प्रणब दा ने कभी कांग्रेस छोड़कर बनाई थी अलग पार्टी, फिर कहते- मुझे तो याद ही नहीं

प्रणब दा ने कभी कांग्रेस छोड़कर बनाई थी अलग पार्टी, फिर कहते- मुझे तो याद ही नहीं
1986 में प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस ने अलग होकर नई पार्टी बनाई थी.

इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) को प्रधानमंत्री चुन लिया. 1986 में एक समय ऐसा आया, जब प्रणब दा ने एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई. पार्टी का नाम था राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 31, 2020, 6:53 PM IST
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नई दिल्ली. ‘भारत रत्न’ प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee Died) अब हमारे बीच नहीं हैं. भारतीय राजनीति का नायाब सितारा हमेशा के लिए खामोश हो गया. छोटे से गांव में पैदा हुए प्रणब को सियासत विरासत में मिली. लेकिन उनकी राजनीति कभी भी पारंपरिक नहीं रही. वे देश के उन अलहदा नेताओं में से हैं, जिनके करियर में तूफानी उतार चढ़ाव देखे जा सकते हैं.

कभी इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के बेहद खास रहे प्रणब दा के राजीव गांधी से संबंध इतने खराब हो गए कि उन्होंने कांग्रेस को ही अलविदा कह दिया था. खुद की नई पार्टी बनाकर उसी कांग्रेस से लोहा लेने लगे थे, जिसने उन्हें देश का वित्त मंत्री बनाया. बाद में वे ना सिर्फ उसी कांग्रेस में लौटे, बल्कि उसी पार्टी ने उन्हें देश के सर्वोच्च पद (राष्ट्रपति) पर बिठाया.





पिता से सीखा राजनीति का ककहरा
प्रणब मुखर्जी का जन्म 1935 में पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में मिराती गांव में हुआ. पिता कामदा किंकर मुखर्जी 1920 से ही कांग्रेस पार्टी में सक्रिय थे. देश आजाद होने के बाद वे पश्चिम बंगाल विधान परिषद में भी चुने गए. जाहिर है, प्रणब बचपन से ही सियासत की एबीसी सीख रहे थे. शायद सियासत में दिलचस्पी ने ही उन्हें राजनीति विज्ञान पढ़ने को प्रेरित किया.

उन्होंने राजनीति विज्ञान में एमए और एलएलबी की डिग्री ली. पारिवारिक बैकग्राउंड जानने वालों को उम्मीद रही होगी कि प्रणब भी राजनीति में उतरेंगे. लेकिन वे तो कॉलेज में प्रोफेसर हो गए. बतौर पत्रकार भी काम किया. वह साल 1969 था, जब प्रणब पर इंदिरा गांधी की नजर पड़ी और इसके बाद सबकुछ बदल गया.

इंदिरा से करीबी और बन गए नंबर-2
साल 1969 में बंगाल के मिदनापुर में उपचुनाव हुए. प्रणब मुखर्जी ने इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार वीके कृष्णामेनन की मदद की. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके काम से प्रभावित हुईं. कुछ दिन बाद प्रणब कांग्रेस में शामिल होकर राज्यसभा के सदस्य हो चुके थे. सन् 1973 में वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए. इसके बाद वे 1975 और 1981 में भी राज्यसभा के लिए चुने गए.

आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार हुई. तब इंदिरा गांधी पर कुछ सवाल भी उठने लगे और इस दौरान प्रणब पूर्व प्रधानमंत्री के सबसे विश्वस्त सहयोगी बनकर उभरे. कांग्रेस का जनाधार फिर बढ़ने लगा. सन 1980 में कांग्रेस ने फिर केंद्र में सरकार बनाई और देखते ही देखते वे इंदिरा कैबिनेट के वित्त मंत्री बन गए. मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे.

पीएम बनने की चाह में राजीव से हो गए दूर
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था. लेकिन जैसा कि राजनीति में होता है या दिखता है वैसा होता नहीं है. प्रणब अपनी महत्वाकांक्षा जता चुके थे और यही बात उनके खिलाफ गई. कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया. वे राजीव गांधी सरकार में भी वित्तमंत्री बने. बाद में कुछ मतभेदों के कारण प्रणब मुखर्जी को यह पद छोड़ना पड़ा. वे कांग्रेस से दूर होते चले गए और 1986 में एक समय ऐसा आया, जब उन्होंने एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई. पार्टी का नाम था राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस.

1989 में हुई राजीव से सुलह और कांग्रेस में वापसी
1989 आते-आते गंगा में बहुत पानी बह चुका था. वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले को जमकर उछाला और माहौल राजीव गांधी और कांग्रेस के खिलाफ बनने लगा. उधर, प्रणब मुखर्जी भी अलग पार्टी बनाकर कुछ खास नहीं कर पा रहे थे. इसके बाद राजीव गांधी और प्रणब में सुलह हो गई और राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय हो गया.

बाद में जब कभी प्रणब दा से उनकी पार्टी में पूछा जाता तो वे मुस्कुराकर जवाब देते कि मुझे तो उसका नाम भी याद नहीं है. आगे का सफर उनका बेहद शानदार रहा. सोनिया गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस में रहते हुए प्रणब दा ना सिर्फ वित्त और रक्षा मंत्री बने, बल्कि 2004 से 2012 तक यूपीए सरकार के ‘संकटमोचक’ भी रहे. साल 2012 में प्रणब मुखर्जी बतौर राष्ट्रपति उस बग्घी पर बैठे, जिसका कभी उन्होंने घोड़ा बनने का सपना देखा था. अलविदा प्रणब दा!
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