जब वाजपेयी और मुशर्रफ ने 'लगभग' सुलझा ही लिया था कश्मीर विवाद

पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने अपनी पुस्तक ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में लिखा है कि "कश्मीर का समाधान वाजपेयी और मुशर्रफ सरकार करना चाह रही थी".

News18.com
Updated: February 13, 2018, 6:16 PM IST
जब वाजपेयी और मुशर्रफ ने 'लगभग' सुलझा ही लिया था कश्मीर विवाद
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Updated: February 13, 2018, 6:16 PM IST
उदय सिंह राणा

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर में शांति के लिए केंद्र सरकार और पाकिस्तान सरकार के बीच बातचीत की इच्छा जाहिर की है. उन्होंने सोमवार को ट्वीट किया, "अगर हम खून-खराबे को रोकना चाहते हैं तो पाकिस्तान के साथ बातचीत करना जरूरी है."

महबूबा ने लिखा, "मुझे पता है कि शाम तक मेरे इस बयान पर मुझे एंटी नेशनल घोषित कर दिया जाएगा, लेकिन वो मायने नहीं रखता है." उन्होंने कहा, "जम्मू-कश्मीर के लोग दिक्कतें झेल रहे हैं. जंग किसी भी तरीके से कोई विकल्प नहीं है."

महबूबा की बातचीत की मांग कश्मीर में राजनीतिक फिजाओं में गूंज रही है. उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उमर अब्दुल्ला भी लंबे समय से बातचीत की मांग करते रहे हैं. संभवतः 2001 में आगरा शिखर सम्मेलन में मिली 'करीब-करीब सफलता' की वजह से लोगों में विश्वास है कि इसका समाधान, वास्तव में, संभव है.

भारत-पाकिस्तान के संबंधों को लेकर आगरा शिखर सम्मेलन को एक ऐसे अवसर के रूप में  याद किया जाता है जिसमें सफलता के करीब पहुंचकर दोनों देश चूक गए. पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने अपनी पुस्तक ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में लिखा है कि "कश्मीर का समाधान दोनों सरकारें करना चाह रही थीं."

फिर, नई दिल्ली और इस्लामाबाद से इस मामले का समाधान क्यों नहीं हो पाया? दोनों पक्षों में अलग-अलग थ्यौरी हैं.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कश्मीर के लिए 'चार सूत्री समाधान' वाला प्रस्ताव दिया था. सूत्रों के मुताबिक, सिद्धांत रूप में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को स्वीकार्य थे, लेकिन यह डील अंतिम समय में नहीं हो पाया.

मुशर्रफ की योजना के चार बिंदु ये थे:

1. सैनिकों की चरणबद्ध वापसी
लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) की दोनों तरफ लाखों सैनिक कश्मीर में तैनात हैं. मुशर्रफ के अनुसार, भारत और पाकिस्तान दोनों को इस क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए अपने सैनिकों को वापस करना होगा.

2. कश्मीर की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं
जम्मू और कश्मीर की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा. हालांकि जम्मू और कश्मीर के लोगों को नियंत्रण रेखा (एलओसी) के आर-पार आने-जाने की अनुमति दी जाएगी.

3. स्वतंत्रता के बिना स्वशासन
पाकिस्तान लंबे समय से 'कश्मीरियों के आत्मनिर्णय' के बारे में कहता रहा है, लेकिन मुशर्रफ और अधिक  स्वायत्तता देने के पक्ष में थे. वाजपेयी को इस समझौते के इस पार्ट से बहुत अधिक आपत्ति नहीं होती क्योंकि भारतीय संविधान ने धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर के लिए स्वायत्तता की अनुमति दे रखी है. हालांकि इसका मतलब होगा कि बीजेपी को अपनी मूल विचारधाराओं में से एक (धारा 370 को खत्म करना) को छोड़ देना होता.

4. भारत, पाकिस्तान और जम्मू और कश्मीर का एक संयुक्त देखरेख तंत्र
मुशर्रफ के प्रस्ताव में पर्यवेक्षण या देखरेख के लिए स्थानीय कश्मीरी नेतृत्व को शामिल करना चाहते थे.

आगरा शिखर सम्मेलन के कई सालों बाद मुशर्रफ ने दावा किया था कि भारतीय पक्ष ने इस समझौते से इनकार कर दिया, जबकि प्रस्तावित मसौदा हस्ताक्षर के लिए तैयार था. मुशर्रफ ने 2004 में कहा कि मुझे बताया गया था कि भारतीय कैबिनेट ने इसकी मंजूरी देने से इंकार कर दिया है.

लेकिन सूत्रों के अनुसार, केवल एक ही व्यक्ति था, जो शांति समझौते में रुकावट बन गया. वह थे अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी. कसूरी ने अपनी पुस्तक में लिखा है, "उन्होंने (गिलानी) राष्ट्रपति मुशर्रफ के चार सूत्री एजेंडे को अस्पष्ट बताया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों पर कश्मीर की प्रासंगिकता पर मुशर्रफ के बयान की आलोचना की." उन्होंने कहा, "सौभाग्य से, अन्य कश्मीरी नेता गिलानी के कठोर रूख के साथ जाने के लिए तैयार नहीं थे.

लेकिन भारत सरकार की तरफ से भी कुछ समस्या थीं. रॉ के पूर्व चीफ एएस दुलत ने 2015 में दिए एक साक्षात्कार में कहा कि तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने आगरा शिखर सम्मेलन को पटरी से उतार दिया था. उन्होंने कहा, "दिल्ली के आडवाणी और आगरा के आडवाणी अलग थे. रेडिफ को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा, "आडवाणी ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के सामने दाऊद इब्राहिम का मुद्दा उठा दिया था. अचंभित मुशर्रफ ने आडवाणी से कहा, 'हमें आगरा जाने तो दो.'
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