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सिंधुताई सपकाल: जिन्हें कहा जाता है 'हजारों अनाथों की मां', इस साल जीता पद्मश्री अवॉर्ड

सिंधुताई का जन्म वर्धा के एक गरीब परिवार में हुआ था. देश में पैदा होने वाली कई लड़कियों की तरह सिंधुताई ने भी अपने जन्म के बाद से ही भेदभाव का सामना किया. (फोटो: इंस्टाग्राम)
सिंधुताई का जन्म वर्धा के एक गरीब परिवार में हुआ था. देश में पैदा होने वाली कई लड़कियों की तरह सिंधुताई ने भी अपने जन्म के बाद से ही भेदभाव का सामना किया. (फोटो: इंस्टाग्राम)

Padmashri awards 2021: बाल वधू के तौर पर शादी होने के बाद उन्हें अपने पति के साथ रहने नवरगांव भेजा गया. यहां उन्हें पति कई बार अपमानित करता था. इसके बाद किशोरावस्था में सिंधुताई अपने हक के लिए खड़ी हुईं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2021, 4:52 PM IST
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नई दिल्ली. केंद्रीय गृहमंत्रालय ने 2021 के पद्मश्री पुरस्कारों (Padmashri awards) की घोषणा कर दी है. इनमें से कई विजेता महाराष्ट्र के भी हैं. हालांकि, इस दौरान सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने वाली सिंधुताई सपकाल (Sindhu Tai Sapkal) हैं. आमतौर पर इन्हें सिंधुताई या माई कहकर भी बुलाया जाता है. वहीं, इन्हें 'हजारों अनाथों की मां' भी कहा जाता है. खास बात है कि वो अब तक करीब 2 हजार अनाथों को गोद ले चुकी हैं.

सिंधुताई का जन्म वर्धा के एक गरीब परिवार में हुआ था. देश में पैदा होने वाली कई लड़कियों की तरह सिंधुताई ने भी अपने जन्म के बाद से ही भेदभाव का सामना किया. उनकी मां अपनी बेटी की शिक्षा के खिलाफ थीं, लेकिन पिता चाहते थे कि सिंधुताई पढ़ें. ऐसे में वो बेटी को मां की नजरों से बचाकर पढ़ने के लिए भेजते थे. मां को लगता था कि बेटी मवेशी चराने गई है. जब वो 12 साल की थीं, तो उन्हें पढ़ाई छोड़ने और उम्र में 20 साल बड़े लड़के के साथ शादी करने के लिए मजबूर किया गया.

बाल वधू के तौर पर शादी होने के बाद उन्हें अपने पति के साथ रहने नवरगांव भेजा गया. यहां उन्हें पति कई बार अपमानित करता था. इसके बाद किशोरावस्था में सिंधुताई अपने हक के लिए खड़ी हुईं. उन्होंने वन विभाग और जमींदारों की तरफ से उत्पीड़न का सामना कर रही स्थानीय महिलाओं के हक में लड़ना शुरू किया. हालांकि, जब वो 20 साल की उम्र में चौथी बार गर्भवती हुईं, तो गांव में उनके चरित्र पर सवाल उठने शुरू हो गए.



अफवाहों पर भरोसा कर उनके पति ने बुरी तरह पीटकर और मरने के लिए छोड़ दिया. ऐसे में उन्होंने एक तबेले में बेटी को जन्म दिया. जब उन्होंने घर लौटने की कोशिश की तो मां ने बेइज्जत कर घर से बाहर निकाल दिया. इंडिया टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने रास्तों और ट्रेन में भीख मांगना शुरू किया. वहीं, अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए शमशान और तबेलों में रातें काटी.

इसी दौरान उन्होंने अनाथ बच्चों के साथ समय गुजारा और करीब एक दर्जन को गोद भी ले लिया. तभी 1970 में उनके शुभचिंतकों ने सिंधुताई को चिकलदारा में पहला आश्रम खोलने में मदद की. उनका पहला एनजीओ सावित्रीबाई फुले गर्ल्स हॉस्टल भी वहीं पर है. उन्होंने अपना जीवन अनाथों के नाम कर दिया. खास बात है कि उनके गोद लिए बच्चे आज वकील और डॉक्टर भी हैं.
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