डीएमके अध्यक्ष के तौर पर स्टालिन के हमलावर रुख के मायने!

डीएमके अध्यक्ष के तौर पर स्टालिन के हमलावर रुख के मायने!
एम के स्टालिन, डीएमके अध्यक्ष

स्टालिन ने डीएमके को बीजेपी विरोधी अभियान के लिए तैयार तो कर दिया, लेकिन वैचारिक धरातल को 2019 के लिए मजबूत चुनावी गठजोड़ में बदलना बड़ी चुनौती

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 29, 2018, 9:00 PM IST
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वीरराघव टीएम

अगर किसी को इसमें कोई शक था कि 2019 में डीएमके किस डगर पर चल कर चुनावी मैदान उतरेगी तो पार्टी के अध्यक्ष एम के स्टालिन ने स्थिति साफ कर दी है.अपने पिता एम करुणानिधि के निधन के बाद 28 अगस्त को पद संभालने के बाद डीएमके अध्यक्ष के तौर पर पहले भाषण में उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों पर जोरदार हमले किए. उन्होंने द्रविड़ आंदोलन के मूल आधार ‘बराबरी, सामाजिक न्याय, और तार्किक सोच’, को ‘तानाशाही और सांप्रदायिकता’ के जोर खत्म करने के आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार की भी खिंचाई की.

स्टालिन ने सत्ताधारी एआईडीएमके को भी नहीं बख्शा और उसे ‘रीढ़हीन और भ्रष्ट’ बताया. 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए उनके संबोधन का लब्बो-लुआब ये है कि वे केंद्र सरकार का विरोध करेंगे, ताकि सेक्यूलरिज्म की हिफाजत की जा सके. इसे इस रूप में समझना चाहिए कि वे डीएमके को उस धर्मनिरपेक्ष गठबंधन से रिटायर कर रहे हैं, कांग्रेस जिसका जरूरी हिस्सा रही है.



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नई दिल्ली में शासन करने वालों के विरोध में ये कोई राजनीतिक भाषण भर नहीं है. दरअसल ये एक वैचारिक और नैतिक पोजिशन लेने जैसा है. सबका निचोड़ ऐसी छवि तैयार करना और उसे स्थापित करना है कि डीएमके द्रविड़ वैचारिक मूल्यों की संरक्षक है, जबकि बीजेपी और हिंदुत्ववादी सोच, छह दशकों से तमिलनाडु की राजनीति परिभाषित करने वाली विचारधारा के लिए एक खतरा है.

इसके अलावा अपने भाषण में स्टालिन ने ये भी संकेत दिए कि एआईडीएमके के पास बिल्कुल आत्म सम्मान नहीं है और उसने केंद्र के सामने घुटने टेक दिए. इस तरीके से उन्होंने एक ऐसी स्थिति पैदा करने की कोशिश की कि डीएमके ही द्रविड़ विरासत की अकेली संरक्षक है और चुनावी संदर्भ में कहा जाए तो तमिल गौरव और आत्म-सम्मान की भी संरक्षक है.

स्टालिन के आरोप इस पृष्ठभूमि में मजबूती पा जाते हैं कि 2016 में जे. जयललिता के गुजर जाने के बाद से एआईडीएमके के पास कोई ताकतवर नेतृत्व ही नहीं रह गया. एक धारणा ये भी बन गई है कि राज्य में मुख्यमंत्री इ.पलनीस्वामी की अगुवाई वाले सत्ताधारी एआईडीएमके ने केंद्र के आगे तकरीबन पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं.

इससे कोई भी ये निष्कर्ष निकाल सकता है कि स्टालिन की वैचारिक स्थिति तमिलनाडु में धर्मनिरपेक्षता की छतरी तले राजनीतिक दलों के गठबंधन बनाने में मददगार होने और अगुवाई करने वाले की है. इससे ये भी समझ में आता है कि डीएमके स्वीकार कर चुकी है कि अकेले राज्य या फिर राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव में उतरना खतरनाक हो सकता है. गठबंधन जरूरी है.

उनके पिता एम करुणानिधि गठबंधन बनाने के मास्टर थे. लेकिन डीएमके में 2016 के विधान सभा चुनाव में ही एक तरह से स्टालिन के नियंत्रण में चली गई थी. नतीजा ये हुआ कि पार्टी सत्ता नहीं हासिल कर सकी. इससे भी गठबंधन की जरूरत की जान पड़ती है.

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वैसे तो पार्टी और परिवार पर स्टालिन की पकड़ मजबूत है, लेकिन एक गठबंधन के नेता के तौर पर उभर पाने की उनकी क्षमता अभी साबित होनी है. वैचारिक पोजिशन लेने का मकसद ये संदेश देना है कि राज्य में गठबंधन के वे नेता हो सकते हैं. उन्हें गठबंधन इसलिए चाहिए ताकि वे अपने पिता की तरह उस नंबर  को हासिल कर सके, जो 2004 में मिला था. जिसमें डीएमके की अगुवाई वाली गठबंधन को 39 सीटें मिली थी. तब कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को सत्ता दिलाने में डीएमके ने निर्णायक भूमिका निभाई थी.

पुडुचेरी के साथ 40 सीटों वाला तमिलनाडु अपने आप केंद्र में किसी गठबंधन के लिए निर्णायक होता है. ये भी एक तथ्य है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार को स्पष्ट बहुमत मिलने से द्रविड़ पार्टियों की दिल्ली में बहुत कम सुनी जाती है.

दरअसल, जिस तरह से स्टालिन ने अपने आप को राज्य में सबसे ताकतवर नेता के तौर पर प्रोजेक्ट किया है, उस पर प्रेक्षक दलील दे सकते हैं, कि पार्टी का नियंत्रण दिए जाने के बाद, वे पार्टी से बड़े हो गये हैं. वास्तव में उनका भाषण आत्मविश्वास से लबरेज नेता का भाषण है, ना कि किसी ऐसे नेता का जो किसी तरह की असुरक्षा महसूस कर रहा हो.

उनको विरासत सौंपे जाने का विरोध करने वाले उनके बड़े भाई और पूर्व केंद्रीय मंत्री एम के अलगिरि को उनके परिवार ने एक साफ संकेत दे दिया कि स्टालिन जमीन और पार्टी से जुड़े नेता हैं. साथ ही उनके पिता के उन बयानों को भी गिना दिया कि करुणानिधि ने स्टालिन को ही अपना वारिस बनाने की बातें कई मौकों पर कही थी.

डीएमके संगठन में बहुत पकड़ न होने के कारण एमके अलगिरि फिलहाल तो स्टालिन के लिए कोई खतरा नहीं है. इस स्थिति में स्टालिन पार्टी के नेता के तौर पूरी ताकत के साथ दिख रहे हैं. दरअसल, उन्होंने अपने भाषण में उस वक्त आत्मविश्वास भी दिखाया और द्रविड़ विचारधारा को गहरे तक छू लिया जब उन्होंने कहा– “हम नास्तिक हो सकते हैं, लेकिन हम उन लोगों की आस्था का सम्मान करते हैं जो ईश्वर की पूजा में विश्वास करते हैं.”

करुणानिधि का ये बेटा पार्टी के लिए पूरी ताकत के साथ उगते सूरज की उभरा है, लेकिन उनकी चुनौती उनका पहला असाधारण भाषण ही है. जिस भाषण में उन्होंने अकेले एक ऐसा गठबंधन तैयार करने की बात कही है जो डीएमके को 2019 में जीत दिला सके और फिर 2021 के विधान सभा चुनावों में भी.
वही उनकी असली परीक्षा होगी. उन्हें न सिर्फ अपने राजनीतिक विरोधियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पछाड़ना होगा, बल्कि तमिल सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हसन से भी निपटना होगा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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