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'आंतकियों के खिलाफ ऑपरेशन में बकरवालों ने की थी सेना की मदद'

'आंतकियों के खिलाफ ऑपरेशन में बकरवालों ने की थी सेना की मदद'

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

9 फरवरी, 2001 आतंकियों के एक झुंड ने जम्मू के राजौरी जिले के कोट चरवाल में तीन झोपड़ियों को घेर कर हथगोले से उड़ा दिया. जिसमें 7 बच्चों समेत 15 लोगों की जान चली गई. मारे गए सभी लोगों का ताल्लुक बकरवाल समुदाय से था.

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    लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा

    9 फरवरी, 2001 आतंकियों के एक झुंड ने जम्मू के राजौरी जिले के कोट चरवाल में तीन झोपड़ियों को घेर कर हथगोले से उड़ा दिया. जिसमें 7 बच्चों समेत 15 लोगों की जान चली गई. मारे गए सभी लोगों का ताल्लुक बकरवाल समुदाय से था. इस नरसंहार का कारण गुज्जर-बकरवाल समुदाय द्वारा बनाया गया ऑल-मुस्लिम विलेज डिफेंस कमेटी (मुस्लिम ग्राम रक्षा समिति-वीडीसी) थी, जिसका गठन दिसंबर, 2000 में किया गया था.

    कश्मीर में आतंकवाद सन 1989 में शुरू हुआ, लेकिन पहले तीन सालों तक जम्मू क्षेत्र को इससे काफी हद बचा रहा. जम्मू में पहला बड़ा आतंकवादी हमला 1993 में हुआ, जब डोडा जिले में 17 हिंदुओं को बस से निकाल कर गोली मार दी गई. 1994 और 1995 में लगातार हुए बम धमाकों ने जम्मू शहर को हिलाकर रख दिया, और इससे यह साफ हो गया कि आतंकी विशेष रूप से हिंदु समुदाय के लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं.

    1996 तक, आतंकवाद मुस्लिम-बाहुल्य वाले पुंछ और राजौरी जैसे सीमावर्ती जिलों में फैल गया था. इन दोनों जिलों में मुस्लिम गुज्जर और बकरवाल समुदाय के लोग ज्यादा हैं. 'आज़ादी' पाने की चाह में गुज्जर और बकरवालों ने उन आतंकवादियों को नए सैनिक और गाइड प्रदान किए जो पाकिस्तान से घुसपैठ कर रहे थे और इन क्षेत्रों में अपना बेस तैयार कर रहे थे.

    हालांकि, पाकिस्तानी आतंकवादियों की कट्टरपंथी विचारधारा बकरवालों की संस्कृति से नहीं मिल पाई. इन समुदायों के लोग आतंकवादियों के दिन ब दिन बढ़ती हरकतों से परेशान हो गए, जिसमें मुस्लिम लड़कियों का यौन शोषण और हत्या शामिल था. इससे परेशान होकर कोट चरवाल के ग्रामीणों ने दिसंबर, 2000 में मुस्लिम ग्राम रक्षा समिति (ऑल मुस्लिम विलेज डिफेंस कमेटी-वीडीसी) का निर्माण किया, जिससे नाराज होकर आतंकियों ने कोट चरवाल गांव पर हमला कर दिया.

    9 फरवरी, 2001 आतंकियों के एक झुंड ने जम्मू के राजौरी जिले के कोट चरवाल में तीन झोपड़ियों को घेर कर हथगोले से उड़ा दिया. जिसमें 7 बच्चों समेत 15 लोगों की जान चली गई. मारे गए सभी लोगों का ताल्लुक बकरवाल समुदाय से था.

    इस नरसंहार के बाद गुज्जर और बकरवाल समुदाय के और ज्यादा लोग आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जुड़े. सऊदी अरब में रहने वाले मर्राह गांव के ताहिर फजल चौधरी ने अपने घर वालों के साथ आतंकवादियों के हिंसा की दास्तान सुनकर सन 2002 में अपने साथ काम कर रहे लोगों के साथ गांव आने का फैसला किया. पाकिस्तानी आतंकियों ने पीर पंजाल में अपना डेरा बनाया था. हिल काका के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र से आतंकियों को भगाने के लिए सेना ने 2003 में एक ऑपरेशन की शुरुआत की, जिसका नाम ऑपरेशन सर्प विनाश रखा गया.

    ताहिर फजल और उनकी तरह ही मर्राह और कुलली गांव के दूसरे लोगों की मदद की वजह से ऑपरेशन सर्प विनाश को जबरदस्त कामयाबी मिली. इन लोगों ने सेना को खुफिया जानकारी दी और उनके साथ मिलकर आतंकियों के खिलाफ लड़ाई भी लडी. हालांकि उन्हें इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी.

    करीब एक साल बाद कुछ आतंकवादी हिल काका के ऊपरी हिस्सी में स्थित गांव तेली काठा में घुस आए और ऑपरेशन 'सर्प विनाश' में सेना की मदद करने वाले लोगों के परिवारवालों को गोलियों से भून दिया. इस हमले में 12 लोगों की मौत हुई, जिनमें 5 बच्चे शामिल थे. अगर वहां मौजूद वीडीसी के सदस्यों ने जवाबी कार्रवाई नहीं की होती, तो मरने वालों की संख्या और हो सकती थी.

    गुज्जर और बकरवाल समुदाय के लोगों के आतंकियों के खिलाफ होने उठ खड़े होने के बाद पिर पंजाल में आतंकियों का रहना मुश्किल हो गया था. सुरक्षाबलों ने इन समुदायों की मदद से आतंकियों को जम्मू क्षेत्र से खदेड़ दिया. 2014 के जम्मू-कश्मीर पुलिस के 'क्राइम गजट' ने बताया कि जम्मू, उधमपुर, रियासी, पुंछ, डोडा और संबा जिले में कोई भी आतंकी नहीं है.

    यह सच है कि सेना, पुलिस और स्थानीय नागरिक समाज समूहों ने जम्मू से आतंकवाद का सफाया करने में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं. लेकिन ये भी सच है कि शुरुआती सालों में, गुज्जर और बकरवालों ने आतंकवादियों को पर्याप्त मदद प्रदान किया, और अभी भी नियंत्रण रेखा के पास गाइड के रूप में काम करने वाले बकरवालों के बारे में कुछ संदेह है.

    हालांकि, उनके योगदान का एक महत्वपूर्ण महत्व इस तथ्य में भी निहित है कि यह बात गलत साबित हो गई कि जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम समुदाय के लोगों को बुरी तरह दबाया जा रहा है और वे तभी ऊपर उठ सकते हैं जब वे पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों की मदद करेंगे.

    न्यू मीडिया के इस मौजूदा दौर में आज की सुर्खियों का ही मायने है. सोशल मीजिया पर पोस्ट ट्रुथ एक हकीकत है और मीडिया के नित-नए सुलासों के बीच अतीत लगभग भुलाया जा चुका है. ऐसे में यह लेख इतिहास को याद रखने की एक छोटी सी कोशिश है.

    लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हूडा भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांडर रह चुके हैं. 2016 में उनके नेतृत्व में ही भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं.

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    Tags: Jammu, Jammu and kashmir

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