निर्वासित तिब्बती सरकार में कौन बनेगा राष्ट्रपति? फाइनल राउंड का मतदान जारी, 14 मई को आएंगे नतीजे

निर्वासित तिब्बती सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए केलसंग दोरजे और पेंपा सेरिंग हैं उम्मीदवार.

निर्वासित तिब्बती सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए केलसंग दोरजे और पेंपा सेरिंग हैं उम्मीदवार.

निर्वासित तिब्बती सरकार के राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए दुनियाभर में फैले 80000 वोटर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. तिब्बती प्रशासन के सिक्योंग और 45 सदस्यीय संसद के लिए फाइनल राउंड की वोटिंग प्रक्रिया की आज हुई शुरुआत.

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धर्मशाला. 17वीं निर्वासित तिब्बत सरकार (केंद्रीय तिब्बती प्रशासन) के नए राष्ट्रपति (सिक्योंग) और 45 सदस्यीय संसद के लिए रविवार को फाइनल राउंड की मतदान प्रक्रिया शुरू हो गई है. खास बात ये है कि इस मतदान प्रक्रिया पर चीन, अमेरिका और भारत समेत समूची दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं. निर्वासित तिब्बत सरकार के लिए ये चुनाव भारत और अमेरिका के लिए कूटनीतिक तौर पर बेहद अहम हैं. क्योंकि पिछले कुछ वक़्त से चीन के साथ भारत और अमेरिका के रिश्ते भी बेहतर नहीं चल रहे हैं.

निर्वासित तिब्बत सरकार की इस दूसरी और फाइनल राउंड की चुनावी प्रक्रिया में दुनिया भर में करीब 80000 रजिस्टर्ड वोटर्स हैं जो कि मतदान करेंगे और मतदान का परिणाम 14 मई को घोषित किया जाएगा. इसी दिन तय हो जाएगा कि निर्वासित तिब्बत सरकार के अगले प्रधानमंत्री पेंपा सेरिंग होंगे या फिर केलसंग दोरजे आकत्संग.

अमेरिका लगातार चीन पर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के समक्ष तिब्बत और धर्मगुरु दलाईलामा के उत्तराधिकारी का मुद्दा उठा रहा है. वहीं भारत भी कूटनीतिक रूप से तिब्बत मुद्दे पर अपनी मौन सहमति दे रहा है. इसलिए आज दुनिया भर में 17वीं निर्वासित तिब्बत सरकार के लिए हो रही फाइनल राउंड की चुनावी प्रक्रिया पर दुनियाभर की नजरें टिकी हुई हैं. निर्वासित तिब्बती सरकार के इन चुनावों की दिलचस्प बात ये है कि इन चुनावों में कोई भी सियासी संगठन भाग नहीं लेता है. इसमें सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर ही चुनावी प्रक्रिया अमल में लाई जाती है.

खास बात ये है कि इनके चुनावों में किसी तरह की भीड़ नहीं जुटाई जाती, न ही जनसमर्थन जुटाने के लिए कोई रैली, जलूस निकाला जाता है. न ही चुनावी प्रचार-प्रसार का शोर सुनने को मिलता है और न किसी भी तरह की कोई खरीद-फ़रोख़्त की सियासी तामझाम नज़र आती है. संविधान के मुताबिक सिक्योंग यानी राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार लगातार दो बार ही चुनाव लड़ पाता है. हालांकि साल 2011 से पहले दलाईलामा ही उम्मीदवारों का चुनाव किया करते थे, मगर अब उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्तियां सिक्योंग को ही सौंप दी थीं. तिब्बत सरकार का मुख्यालय धर्मगुरु दलाईलामा के निवास स्थान मैक्लोडगंज में ही है और यहीं से सरकार अपना पूरा कामकाज चलाती है.
जहां एक ओर निर्वासित तिब्बत सरकार की चुनावी  प्रक्रिया चल रही है तो वहीं दूसरी ओर अमेरिका की संसद ने फरवरी 2021 में तिब्बत पॉलिसी एंड सपोर्ट एक्ट (टीपीएसए) 2020 को पारित किया था. इस बिल में साफ लिखा है कि दलाईलामा का अगला उत्तराधिकारी चुनने में चीन कोई दखल नहीं कर सकता. साथ ही दलाईलामा के किसी भी मामले में चीन का हस्तक्षेप उनकी आजादी में दखल माना जाएगा, अमेरिका ने कुछ महीने पहले पहली मर्तबा निर्वासित तिब्बत सरकार के सिक्योंग यानी राष्ट्रपति लोबसांग सांग्ये को व्हाइट हाउस में एंट्री देकर निर्बासित तिब्बतियों का मान बढ़ाया था और उन्हें संवैधानिक तौर पर मान्यता प्रदान की थी. उसके बाद चीन अमेरिका के साथ बेहद चिढ़ गया था.
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