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किस तरह की राजनीति को आगे बढ़ाने वाले हैं सुपरस्टार रजनीकांत?

News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 11:46 AM IST
किस तरह की राजनीति को आगे बढ़ाने वाले हैं सुपरस्टार रजनीकांत?
एक्टर रजनीकांत ने अब तक स्पष्ट संकेत नहीं दिए कि उनकी राजनीति का आधार क्या होगा?

सुपरस्टार रजनीकांत (Rajinikanth) राजनीति में एंट्री तो कर चुके हैं, लेकिन इस बात का उन्होंने कोई स्पष्ट संदेश नहीं दिया कि वो किस विचारधारा के साथ राजनीति करेंगे?

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  • Last Updated: November 28, 2019, 11:46 AM IST
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एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

परदे पर तमाम तरह के किरदारों को अमर करने वाले सुपरस्टार रजनीकांत राजनीति पारी का ऐलान तो कर चुके हैं, लेकिन उनकी राजनीति किस विचारधारा को आगे बढ़ाएगी इसका उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया. रजनीकांत अपनी असल जिंदगी में बेहद शांत और विनम्र रहे हैं, लेकिन जब बात राजनीति की होती है तो वह फिल्मों की तरह बेहद गूढ़ हो जाते हैं. वरिष्ठ पत्रकार एस श्रीनिवासन ने हिंदुस्तान अखबार में लिखे एक लेख में इसका आकलन करने की कोशिश की है.

रजनीकांत ने साल 2016 के आखिर में तमिलनाडु की राजनीति में उतरने का एलान किया था. इसके करीब एक साल बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर कुछ और महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं लेकिन इन घोषणाओं ने लोगों को सीधा संकेत देने की बजाय, उलझन में डाल दिया. एस श्रीनिवासन लिखते हैं कि, 'उस समय रजनीकांत कहा था कि वह वामपंथ और दक्षिणपंथ जैसी राजनीति में यकीन नहीं करते और राज्य की जनता की सेवा अध्यात्मवाद के जरिए करते रहेंगे. राजनीतिक विश्लेषक इस बात की समीझा कर ही रहे थे कि एक साल बाद रजनीकांत की राजनीति क्या होगी, 2019 के आम चुनाव में डीएमके ने कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर राज्य की 39 में से 38 सीटें जीतकर इतिहास लिख दिया.

श्रीनिवासन कहते हैं कि, रजनीकांत लोकसभा चुनाव के मैदान में नहीं उतरे, लेकिन उन्होंने यह संकेत जरूर दिया कि 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. साल 2014 के आम चुनाव में तमिलनाडु में कोई भी लहर न पैदा कर सकने वाली भाजपा को 2019 के आम चुनाव में भी एक बार फिर मायूस होना पड़ा. यानी दक्षिण का किला भेदने के लिए BJP के पास आज भी कोई शस्त्र नहीं है.


सुपरस्टार रजनीकांत ने साल 2016 में राजनीति में आने का ऐलान किया था.


रजनीकांत को समझने के लिए श्रीनिवासन ने उनकी एक फिल्म का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि, अपनी लोकप्रिय तमिल फिल्म पादयप्पा में रजनीकांत पादयप्पा नाम के एक शहरी इंजीनियर के किरदार में हैं, जो अपने गृहनगर आया हुआ है. वहां पादयप्पा की एक के बाद एक कई सारी भिड़ंत अपनी बेहद अहंकारी ममेरी बहन नीलांबरी से होती है, जो हाल ही में अमेरिका से लौटी है. नीलांबरी पादयप्पा को चाहती है और उसे अपने प्रेमजाल में फंसाने के लिए तमाम कोशिशें करती है, मगर पादयप्पा उसके प्रेम-प्रस्ताव को ठुकरा देता है. इन दोनों की भिड़ंत अक्सर पादयप्पा के इस डायलॉग के साथ खत्म होती है कि ‘मेरा रास्ता सबसे जुदा है.'

श्रीनिवासन मानते हैं कि, भाजपा तमिलनाडु में एक बड़े नेता की बेसब्री से तलाश कर रही है. इस उम्मीद से कि रजनीकांत पार्टी में आ जाएंगे, वह अपने प्रदेश अध्यक्ष टी आई सुंदरराजन को पहले ही पड़ोसी प्रांत में गवर्नर बनाकर भेज चुकी है. आरएसएस विचारक एस गुरुमूर्ति लगातार रजनीकांत को समझाने में जुटे हैं कि वह भाजपा में शामिल हो जाएं. रजनीकांत शुरू से ही भाजपा की पहली पसंद हैं. BJP जानती है कि रजनीकांत में करिश्मा भी है. लेकिन भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस हिंदुत्व की राजनीति करते हैं, उसे आगे बढ़ाते हैं, उसमें और रजनीकांत की सोच में एक खास अंतर है. उनके समर्थकों का कहना है कि रजनीकांत भले ही हिंदुत्व के प्रति आकर्षण रखते हैं, और उनकी आस्था गुरुओं व मंदिरों में है, लेकिन वह राजनीति में धर्म को घसीटे जाने के कतई समर्थक नहीं. बल्कि वह धर्म के आध्यात्मिक पहलू को आगे करने के प्रति ज्यादा उत्सुक दिखाई पड़ते हैं.
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वैसे आपको याद होगा कि अपनी चेन्नई यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रजनीकांत से मुलाकात की थी. गोवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया और ये सीधे-सीधे रजनीकांत के प्रति भाजपा का प्रेम दिखाता है. श्रीनिवासन कहते हैं कि ऐसा नहीं कि रजनीकांत ने इन प्रेम-संदेशों का कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक का स्वागत किया. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के एक दिन बाद चेन्नई में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने न सिर्फ सरकार के इस कदम की सराहना की, बल्कि उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को भगवान कृष्ण-अर्जुन की जोड़ी तक बता डाला. गृह मंत्री अमित शाह भी उस कार्यक्रम में मौजूद थे. लेकिन इन सबका यह मतलब ये कतई नहीं है कि रजनीकांत हिंदुत्व की राजनीति करने या भाजपा से गलबहियां करने को तैयार बैठे हैं.


अभी हाल ही में बिना किसी का नाम लिए उन्होंने कहा कि कुछ लोग उन्हें भगवा रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं, मगर वह उनके दांव में नहीं फंसने वाले. यह सही है कि रजनीकांत का झुकाव भाजपा की तरफ रहा है, लेकिन वह खुल्लम-खुल्ला उससे गठजोड़ करने या उसमें शामिल होने में असहजता महसूस करते हैं, क्योंकि वह शायद तमिलनाडु में भगवा पार्टी की सीमाओं को बखूबी जानते हैं. एक वैचारिक धारा है, जो यह मानती है कि जे जयललिता और एम करुणानिधि के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक शून्य की स्थिति है. इन दोनों दिग्गजों ने दशकों तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक के जरिए राज्य में अपना दबदबा कायम रखा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: November 28, 2019, 11:46 AM IST
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