Unlock-1: पहले की तरह नहीं रहे बाजार, खरीदारी के शौकीन लोगों को लग रहा झटका

Unlock-1: पहले की तरह नहीं रहे बाजार, खरीदारी के शौकीन लोगों को लग रहा झटका
अनलॉक की शुरुआत के साथ अभी सबकुछ पहले जैसा नहीं दिख रहा.

लंबे लॉकडाउन (Lockdown) के बाद अब बाजारों (Markets) में ढील भले ही दे दी गई हो, लेकिन खरीदारी के शौकीनों के लिए अनुभव पहले जैसा नहीं रहा. जानिए क्यों...

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प्रिया सेठ
लॉकडाउन (Lockdown) के बाद जैसे ही रिटेल आउटलेट्स (Retail Outlets) खोलने की अनुमति सरकार ने दी मैं कपड़ों की खरीदारी के लिए स्टोर की तरफ भागी. मेरे दिमाग में कपड़ों से भरा हुआ स्टोर था, जहां किसी भी कपड़े को ट्राई करने की आजादी होती है. दर्जनों कपड़ों को हाथ से परखते हुए और उसके साइज को चेक कर उनमें से कुछ कपड़ों को चुनने का मजा ही कुछ और होता है. पिछले 80 दिनों के लॉकडाउन के दौरान मैंने इस तरह की शॉपिंग को न जाने कितनी बार याद किया.

स्टोर पहुंचते हुए मेरा अभिवादन तापमान चेक करने के साथ हुआ और स्टोर में घुसने से पहले सेनेटाइजर हाथ साफ करने के लिए दिया गया. साथ ही पूछा गया कि क्या मैंने आरोग्य सेतू ऐप डाउनलोड किया है?

बिल्कुल बदला हुआ था नजारा
स्टोर में बदले अभिवादन के तरीके के बाद मैं अंदर दाखिल हुई. मैंने चारों ओर नजरें दौडा़ई और पाया कि वहां सेनेटाइजर की कई बोतलें हर कोने में रखीं हुईं थीं. मास्क और ग्लव्स पहने स्टाफ की वेशभूषा किसी आर्मीमैन की तरह लग रही थी. तकरीबन 6 स्टाफ मेंबर स्टोर के अंदर और करीब 15 स्टाफ मेंबर इसके अलावा दरवाजे और स्टोर में जगह-जगह पर मौजूद थे. इनमें से कुछ का काम लगातार स्टोर, रैक, हैंगर्स को डिसइंफेक्ट करना था. ये लगातार कस्टमर पर नजर रख रहे थे. जैसे ही कोई कस्टरम किसी कपड़े, हैंगर या फिर रैक को छूता वे उसे फौरन डिसइंफेक्ट करते. सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की जाने वाली यह सारी कवायद अचरज में डालने वाली थी.



मैं जैसे ही किसी कपड़े, रैक, हैंगर को छूती पीछे से क्लीनिंग ब्रिगेड आकर उसे सैनेटाइज करने लगती. मैंने जिन कपड़ों को भी छुआ था वे सारे के सारे फौरन आयरन के लिए भेजे गए. स्टोर के भीतर ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं किसी अलग ही दुनिया में आ गई हूं.

ट्रायल रूम की व्यवस्था बंद
राज्य सरकार के आदेश के मुताबिक स्टोर में ट्रायल रूम्स बंद कर दिए गए हैं. कपड़ों को वापस करने की प्रक्रिया पर भी फिलहाल रोक है. साथ ही स्टाफ मेंबर मुझे लगातार यह हिदायत देने की कोशिश कर रहे थे कि जरूरी न हो हो तो किसी कपड़े या जगहे को न छुएं. इस बीच मैंने अपने लिए दो ड्रेस चुनीं. लेकिन मैं आश्वस्त नहीं हो पा रही थी कि क्या मुझे यह खरीदनी चाहिए. खैर, मैं बिलिंग काउंटर के पास पहुंची. यहां भी सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद थी. यहां नकद की जगह क्रेडिट और डेबिट कार्ड को प्राथमिकता दी जा रही थी.

उत्साह और उलझनों का मिश्रण
हालांकि तकरीबन दो महीनों बाद कपड़ों से भरा स्टोर देखकर मैं जहां एक तरफ उत्साहित थी तो दूसरी तरफ अजीब सी उलझन भी हो रही थी. मैं खरीदारी तो कर रही थी लेकिन लग रहा था जैसे मेरी आजादी मुझसे छिन गई है. आखिरकार मैं कपड़े खरीदने का आयडिया ड्राप कर स्टोर से बाहर आ गई. इस न्यू नॉर्मल के साथ शॉपिंग करना मेरे लिए बेहद कष्टदायक था. मैंने उन पुराने दिनों की शॉपिंग को याद किया जब मैं अनगिनत कपड़ों को ट्राइ करने के लिए आजाद थी, कोई मुझ पर निगरानी नहीं रखता था. सच कहूं तो मैंने विंडो शॉपिंग को बहुत मिस किया. मैं अब इंतजार कर रही हूं उन सामान्य दिनों के लौटने का. पर मैं खुद से ही पूछती हूं, क्या वे दिन आएंगे?

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