OPINION: गांधी के बिना नहीं चलेगा कांग्रेस का काम, आखिर क्या होगा अगले 6 महीने के लिए राहुल का प्लान?

OPINION: गांधी के बिना नहीं चलेगा कांग्रेस का काम, आखिर क्या होगा अगले 6 महीने के लिए राहुल का प्लान?
देखा जाए तो पिछले एक साल से राहुल गांधी इस्तीफा देने के बाद भी कांग्रेस पार्टी के वास्तविक बॉस रहे हैं. (PTI)

देखा जाए तो पिछले एक साल से राहुल गांधी (Rahul Gandhi) इस्तीफा देने के बाद भी कांग्रेस (Congress) पार्टी के वास्तविक बॉस रहे हैं. उन्होंने लगभग सभी फैसले लिए हैं, जो एक अध्यक्ष को लेने चाहिए. इस बार वर्किंग कमिटी की मीटिंग में जब सदस्यों ने 'राहुल लाओ, कांग्रेस बचाओ' का नारा दिया, तो भी राहुल गांधी ने चुप्पी साधे रखी. इससे स्पष्ट है कि उन्होंने अपने विकल्प खुले रखे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 26, 2020, 12:21 PM IST
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(कल्याणी शंकर)

कांग्रेस की नीति निर्धारित करने वाली सर्वोच्च इकाई कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee) की बैठक में 23 नेताओं की चिट्ठी को लेकर मचे घमासान के बाद पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की भूमिका क्या होगी? क्या वह एक वास्तविक अध्यक्ष बनेगे या लो प्रोफाइल भूमिका ही निभाएंगे? दरअसल, 23 असंतुष्ट कांग्रेस नेताओं द्वारा पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को लिखी गई चिट्ठी को लेकर इतनी अटकलें लगाई गई थीं कि मीटिंग में बाकी मुद्दों को छोड़कर बस इसी पर बहस हो गई. हालांकि, बैठक में असंतुष्ट नेताओं ने पार्टी से जुड़े कुछ मुद्दे जरूर उठाए थे, लेकिन यह सोनिया गांधी के अध्यक्ष के रूप में बने रहने के अनुरोध के सर्वसम्मति से पारित होने के साथ ही समाप्त हो गया. सोनिया गांधी ने अपनी ओर से पार्टी संगठन में एकता की जरूरत पर जोर दिया और असंतुष्टों के प्रति 'माफी और भूल जाने' का रवैया भी दिखाया.

देखा जाए तो पिछले एक साल से राहुल गांधी इस्तीफा देने के बाद भी कांग्रेस पार्टी के वास्तविक बॉस रहे हैं. उन्होंने लगभग सभी फैसले लिए हैं, जो एक अध्यक्ष को लेने चाहिए. इस बार वर्किंग कमिटी की मीटिंग में जब सदस्यों ने 'राहुल लाओ, कांग्रेस बचाओ' का नारा दिया, तो भी राहुल गांधी ने चुप्पी साधे रखी. इससे स्पष्ट है कि उन्होंने अपने विकल्प खुले रखे हैं.



देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर इस बार भी वंशवाद बरकरार रहा. हालांकि, CWC ने ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (AICC) के पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग पर भी विचार करना शुरू कर दिया है. इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी को अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के लिए राजी किया जाएगा और उनके पास कोई चुनौती नहीं होगी. यहां तक ​​कि सोनिया गांधी को भी चुनौती मिली, क्योंकि जितेंद्र प्रसाद ने उनके खिलाफ अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा और हार गए.

वैसे राहुल गांधी को इस मामले में अपनी मां सोनिया गांधी का पूरा समर्थन हासिल है. किसी भी मां के लिए अपने बेटे से उसके सफल होने की उम्मीद करना सामान्य बात है. इंदिरा गांधी भी इससे अछूती नहीं रहीं. उन्होंने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को तैयार किया था, लेकिन उनकी असामयिक मौत के बाद उन्होंने बड़े बेटे राजीव गांधी पर निर्भर रहना शुरू कर दिया, जिन्होंने राजनीति में आने के लिए पहले से कोई झुकाव नहीं दिखाया था. इसी तरह सोनिया गांधी चाहती हैं कि उनका बेटा सफल हो, लेकिन दुविधा ये है कि बेटा बिना जिम्मेदारी के पार्टी में शक्तिशाली होना चाहता है.

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ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि आने वाले महीनों में राहुल गांधी क्या करेंगे? संकेत हैं कि वह चुनाव लड़ सकते हैं और पार्टी अध्यक्ष बन सकते हैं. ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सत्र तक वह अपनी मां को सलाह देने के लिए पीछे की भूमिका भी निभा सकते हैं. CWC मीटिंग के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि पूरी पार्टी चाहती थी कि राहुल पार्टी नेतृत्व करे. इससे ये साफ समझा जा सकता है कि खुद राहुल गांधी ने अपने लिए विकल्प अभी भी खुले हैं.


इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर राहुल गांधी निर्वाचित अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालेंगे, तो उन्हें पार्टी के भीतर मजबूत किया जाएगा. वह अपनी वंशानुगत ताकत के बजाय नैतिक अधिकार के साथ अपनी टीम चुन सकते हैं. वह चाहें तो पार्टी में सुधार कर सकते हैं. इसमें सिर्फ एक चीज यह है कि उन्हें सही काम के लिए सही आदमी चुनना चाहिए. ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे उनके करीबी सहयोगियों के बीजेपी में शामिल होने के बाद राहुल ने अब तक जो टीम बनाई है, वह कमजोर हो गई है. जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा और अन्य सीनियर नेता पार्टी हाईकमान से असंतुष्ट हैं और दूसरे विकल्पों की तलाश में हैं. वास्तव में असंतुष्ट पुराने नेताओं की बजाय ये 'टीम राहुल' था, जो टूट गया.

राहुल गांधी अगर बतौर अध्यक्ष अपने दूसरे कार्यकाल में सफल होना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी मां सोनिया गांधी से दो बातें सीखनी चाहिए. मिसाल के तौर पर, जब सोनिया गांधी 1998 में राजनीति में आई थीं, तब वह अनुभवहीन थीं. हिंदी में पारंगत नहीं थीं. लेकिन, सोनिया गांधी ने खुद को पार्टी की जरूरतों के हिसाब से ढाल लिया. कड़ी मेहनत के साथ वह विपक्ष की पहली नेता बनीं. इसके बाद साल 2004 में वह यूपीए के गठन के लिए सबकी पसंद बनीं. सोनिया एक यथास्थितिवादी थीं और अपने हमेशा अपने सीनियर नेताओं से सलाह लेने के बाद ही कोई निर्णय लिया.

दूसरी ओर राहुल गांधी को एक घमंडी स्वभाव के रूप में देखा जाता है. वह वरिष्ठ नेताओं से कम से कम संबंध रखते हैं. राहुल के मीडिया के सामने अपनी ही पार्टी का बिल फाड़ने और मनमोहन सिंह को अपमानित करने का वाकया भला कौन भूल सकता है. राहुल ने कई अन्य वरिष्ठ नेताओं का अपमान किया है. अहम मुद्दों पर उन्होंने पार्टी के सीनियर और अनुभवी नेताओं से सलाह-मशवरा करना जरूरी नहीं समझा. इसके विरोध में सीनियर नेताओं ने भी राहुल को अकेला छोड़ दिया. CWC इन सीनियर असंतुष्ट नेताओं द्वारा व्यक्त की गई भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती, क्योंकि इन नताओं ने दिखाया है कि पार्टी को बदलने की जरूरत है और उन्हें कई मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.


ऐसे में साफ है कि अब राहुल गांधी को वरिष्ठ नेताओं के प्रति अधिक विनम्र होना पड़ेगा. ऐसा करने के लिए उन्हें अपने स्वभाव को भी बदलना होगा. वास्तव में राहुल गांधी को अपनी टीम में बदलाव करना होगी. उन्हें अनुभव और जोश के तालमेल के साथ नई टीम बनानी होगी. क्योंकि कहा जाता है कि एक मूर्ख राजा भी सफल हो सकता है, अगर उसके पास बुद्धिमान सलाहकार हों. इंदिरा गांधी की सफलता का एक राज यह था कि उनके पास हक्सर जैसे बुद्धिमान सलाहकार थे.

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असंतुष्टों द्वारा पत्र लिखने के बाद गांधी परिवार को निश्चित रूप से झटका लगा, जो राहुल और उनकी टीम पर सीधा हमला था. ऐसे में देखना होगा कि क्या राहुल पार्टी में बस बॉस बने रहेंगे या अपनी कार्यशैली में बदलाव करेंगे. क्योंकि कांग्रेस गांधी परिवार को दरकिनार नहीं कर सकती और सोनिया गांधी राहुल गांधी को किसी भी हालत में दरकिनार नहीं करेंगी.

(Disclaimer: लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
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