क्या चांद पर कब्जा कर चुका है अमेरिका, चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग से ठीक पहले इस अंतरिक्ष वकील ने बताया

अमेरिका के चांद पर झंडा फहराने के बाद दुनिया भर में राजनीतिक बहस छिड़ गई थी. लेकिन कोई भी ऐसी बात कि अमेरिका चांद पर कब्जा करेगा, न सिर्फ अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाती बल्कि दुनिया की ओर से उसके लिए खतरे की घंटी होती.

News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 9:20 PM IST
क्या चांद पर कब्जा कर चुका है अमेरिका, चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग से ठीक पहले इस अंतरिक्ष वकील ने बताया
अमेरिका ने सबसे पहले चांद पर फहराया था अपना झंडा (फाइल फोटो)
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Updated: July 9, 2019, 9:20 PM IST
(फ्रांस वॉन डेर डंक)

चांद पर अमेरिका का झंडा फहराते हुए बज़ एल्ड्रिन की तस्वीर आपने जरूर देखी होगी. आज से करीब आधी शताब्दी पहले जब एल्ड्रिन ने उस अमेरिकी झंडे को चांद पर फहराया तो उसका मतलब कुछ और ही निकाला गया था. दरअसल उस दौर में किसी भी ऐसी जमीन पर जो किसी की नहीं किसी देश का अपना झंडा फहरा देना, उस देश पर कब्जा कर लेने का प्रतीक माना जाता था. ऐसे में एल्ड्रिन की तस्वीर से धरती पर मौजूद अलग-अलग देशों के लोगों के अंदर यह संदेश गया कि चंद्रमा पर अमेरिका ने कब्जा कर लिया है.

ऐसे में जब लोग यह जानते हैं कि मैं एक स्पेस लॉयर (वकील) हूं तो कई बार लोग मुस्कुराते हुए पहला सवाल यही करते हैं, तो बताइए चांद पर किसका (देश का) अधिकार है?

झंडा गाड़ने के चलते शुरू हुई थी गलतफहमी

हालांकि विदेशी जमीनों पर कब्जा कर वहां अपना झंडा फहराना यूरोपीय देशों की पुरानी आदत रही है लेकिन जब एक अंतरिक्ष यात्री किसी जमीन पर झंडा गाड़ता है तो उसके दिमाग में उस जमीन पर कब्जे के अलावा बहुत सारी दूसरी बातें चल रही होती हैं. वे नहीं जानते की दुनिया इसका क्या मतलब निकालेगी और इसके क्या परिणाम होंगे. लेकिन मजे की बात तो यह है कि इंडा फहराने के पहले ही इसे चांद पर फहराए जाने के परिणामों के बारे में सोच लिया गया था.

जबसे देशों के बीच अंतरिक्ष में सबसे पहले जाने की दौड़ शुरू हुई, अमेरिका के चांद पर झंडा फहराने के बाद दुनिया भर में राजनीतिक बहस छिड़ गई थी. लेकिन अगर कोई भी ऐसी बात की जाती थी कि अमेरिका चांद पर कब्जा करेगा, जमीन पर न सिर्फ अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने वाली साबित हो सकती थी बल्कि वह पूरी दुनिया में अमेरिका के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए काफी थी.

ऐसे में क्या आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन के चंद्रमा पर झंडा फहराने का मतलब चंद्रमा या उसके एक बड़े भाग पर कब्जा कर लेना था? नहीं न ही आर्मस्ट्रांग-एल्ड्रिन, न ही नासा, न ही अमेरिकी सरकार का मतलब चांद पर झंडा फहराने को लेकर ऐसा था.
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पहली बाहरी अंतरिक्ष संधि
चांद किसका है, इसका सबसे अच्छे से उत्तर 1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि के जरिए दिया जा सकता है. यह संधि अमेरिका और सोवियत संघ के अलावा अंतरिक्ष में अभियानों की तैयारी में जुटे सभी देशों के बीच की गई थी. उस काल की दोनों ही महाशक्तियां इस संधि में इस बात पर राजी हो गई थीं कि धरती पर उपनिवेशीकरण ने इंसानों को बहुत बुरी परिस्थियों में रखा और बड़े हथियारों वाले युद्ध की वजह बना. जिसके चलते पिछली पूरी शताब्दी परेशानी में पड़ी.

वे पुरानी यूरोपीय शक्तियों की यह गलती चांद पर दोहरना नहीं चाहते थे. उस दौर में केवल इतना शक हो जाना कि कोई देश चांद पर कब्जा जमाना चाहता है अगले न टाले जा सकने वाले युद्ध को जन्म दे सकता था. ऐसे में चंद्रमा को सभी देशों के लिए बराबरी से सुलभ होने का कानूनी दर्जा दिया गया. यह काम किसी भी इंसान के चंद्रमा पर पहुंचने से दो साल पहले ही किया जा चुका था.

ऐसे में चांद पर गाड़ा गया अमेरिकी झंडा किसी किसी चांद के हिस्से को हथियाए जाने का प्रतीक न होकर अमेरिका में टैक्स देने वाली जनता, इंजीनियरों और आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन के सम्मान का प्रतीक था जिनके चलते यह मिशन सफलतापूर्वक संभव हो सका था.

ऐसे में नासा ने अपना वादा निभाते हुए दुनिया भर की संस्थाओं को रिसर्च के लिए चांद से जुटाए तमाम सैंपल मुहैया कराए.

तब क्यों होती है अंतरिक्ष वकीलों की जरूरत?
अब भी कई चीजें हैं जो बाहरी अंतरिक्ष के बारे में साफ नहीं हैं. वैसे भी 1972 के बाद से कोई भी इंसान चंद्रमा की सतह पर नहीं गया है. अब से कुछ सालों पहले तक चंद्रमा पर वापस जाने की कई सारी योजनाएं बनाई जा रही थीं. वहीं अमेरिका की दो बड़ी कंपनियां प्लेनेटरी रिसोर्सेज और डीप स्पेस इंडस्ट्रीज (जिनके पास काफी पैसे भी हैं) ने एस्टेरॉयड्स को खनिजों की खुदाई के लिए अपना लक्ष्य बनाने का निश्चय किया था.

जबकि यह बाह्य अंतरिक्ष संधि चंद्रमा के साथ-साथ इन एस्टेरॉयड्स पर भी लागू होनी चाहिए. लेकिन इस संधि में केवल राजनीतिक तौर पर कब्जे से रोके जाने की बात की गई है लेकिन आर्थिक फायदे के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है. यही इस वक्त दुनिया भर में वाद-विवाद का विषय बना हुआ है.

अमेरिका और लक्जमबर्ग जैसे देश यह बात मान चुके हैं कि चंद्रमा और दूसरे एस्टेरॉयड 'ग्लोबस कॉमन्स' की कैटेगरी में आते हैं. और वे अपने प्राइवेट एंटरप्रेन्योर को लाइसेंस देकर अंतरिक्ष के नियमों के मुताबिक अंतरिक्ष में चंद्रमा और एस्टेरॉयड पर खनिज खोदने के लिए भेज सकते हैं. ताकि वे पैसे बना सकें.

वहीं दूसरी ओर रूस, ब्राजील और बेल्जियम जैसे देश मानते हैं कि चंद्रमा और एस्टेरॉयड पूरी मानवता की संपत्ति हैं. ऐसे में उनके व्यापारिक उपयोग का फायदा भी पूरी दुनिया को होना चाहिए. या कम से कम उनका ऐसा प्रयोग होना चाहिए कि पूरी दुनिया को इसका फायदा हो. इसका भी लाइसेंस वैसा ही हो, जैसा गहरे समुद्र की खुदाई के लिए होता है. इसमें दुनिया के हर देश को फायदे का भाग मिलता है.

मेरे नजरिए से पहले वाला प्रस्ताव कानूनी और वास्तविक दोनों ही हालातों में ज्यादा सही है और कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. साथ ही चांद पर वापस जाने के चीन, भारत और जापान के प्रयासों के बीच यह फिर से नए सिरे से शुरू होने वाला है.

(इस लेख को यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का-लिंकन के प्रोफेसर फ्रांस वॉन डेर डंक ने लिखा है. यह पहले क्रिएटिव कामंस लाइसेंस के अतंर्गत एसोसिएटेड प्रेस पर प्रकाशित हो चुका है.)

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First published: July 9, 2019, 8:37 PM IST
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