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केरल में महामारी की रोकथाम के लिए क्या करे सरकार, दो विशेषज्ञों की मानें तो...

केरल कोविड संक्रमण के बढ़ते मामलों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है.  (प्रतीकात्‍मक चित्र )

केरल कोविड संक्रमण के बढ़ते मामलों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. (प्रतीकात्‍मक चित्र )

कोविड संक्रमण (Coronavirus Infection) के बढ़ते मामलों को लेकर केरल (Kerala) ने भारत की चिंता बढ़ा दी है, भारत में रोजाना आने वाले मामलों में से दो तिहाई यहां से आ रहे हैं. और इसी राज्य का पॉजिटिविटी रेट (Positivity Rate) सबसे ज्यादा है. इस महामारी (Pandemic) से निजात पाने का क्या समाधान हो सकता है और क्या तरीके हो सकते हैं?

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    (चंद्रकांत लहारिया और राजीव जयदेवन)

    कोविड संक्रमण (Coronavirus Infection) के बढ़ते मामलों को लेकर केरल (Kerala) ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. भारत में रोजाना आने वाले मामलों में से दो तिहाई यहां से आ रहे हैं और देश में इसी राज्य का पॉजिटिविटी रेट (Positivity Rate) सबसे ज्यादा है. लेकिन हमारा उद्देश्य यहां केरल के आंकड़ों से ज्यादा इस बात पर है कि इस महामारी (Pandemic) से निजात पाने का क्या समाधान हो सकता है और क्या तरीके हो सकते हैं? सबसे पहले संक्रमण को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से माइक्रो कंटेनमेंट और अनलॉक (corona unlock) रणनीति बनाने की ज़रूरत है. इसके लिए स्थानीय महामारी विज्ञान के मानकों का पालन करने की ज़रूरत है. सीमित अवधि में रात का कर्फ्यू, सप्ताहंत में लॉक़डाउन और दुकानों के खुलने के घंटों को कम करना, वास्तव में इससे भीड़ कम होने का आभास मात्र होता है और इससे बचना चाहिए. इसके बजाए व्यापार पूर्व महामारी की अवधि तक बाजार खोलने के घंटों को बढ़ाकर व्यापार को बढ़ाया जा सकता है और इससे भीड़ भी कम होगी. घर के अंदर की भीड़ बाहर से ज्यादा खतरनाक हो सकती है. और ऐसी पाबंदियों का प्रमुख वैज्ञानिक आधार इसे ही बनाना चाहिए.

    महामारी के दौरान हमेशा पाया गया है कि देश का कोई हिस्सा हो या दुनियाभर में लंबे त्योहारों के मौसम में मामलों में तेजी से वृद्धि होती है. इसलिए राज्यों को त्योहारों के आस पास अचानक छूट देने से बचना चाहिए, बल्कि इसकी जगह धीरे धीरे छूट दी जाए तो इससे अचानक भीड़ बढ़ने का खतरा कम हो जाएगा. ऐसे किसी भी आयोजन पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए जहां ज्यादा भीड़ एकत्रित होने का डर हो, जैसे राजनीतिक, व्यापारिक, मनोरंजन, सामाजिक या धार्मिक. ऐसा तब तक किया जाना चाहिए जब तक मामलों में उल्लेखनीय स्तर पर कमी ना हो जाए. राज्य सरकार को पाबंदी के लिए सख्त रवैया अपनाना चाहिए जो स्थानीय डाटा की समीक्षा के आधार पर वैज्ञानिक आधार पर तैयार किया गया हो. इसके साथ ही ऐसी गतिविधि की पहचान की जानी चाहिए जिससे ज्यादा खतरा होने की आशंका हो. बगैर समीक्षा के एक ही गलती का बार-बार दोहराव होता है.

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    दूसरा, समुदाय के सदस्यों, स्थानीय निकायों और नगरीय सामाजिक संस्थाओं की महामारी की रोकथाम में सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए. मसलन जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है, उन्हें खुद ही सार्वजिक कार्यक्रमों और भीड़ में शामिल होने से बचना चाहिए, भले ही कार्यक्रम खुली जगह पर चल रहा हो. इसी तरह से जिन्हें आंशिक वैक्सीन लगी है, उन्हें बंद स्थलों में होने वाले कार्यक्रमों में जाने से बचना चाहिए. हां वो खुली जगह पर होने वाले कार्यक्रमों में शरीक हो सकते हैं क्योंकि इसमें उनसे या उनको खतरा कम है. नागरिकों के शामिल हो जाने से किसी भी कार्यक्रम की सफलता, सरकारी अनिवार्यता से ज्यादा हो सकती है. सामुदायिक और स्थानीय चयनित प्रतिनिधियों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम कोविड से जुड़े तौर तरीकों को अपनाने में कोताही नहीं बरती जाए.

    तीसरा, महामारी के प्रबंधन में संचार बहुत अहमियत रखता है. सही संचार की कमी की वजह से विकसित देशों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा है. महामारी से जुड़ा ज्ञान तब तक किसी काम का नहीं है जब तक सार्वजनिक संदेशों और क्रियान्वयन के स्तर पर इसे लागू नहीं किया जाता है. कोविड से बचाव के उचित तौर तरीकों के लिए संचार के अनूठे तरीकों और अभियान को लगातार विकसित किया जाना चाहिए. अन्य तरीकों जैसे मुफ्त मास्क वितरण, मास्क सही तरह से पहनने का तरीका, जैसी बातों को लगातार बताया जाना चाहिए. संचार सामग्री और रणनीति के लिए पेशेवर संस्थाओं का सहयोग लिया जाना चाहिए.

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    चौथा, केरल में टीकाकरण की रफ्तार में और गति लाने की ज़रूरत है. जैसा कि केंद्र सरकार ने वादा किया है कि जिस राज्य को जितनी वैक्सीन की जरूरत है, मुहैया कराई जाएगी. राज्यों को इस मौके का फायदा उठाते हुए व्यापक स्तर पर टीकाकरण अभियान करना चाहिए. इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीका लग सके, कम से कम एक डोज तो सभी को लगाया जाना चाहिए. टीकाकरण में आने वाली बाधाओं को हटाया जाना ज़रूरी है जिससे टीकाकरण कार्यक्रम आसानी से निपट सके. वैक्सीन को लेकर लोगों में जो हिचक है उसे दूर करने के लिए हस्तक्षेप किया जाना चाहिए.

    वैक्सीन लगाने पर कुछ तोहफा या प्रलोभन देकर भी टीकाकरण के कार्यक्रमों में वृद्धि लाई जा सकती है, खासकर इससे उस कमजोर तबके में वैक्सीन को लेकर स्वीकार्यता बढ़ेगी जहां टीकाकरण के अभाव में मृत्यु का खतरा ज्यादा है. पांचवां, जीनोमिक निगरानी पर ध्यान दिया जाना चाहिए और महामारी पर वैक्सीन के असर की विविधता का अध्ययन भी होना चाहिए. केरल जीनोमिक निगरानी के मामले में कई राज्यों से बेहतर कर रहा है. इसके बावजूद भी जीनोमिक सीक्वेंसिग को और बढ़ाया जाना चाहिए. डाटा का नियमित आकलन करके सूचना का प्रभावशाली तरीके प्रसारित करना चाहिए. जीनोमिक निगरानी डाटा को क्लीनिकिल परिणामों और अध्ययन से जोड़ना चाहिए.

    इसके साथ ही, अग्रणी शैक्षणिक संस्थानों के व्यापक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञता का उपयोग महामारी अध्ययन के लिए किया जाना चाहिए. महामारी से जुड़े शोध, जिसमें आबादी पर टीके के असर का अध्ययन, इसके साथ ही विपरीत असर और विभिन्न उपचारों का असर का भी नियमित तौर पर आकलन किया जाना चाहिए. और प्राप्त डाटा को डॉक्टरों के साथ साझा किया जाना चाहिए.


    हफ्ते और महीने भर की योजना पहले से तैयार हो
    हालांकि ये केरल में स्कूल खोले जाने का उचित समय नहीं है. लेकिन फिर भी स्कूलों के दोबारा खोले जाने से जुड़ी नीति को विशेषज्ञों के साथ पहले से ही तैयार कर लिया जाना चाहिए. साथ ही शिक्षकों का अनिवार्य टीकाकरण होना चाहिए ताकि बच्चों को भी सुरक्षा मिल सके. जैसा की विदित है कि कोविड का वायरस बंद जगह में, जहां उचित हवा का प्रवाह नहीं हो, वहां मुख्यतौर पर फैलता है, ऐसे में इस तरह के स्थलों को ठीक करके कोविड से बचाव के अनुरूप बनाया जाना चाहिए.

    स्कूल की जांच विशेषज्ञों से करवाई जानी चाहिए ताकि उसमें उचित संशोधन किया जा सके और सही तरह से हवा का प्रवाह बना रहे. इस तरह से पहले से तैयारी करके वर्तमान में फैल रहे संक्रमण को कम करते हुए स्कूलों को आसानी से खोला जा सकता है. हमें अब जो भी योजना बनानी चाहिए उसे लंबा वक्त के लिए बनाना चाहिए. दफ्तर और काम की जगह को सुरक्षित बनाना चाहिए ताकि हवा में वायरस के फैलने का खतरा कम से कम हो. केरल सरकार को लगातार ऐसी आबादी का आकलन करते रहना चाहिए जो कमजोर तबके से है और जहां पर कोविड का असर सबसे ज्यादा होता है. यही नहीं आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को भी सख्त पाबंदियों के साथ सुरक्षित करने की ज़रूरत है. ताकि उनके जीवन के साथ कोई समझौता नहीं हो..

    कोविड के बाद और लॉन्ग कोविड क्लीनिक और सेवाओं को बढ़ाये जाने की ज़रूरत है. इन सेवाओं को स्वास्थ्य सेवा केंद्रों के जरिए सार्वजनिक स्तर पर पहुंचाया जा सकता है. इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. खासकर बच्चे जो अपनी बात ठीक तरह से ऱख नहीं सकते हैं. आने वाले कुछ हफ्ते बहुत अहम केरल महामारी के बचाव के लिए बेहतर काम कर रहा है. इससे ये साबित होता है कि अब तक यहां का स्वास्थ्य तंत्र बहुत ज्यादा दबाव में नहीं आया है. कोविड-19 से होने वाली मौत के कम आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं. लेकिन आने वाला वक्त केरल के लिए बहुत अहम है. केरल के पास ये मौका है कि वो साबित कर सके कि वो आगे भी बेहतर कर सकता है. लेकिन इसके लिए उसे वैज्ञानिक और साक्ष्य आधारित तरीके को अपनाना होगा.

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