिक शाह के साथ मिलकर एस्थर ने कुछ शोध पत्र भी लिखे, जो पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के मामले में महत्वपूर्ण माने गए.

जिस दूसरी योजना पर अभिजीत बनर्जी की संस्था जे-पाल ने काम किया, वो था इमिशन ट्रेडिंग स्कीम शुरू करने की. ये स्कीम भी किसी इलाके में प्रदूषण कणों की अधिकतम मात्रा को नियंत्रित करने की थी. इसके लिए जरूरी संयंत्र हर औद्योगिक इकाई में लग जाने तक साझा प्रयास से कैसे इसे रोका जाए, इसको लेकर स्कीम बनी. इस योजना में गुजरात पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के साथ जे-पाल संस्था तो थी ही, साथ में जे-पाल के साथ जुड़कर काम करने वाले अमेरिका के मशहूर शैक्षणिक संस्थानों मसलन यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो, एमआईटी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी थे.



इसके तहत हाल ही में पायलट प्रोजेक्ट को गुजरात के दूसरे सबसे बड़े शहर सूरत में सफलतापूर्वक पूरा किया गया है. यहां से हासिल हुए अनुभव के आधार पर राज्य के दूसरे हिस्सों में भी इस योजना को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है. देश में अपनी तरह का ये पहला कदम है. यहां इस तरह की खास इमिशन ट्रेडिंग स्कीम लागू की गई है, जिसका मकसद प्रदूषण कण की मात्रा के एवज में पैसा कमाना नहीं, बल्कि उद्यमियों को आखिरकार प्रदूषण कम करने के उपायों पर गंभीरता से ध्यान देने का है, ताकि वो इस बारे में सतर्क होते हुए प्रदूषण को कम करें.

इस स्कीम से काफी कम हुआ है सूरत में प्रदूषण
इस स्कीम के तहत वो इकाइयां जिन्होंने प्रदूषण कम करने के बेहतरीन साधन लगाए हैं, वो अपनी इकाई के लिए निर्धारित की गई इमिशन यानी उत्सर्जन की अधिकतम मात्रा से कम इमिशन कर क्रेडिट हासिल कर सकती हैं. उस क्रेडिट को उन इकाइयों को बेच सकती हैं, जो फिलहाल इमिशन कम करने में समर्थ होने लायक व्यवस्था नहीं कर पाई हैं. गुजरात पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष राजीव गुप्ता का मानना है कि इस स्कीम के कारण न सिर्फ लोगों में जागरूकता आई है, बल्कि इस अनूठी स्कीम के कारण सूरत शहर में वायु प्रदूषण की मात्रा घटाने में काफी मदद मिली है, जो अपने आप में राहत देने वाली खबर है. इस स्कीम में शहर की पौने दो सौ औद्योगिक इकाइयां फिलहाल भाग ले रही हैं.

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अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अभिजीत बनर्जी, उनकी पत्नी एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर को 'वैश्विक गरीबी खत्म करने के प्रयोग' के उनके शोध के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.


दरअसल, मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए जब इसके बारे में सोचा, उस वक्त देश के ज्यादातर हिस्सों में इस पर बात भी नहीं होती थी. मोदी के काम करने का एक और फॉर्मूला रहा है. किसी भी काम को करने के लिए सर्वाधिक योग्य व्यक्ति या संस्था का चयन करना, ताकि काम तेजी से हो और उसमें कोई कमी नहीं रह जाए. इसी के तहत अभिजीत बनर्जी की संस्था जे-पाल को उन्होंने करीब दस साल पहले गुजरात में अपनी सरकार के साथ जोड़ा. उस समय शायद ही किसी को अंदाजा था कि दशक भर बाद अभिजीत बनर्जी अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए जाएंगे.

नोबेल अवॉर्डी बनने के बाद पूरे देश का ध्यान गया है बनर्जी की तरफ, लेकिन बनर्जी तो मोदी के ध्यान में काफी पहले आ गए थे, जिस तथ्य को खुद बनर्जी ने ही सार्वजनिक किया और मोदी की तारीफ भी की. इस पर मोदी विरोधियों को आश्चर्य हो सकता है, उनके समर्थकों को भी, लेकिन मोदी को करीब से जानने वाले लोगों को अच्छी तरह पता है कि प्रतिभा को पहचानने और फिर उसे उचित सम्मान देने में मोदी ने कभी कोई कमी नहीं की. इस मामले में अभिजीत बनर्जी कोई अकेले नहीं हैं, नंदन नीलेकणि जैसे और उदाहरण भी हैं, जो 2014 में कांग्रेस की तरफ से लोकसभा चुनाव लड़ लेने के बावजूद पिछले पांच वर्षों से पीएम मोदी के साथ मिलकर कई परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं. मोदी का संदेश साफ है, बड़े लक्ष्य हासिल करने में योग्य लोगों का साथ वो बिना हिचक लेने वाले हैं, भले ही राजनीतिक विधारधारा का मेल हो या न हो.

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First published: October 22, 2019, 7:59 PM IST
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