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अयोध्या में अब क्या : इन शर्तों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को दिया है विवादित जमीन का स्वामित्व

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 7:09 PM IST
अयोध्या में अब क्या : इन शर्तों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को दिया है विवादित जमीन का स्वामित्व
अयोध्या में राम मंदिर के प्रस्तावित ढांचे को देखते श्रद्धालु (फोटो क्रेडिट-रॉयटर्स)

देवता रामलला (Ram Lalla) को विवादित जमीन (Disputed Land) देते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा है कि तीन महीने के अंदर इस जमीन (जहां हिंदू मानते हैं कि भगवान राम का जन्म हुआ था) पर मंदिर के निर्माण के लिए एक ट्रस्ट (Trust) बनाया जाना चाहिए.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 7:09 PM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के शनिवार को 5-0 के सर्वमत से फैसला दिया है कि अयोध्या (Ayodhya) की 2.77 एकड़ विवादित (Disputed Land) जमीन को राम मंदिर (Ram Mandir) के निर्माण के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए एक ट्रस्ट को दे दिया जाना चाहिए.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई (Chief Justice Ranjan Gogoi) की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया है कि हिंदुओं को कुछ शर्तों के साथ भूमि दी जाएगी और केंद्र को एक नई मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ प्लॉट वैकल्पिक जमीन (Alternative 5-acre Land) देने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक यह मस्जिद उत्तर प्रदेश के किसी प्रमुख स्थान पर या फिर 1993 में विवादित भूमि के चारों ओर की अधिग्रहित (Acquired) 67 एकड़ जमीन पर वैकल्पिक जमीन देने की बात कही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह जमीन अवैध तरीके से बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) को तोड़ने के 'बदले' में दी जाएगी.

'हिंदुओं का विश्वास गैर-विवादित, विध्वंस किए गए ढांचे में हुआ था भगवान राम का जन्म'
देवता रामलला (Ram Lalla) को विवादित जमीन सौंपते हुए, कोर्ट ने कहा है कि जहां बहुत से हिंदू मानते हैं कि भगवान राम का जन्म हुआ था, उस जमीन पर मंदिर के निर्माण के लिए तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि इसके साथ ही साथ मस्जिद के निर्माण के लिए जमीन का आवंटन किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने अपने 1,045 पन्नों के फैसले (1,045-Page Verdict) में राजनीतिक तौर पर संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद केस में कहा है, "हिंदुओं का विश्वास कि भगवान राम का जन्म विध्वंस किए गए ढांचे में हुआ था, यह गैर-विवादित है." यह केस जिसने देश के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ा और इसकी राजनीति पर छाया रही.



फिलहाल केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा जमीन का कब्जा
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बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) का निर्माण 16वीं शताब्दी में हुआ था और यह 6 दिसंबर, 1992 तक विवादित जमीन पर खड़ी रही जब तक हिंदू भीड़ ने उसे तोड़ नही दिया. इस विध्वंस से सांप्रदायिक दंगे भड़के.

बेंच जिसमें जस्टिस एस.ए. बोबड़े, डी.वाई. चंद्रचूड़ (DY Chandrachud), अशोक भूषण और एस. अब्दुल नजीर भी शामिल थे, ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन का अधिकार देवता रामलला को दे दिया है, जो कि इस मामले में तीन पक्षकारों में से एक थे. हालांकि अभी कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास ही रहेगा.

फैसले में कहा गया है, हम इस विचार को मानते हैं कि केंद्र सरकार को एक ट्रस्ट या कोई दूसरा उपयुक्त तंत्र (Appropriate Mechanism) बनाने का आदेश देना जरूरी है, जिसे जमीन सौंपी जा सके.

कोर्ट ने कहा, सरकार को इसके लिए योजना तैयार करनी चाहिए. उसे इस ट्रस्ट या बॉडी के मैनेजमेंट से जुड़े मुद्दों के साथ ही इसके कामकाज के लिए भी जरूरी प्रावधान बनाने चाहिए, यह भी तय किया जाना चाहिए कि ट्रस्टियों के पास मंदिर के निर्माण (Construction of a Temple) और दूसरे आवश्यक, आकस्मिक और पूरक मुद्दों से निपटने के लिए कितनी शक्तियां होनी चाहिए.

'निर्मोही अखाड़ा के सदस्य हो सकते हैं ट्रस्ट में शामिल'
केंद्र सरकार ने कहा है कि विवादित स्थल (Disputed Site) के चारों ओर की 67 एकड़ जमीन को भी योजना के संदर्भ में प्रबंधन और विकास के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट को दिया जा सकता है.

हालांकि कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा को, जिसे 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) से एक-तिहाई जमीन पर अधिकार मिला था के बारे में माना कि केस में उनका दावा करने या प्रबंधकीय हक मांगने का अधिकार नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह निर्देश दिया कि हिंदू तपस्वियों के एक गुट अखाड़े को भी भूमि में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा और इसके सदस्यों को (मंदिर निर्माण के लिए) बनाए जाने वाले ट्रस्ट में जोड़ा जा सकता है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल 14 अपीलों पर आया फैसला
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर दाखिल की गई 14 अपीलों पर दिया गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला 4 दीवानी मुकदमों में लिया गया था कि अयोध्या की 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhara) और रामलला के बीच बराबर-बराबर बांट दिया जाए.

देवता रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन (C S Vaidyanathan) ने कहा, ''फैसला बहुत ही संतुलित है और यह लोगों की जीत है.'' लेकिन सुन्नी वक्फ बोर्ड, जो कि इसमें एक पक्ष था, ने कहा है कि वह फैसले से संतुष्ट नहीं है और इसके रिव्यू की मांग कर सकता है. हालांकि बाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी रिव्यू की अपील न करने की बात कही है.

यह भी पढ़ें : विवादित भूमि पर राम मंदिर, मस्जिद के लिए दूसरी जमीन-10 बिंदुओं में समझें फैसला

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First published: November 9, 2019, 5:53 PM IST
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