क्या लिखें, क्या न लिखें... हिंदी लेखन में इस सवाल का कैसे मिलेगा जवाब

हिंदी (Hindi) के व्याकरण को लेकर या उसकी शुद्धता को लेकर शास्त्रीय चिंतन एक अलग और जरूरी मुद्दा तो है पर यह तय है कि हिंदी को बचाने और बनाने का काम महज इसका व्याकरण बना और बचा लेने से मुमकिन नहीं है.

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Updated: September 14, 2019, 10:32 AM IST
क्या लिखें, क्या न लिखें... हिंदी लेखन में इस सवाल का कैसे मिलेगा जवाब
दूसरी भाषाओं से हिंदी में आए शब्दों को लेकर भी यह ऊहापोह दिखती है.
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Updated: September 14, 2019, 10:32 AM IST
(अनुराग अन्वेषी)

नई दिल्ली. हिंदी (Hindi) पर क्या वाकई कोई संकट है? क्या यह संकट वही है जो हिंदी दिवस (Hindi Day) के मौके पर हम जताते रहे हैं? अमूमन इसकी वर्तनी में आ रहे दोष या इसके व्याकरण को लेकर हम चिंतित होते रहे हैं. हिंदी शब्दों के इस्तेमाल में एकरूपता न होने को भी हिंदी के शुचितावादी कोसते रहे हैं.

इस कोसने को वह रेखांकित करते हुए व्यक्तिवाचक संज्ञाओं को उदाहरण बनाते हैं. वह बताते हैं कि कहीं रफाल छपा दिखता है तो कहीं राफेल. आर्क बिशप लिखें या आर्च बिशप. ये तो विदेशी नाम हुए. भारतीय टीम के पूर्व कप्तान और दिग्गज क्रिकेटर माही के नाम को लेकर भी यह संकट दिखता रहा है कि धोनी लिखा जाए या धौनी.

दूसरी भाषाओं से हिंदी में आए शब्दों को लेकर भी यह ऊहापोह दिखती है. मसलन परदा हो या पर्दा, चरचा हो या चर्चा, तसवीर हो या तस्वीर, मुसलिम हो या मुस्लिम, इनसान लिखें या इंसान, इतमीनान लिखें या इत्मिनान.

कुछ लोग मानते हैं कि उर्दू के नुक्ते का इस्तेमाल हिंदी में भी होना चाहिए. यानी गजल लिखने के बजाए ग़ज़ल लिखा जाना चाहिए. नुक्ते के पक्षधर लोग खुद ही ग़ज़ल के बहुवचन रूप ग़ज़लात को ग़ज़लें लिखते हुए तर्क देते हैं कि हमने इसका हिंदीकरण किया. अगर हम नुक्ते का इस्तेमाल करते हुए किसी शब्द का हिंदी संस्कार करते हैं तो कई बार अर्थ का अनर्थ हो सकता है. अगर फारसी के ताज़ा शब्द को हम नुक्ते के साथ ही किसी स्त्रीलिंग शब्द से पहले विशेषण के तौर पर इस्तेमाल करें तो हमें ताज़ी लिखना होगा. मसलन, ताज़ा चाय नहीं, ताज़ी चाय. और तब गड़बड़ी यह होगी कि फारसी में ताज़ा का अर्थ है - हरा-भरा, जो सूखा या मुरझाया हुआ न हो. फारसी में ताज़ी एक दूसरा शब्द भी है जिसका अर्थ है – अरबी घोड़ा, शिकारी कुत्ता.

हिंदी में नुक्ते की जरूरत नहीं
ऐसे में मध्यमार्ग यह हो सकता है कि अन्य भाषाओं से हम हू-ब-हू शब्द लेने की जगह उन शब्दों का हिंदीकरण करें. हिंदी में नुक्ते का इस्तेमाल न करने से कोई हर्ज नहीं. और अगर नुक्ते का इस्तेमाल करते हैं तो कभी अनजाने में हम से खुदा जुदा (नुक्ते के हेरफेर से खुदा जुदा हो जाता है) में भी बदल सकता है. हिंदीकरण की कोशिश में अफसोसनाक का अफसोसजनक हो जाना थोड़ा खेदजनक लगता है.
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ऐसे असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे जहां हिंदी में एकरूपता नहीं दिखती. तो क्या यही है हिंदी का संकट? क्या कभी हिंदी में एकरूपता की कल्पना साकार हो सकती है?

हिंदी के प्रति युवा पीढ़ी की औसत रुचि या कह लें उसकी उदासीनता असल संकट है
हिंदी के प्रति युवा पीढ़ी की औसत रुचि या कह लें उसकी उदासीनता असल संकट है


ऐसे सवालों के जवाब पाणिनी के इस मत से मिलता है कि भाषा लोक प्रचलन की अनुगामिनी होती है. इसी क्रम में ध्यान आती है वह लोकोक्ति जो बताती है कि पानी और भाषा के स्वाद चंद कोसों में बदल जाते हैं.

सच है कि वर्तनी, व्याकरण या एकरूपता हिंदी की असली समस्या नहीं है. असल संकट है कि हिंदी को अब भी हम रोटी और रोजगार की भाषा नहीं बना पाए. उसे सत्ता और बाजार की भाषा नहीं बना पाए.

हिंदी के प्रति युवा पीढ़ी की औसत रुचि या कह लें उसकी उदासीनता असल संकट है. हिंदी के प्रति उदासीनता की वजह यह नहीं कि यह पीढ़ी अंग्रेजी माध्यमों से पढ़ कर निकल रही है. दरअसल, इस पीढ़ी का भाव-संसार ही अब अंग्रेजी होता जा रहा है. उसे संगीत भी अब अंग्रेजी के भाते हैं, वह उपन्यास पढ़ना चाहती है तो अंग्रेजी में ही. वह लिखना चाहती है तो अंग्रेजी में ही.

अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी में लेखन बेहद कम
यह पीढ़ी देख रही है कि रोटी और रोजगार के बेहतर और ज्यादातर अवसर अंग्रेजी से जुड़े हैं, हिंदी से नहीं. विज्ञान की बेहतर किताबें अंग्रेजी में उपलब्ध हैं, हिंदी में नहीं. तकनीकी विषयों पर अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी में लेखन बेहद कम हो रहा है. हिंदी में इन विषयों पर जो लेखन है, उसकी भाषा इतनी दुरूह रहती है कि समझने के लिए फिर हमें अंग्रेजी की ओर जाना पड़ता है.

हाल के दिनों में गौर करें तो अपने देश के अंग्रेजी अखबारों में हिंदी के शब्दों के इस्तेमाल का प्रचलन बड़ी तेजी से बढ़ा है. दरअसल, हर भाषा इस वक्त उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. उनमें अकुलाहट है खुद को सत्ता और बाजार की भाषा के तौर पर बनाए रखने की.

हिंदी को बाजार और रोजगार की भाषा बनाना होगा
हिंदी के व्याकरण को लेकर या उसकी शुद्धता को लेकर शास्त्रीय चिंतन एक अलग और जरूरी मुद्दा तो है पर यह तय है कि हिंदी को बचाने और बनाने का काम महज इसका व्याकरण बना और बचा लेने से मुमकिन नहीं है. हमें हर हाल में इसे बाजार और रोजगार की भाषा बनाना होगा. आने वाली पीढ़ी के भाव-संसार हिंदी में रचने के लिए अगर अभी हम से सरल और तरल भाषा नहीं गढ़ सके तब हिंदी का गढ़ छितरा सकता है.

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First published: September 13, 2019, 5:14 PM IST
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