जब स्वामी विवेकानंद को हाथरस में मिला था अपना पहला शिष्य

स्वामी विवेकानंद के साथ बोसपारा लेन, कोलकाता के आश्रम में बैठे उनके शिष्यों में जमीन पर बैठे स्वामी सदानंद (फोटो- रामकृष्ण मिशन)
स्वामी विवेकानंद के साथ बोसपारा लेन, कोलकाता के आश्रम में बैठे उनके शिष्यों में जमीन पर बैठे स्वामी सदानंद (फोटो- रामकृष्ण मिशन)

रामकृष्ण मिशन (RamaKrishna Mission) के एक शोधकर्ता (Researcher) के अनुसार, 1887 में, एक भटकने वाला दरिद्र साधु हाथरस जंक्शन स्टेशन (Hathras Junction Station) पर एक बेंच पर बैठा था. वह काशी होते हुए कोलकाता (Kolkata) जाने वाला था. हाथरस में तब चार रेलवे स्टेशन (Railway Station) थे- सिटी, जंक्शन, किला और रोड.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 4, 2020, 10:17 PM IST
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नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश के हाथरस (Hathras) में एक दलित लड़की (Dalit Girl) के साथ कथित सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) और इससे हुई मौत की खबर सामने आई है. यूपी पुलिस (UP Police) की घटना पर प्रतिक्रिया को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) भी हमले झेल रहे हैं. मुख्यमंत्री (जो खुद एक योगी हैं) पर पीड़ित परिवार (Victim Family) के साथ सहानुभूति (Sympathy) नहीं रखने का आरोप लगाया गया है. दिलचस्प बात यह है कि एक सदी से भी अधिक समय पहले, किसी दूसरे योगी (Different Yogi) ने हाथरस को मानव जाति के नक्शे पर पूरी तरह से अलग वजह से रखा था.

रामकृष्ण मिशन (RamaKrishna Mission) के एक शोधकर्ता (Researcher) के अनुसार, 1887 में, एक भटकने वाला दरिद्र साधु हाथरस जंक्शन स्टेशन (Hathras Junction Station) पर एक बेंच पर बैठा था. वह काशी होते हुए कोलकाता (Kolkata) जाने वाला था. हाथरस में तब चार रेलवे स्टेशन (Railway Station) थे- सिटी, जंक्शन, किला और रोड.

जब हुआ संन्यासी और स्टेशन मास्टर का परिचय
शोधकर्ता ने बताया, "भिक्षु पैदल यात्रा कर रहा था, कभी वह ट्रेन ले लेता था, कभी बैलगाड़ी से जाने लगता था. जिसमें भी पैसा कम लगना हो, वह वही साधन चुनता था. इसी दौरान अचानक स्टेशन के ASM (सहायक स्टेशन मास्टर) ने बेंच पर बैठे इस संन्यासी के चेहरे की खासियतों, एक तेज नाक और चौड़ी आंखों को देखा.” वह उसके पास गया और एक बातचीत की.
एएसएम, शरत चंद्र गुप्ता ने उस आदमी से पूछा, "बाबाजी. तुम यहां क्यों बैठे हो? क्या आप नहीं जाना चाहते?" भिक्षु ने जवाब दिया, "हां, मैं जाना चाहता हूं. लेकिन मैं कहां जाऊंगा? मुझे बिल्कुल भी पता नहीं है. मैं दिशाहारा हूं."



साधु को घर ले गये आश्रम, आवभगत की
ASM ने उन्हें एक तम्बाकू पाइप की पेशकश की, जिसे साधु ने स्वीकार कर लिया और एक-दो कश ले लिये. गुप्ता, जो खुद बंगाली थे, उन्होंने पाया कि भिक्षु उनकी हिंदी समझ रहे थे, जिसमें बंगाली उच्चारण का काफी प्रभाव था. उसने भिक्षु से पूछा, "क्या आप बंगाली हैं?" जवाब मिला, "हां मैं हूं."

उसके ज्ञान और स्वभाव से प्रभावित होकर, गुप्ता ने उस रात भिक्षु को अपना अतिथि बनाने का अनुरोध किया और उसे स्टेशन के पीछे अपने क्वार्टर में ले गए, जहां बाद में नहाया गया और खाना खाया गया और गाने गाए. ASM शक्तिशाली रूप से प्रभावित हुए.

ASM इस्तीफा देकर बन गये साधु के शिष्य
एक या दो दिन बिताने के बाद, जब भिक्षु ने जाने की इच्छा व्यक्त की, तो गुप्ता ने उनसे प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया. एएसएम स्टेशन पर पहुंचे, अपना इस्तीफा सौंप दिया और भिक्षु के शिष्य बन गए- यानि ऐसा माना जाता है कि विवेकानंद के पहले शिष्य.

क्योंकि "यह भिक्षु नरेंद्रनाथ दत्त ही थे, जो बाद में स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गये. और वहीं हाथरस जंक्शन के उस एएसएम ने अपनी प्रतिज्ञा लेने के बाद, रामकृष्ण मिशन के स्वामी सदानंद के तौर पर बुलाया जाने लगा."

विवेकानंद ने परीक्षा लेने के लिए हाथरस जंक्शन पर भीख मांगने को कहा
यह एक साधु और उसके शिष्य की आकर्षक कहानी है. इसे अद्वैत आश्रम द्वारा लिखी गई किताब "द लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद बाई हिज ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल्स" में उनके बारे में अधिक पढ़ सकते हैं.

यह भी पढ़ें: हाथरस पीड़िता के परिवार से मिले भीम आर्मी प्रमुख, Y सिक्योरिटी देने की मांग

गुप्ता की ईमानदारी का परीक्षण करने के लिए विवेकानंद ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने से पहले अपना भीख मांगने का कटोरा दिया और स्टेशन पर यात्रियों से से भोजन की भीख मांगने को भी कहा था.
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