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जब टैगोर ने जताई थी गांधी के विचारों से असहमति

News18.com
Updated: October 2, 2018, 10:18 AM IST
जब टैगोर ने जताई थी गांधी के विचारों से असहमति
1940 में रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी शांतिनिकेतन में

टैगोर ने गांधी जी के चरखा आंदोलन और असहयोग आंदोलन पर एक लेख लिखा जिसमें इसकी आलोचना की गई थी.

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  • Last Updated: October 2, 2018, 10:18 AM IST
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जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधी जी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी थी. आंदोलन का नाम था असहयोग आंदोलन. आंदोलन को पूरे भारत में काफी सफलता मिली लेकिन गोरखपुर के चौरी चौरा में एक भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिस वालों की मौत हो गई. गांधी जी ने इस घटना के बाद आंदोलन को वापस ले लिया. गांधी जो को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. लेकिन फरवरी 1924 में उनके खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया. बाहर आकर गांधी जी ने 'चरखा आंदोलन' शुरू कर दिया.

रवींद्रनाथ टैगोर गांधी जी के समय के काफी मशहूर कवि थे. उन्होंने गांधी जी के न सिर्फ चरखा आंदोलन और असहयोग आंदोलन पर बल्कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भी लेख लिखकर आलोचना की. उन्होंने लिखा कि जैसे कुछ लोगों के लिए उनकी आजीविका है वैसे ही कुछ लोगों के लिए राजनीति है जहां वो अपने देशभक्ति की विचारधारा का व्यापार करते हैं.

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यह दिखाता है कि आधुनिक भारत को लेकर दोनों की समझ कितनी अलग थी. गांधी और टैगोर के बारे में टिप्पणी करते हुए नेहरू ने कहा था कि कोई भी दो व्यक्ति इतने अलग नहीं हो सकते जितने गांधी और टैगोर. दोनों एक ही विचार और संस्कृति से प्रेरित थे फिर भी आपस में इतने अलग-अलग थे. यह भारतीय संस्कृति की खासियत है जिसने एक ही समय में दो इतने विपरीत विचारधारा वाले और महान लोगों को जन्म दिया. जाने-माने फ्रेंच लेखक रोमेन रोलैंड ने इसे 'द नोबल डिबेट' कहा था.

गांधी के असहयोग आंदोलन पर टैगोर

स्वराज क्या है! माया है, धुंध है जो कि खुद खत्म हो जाएगा उस अविनाशी पर बिना कोई असर डाले. हालांकि हम अपने आप इस झूठ का विश्वास दिला सकते हैं कि स्वराज हमारा उद्देश्य नहीं है. हमारी लड़ाई आध्यात्मिक लड़ाई है. यह लोगों के लिए है. हमें लोगों को उनकी खुद की अज्ञानता से मुक्त कराना होगा. हमें तितली को यह विश्वास दिलाना होगा कि आकाश की स्वतंत्रता कोकून के शरण से बेहतर है.

नेशनलिज़म या राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर ने कहा कि हमारी भाषा में 'नेशन' के लिए कोई शब्द नहीं है. जब हम दूसरों ये शब्द उधार लेते हैं तो यह हमारे लिए सटीक नहीं बैठता.
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(मई 1921 में 'माडर्न रिव्यू' में प्रकाशित)

टैगोर द्वारा असहयोग आंदोलन की आलोचना में गांधी जी का उत्त

मैं समझता हूं कि कवि ने अनावश्यक रूप से असहयोग आंदोलन के नकारात्मक पक्ष को उभारा है. हमने 'न' कहने की शक्ति खो दी है. सहयोग न करना ऐसा ही है जैसे खेत में बीज बोने से पहले किसान खरपतवार को साफ करता है. खरपतवार को साफ करना काफी ज़रूरी है. यहां तक कि जब फसल बढ़ रही हो तो भी ये ज़रूरी होता है. असहयोग का अर्थ है कि लोग सरकार से संतुष्ट नहीं हैं.

देश ने गैर- नुकसानदायक, प्राकृतिक और धार्मिक असहयोग का रास्ता चुना है न कि हिंसा का अधार्मिक रास्ता. और, अगर देश कभी भी कवि के स्वराज को प्राप्त कर पायेगा तो यह असहयोग और अहिंसक आंदोलन से ही होगा.

(1 जून 1921 को 'यंग इंडिया' में प्रकाशित किए गए आर्टिकिल 'द पोएट ऐंक्ज़ाइटी' से)

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद टैगोर ने राष्ट्रवादियों से कहा कि वो स्वार्थ से ऊपर उठें, असहयोग के बारे में एक बार और सोचें और विश्व के कल्याण के बारे में सोचें.

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद टैगोर ने कहा कि समय आ गया है जब हमें एक और चीज़ के बारे में सोचना होगा, और वो यही है. भारत का जागना विश्व के जागने का एक भाग है.

लेकिन गांधी ने चरखा, असहयोग और स्वराज का समर्थन किया. अंतरराष्ट्रवाद पर उन्होंने कहा कि एक डूबता हुआ आदमी दूसरे को नहीं बचा सकता.

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भारत में चरखा भूख की वजह से चल रहा है. चरखा का प्रयोग करने के लिए कहना सभी कामों में पवित्र है. क्योंकि यह प्रेम है और प्रेम ही स्वराज है. हमारा असहयोग अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था से है जो कि भौतिकतावादी संस्कृति और कमज़ोरों के शोषण पर आधारित है. हम अंग्रेज़ों से कहते हैं कि आओ और हमारी शर्तों पर हमें सहयोग करो. यह हम दोनों के लिए और पूरी दुनिया के लिए बेहतर होगा.

(1921 में यंग इंडिया में प्रकाशित लेख के अनुसार)

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First published: October 2, 2018, 10:15 AM IST
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