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Opinion: अमरिंदर को सियासी तौर पर भारी ना पड़ जाए किसान आंदोलन, जानिए क्यों?

पूर्व सैनिक और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के कट्टर आलोचक के रूप में अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रवादी नेता की छवि बनाई है. (फाइल फोटो)
पूर्व सैनिक और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के कट्टर आलोचक के रूप में अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रवादी नेता की छवि बनाई है. (फाइल फोटो)

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह (Amarinder Singh) के लिए किसान आंदोलन (Farmers Protest) का निर्णायक हल बहुत जरूरी है, क्योंकि रेल परिचालन ठप होने और आंदोलन के चलते राज्य की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई है. विधानसभा चुनावों से पहले अर्थव्यवस्था को संभालना उनके लिए भविष्य के लिए बेहद जरूरी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 13, 2020, 5:40 PM IST
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नई दिल्ली, भवदीप कंग| 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव पर सभी पार्टियों की निगाह है और उन्हें समझ आ गया है कि राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है, क्योंकि खेती कानून-2020 के मुद्दे पर किसानों का प्रदर्शन अपनी रफ्तार में बढ़ता जा रहा है. इस तरह के राजनीतिक प्रयोग सियासत को बदलने की क्षमता रखते हैं और इनके परिणाम के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल होता है. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह फिसलन भरे चौराहे पर खड़े हैं, और उन्होंने अपनी पार्टी के हित की सोच कर किसान आंदोलन को प्रोत्साहित किया है. लेकिन, आंदोलन का जल्दी और सकारात्मक तरीके से निर्णायक स्तर पर पहुंचना ही अमरिंदर के हित में होगा, इससे पहले कि नई ताकतें मंच पर आएं और आंदोलन को हाइजैक कर माहौल बदल दें. ना ही अमरिंदर चाहेंगे कि उनकी ही पार्टी में उनके विरोधी बदले माहौल का फायदा उठाएं.

उधर, सत्ताधारी एनडीए को नीचा दिखाने के लिए किसान आंदोलन का अंतरराष्ट्रीयकरण करने से अप्रवासी सिख समुदाय के बीच कथित खालिस्तान समर्थकों को जगह मिल जाएगी, जिनकी धरातल पर और विरोध प्रदर्शन में हिस्सेदारी जीरो के बराबर है, लेकिन सड़कों पर उतरकर उनकी कोशिश ग्लोबल मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचना है. पंजाब के मुख्यमंत्री को पता है कि अलगाववाद की हल्की सी चिंगारी भी राजनीतिक रूप से उनके लिए बड़ा घाटा साबित हो सकती है और ये वोटरों को उनसे दूर भी ले जा सकती है. 2017 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के खिलाफ अमरिंदर सिंह ने बड़ी चालाकी से खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल किया था. (अमरिंदर ने कहा था कि अगर आम आदमी पार्टी पंजाब की सत्ता में लौटी तो राज्य में आतंक की वापसी हो सकती है)

पूर्व सैनिक और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के कट्टर आलोचक के रूप में अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रवादी नेता की छवि बनाई है, और इस तरह खालिस्तान विरोधी के रूप में उन्होंने खुद को स्थापित किया है. इसी छवि के दम पर पिछले तीन चुनावों में अमरिंदर सिंह ने मोदी लहर को धराशायी किया है. मौजूदा किसान आंदोलन को लेकर भी अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति चिंता जताई थी और पिछले साल खालिस्तानी आंदोलन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने के लिए कनाडा को लताड़ भी लगाई. आंदोलन में लेफ्ट के प्रति झुकाव रखने वाले समूह भी कूद पड़े हैं, कुछ ने तो उदारीकरण का भी विरोध किया, कुछ केवल बहती गंगा में हाथ धोने आ गए हैं. हालांकि सत्ताधारी एनडीए को नीचा दिखाने का ये अवसर बीजेपी को एक मौका दे गया कि वो इन ताकतों को 'टुकड़े-टुकड़े' गैंग करार दे.



मौजूदा किसान आंदोलन स्थानीय स्तर पर है और मिडिल क्लास से अछूता है. लिहाजा बीजेपी इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान नहीं है, क्योंकि पंजाब में पार्टी की चुनावी संभावनाएं सीमित हैं. ना ही पार्टी इस बात को लेकर चिंतित है कि ग्लोबल मीडिया विरोध प्रदर्शन को 'राष्ट्रीय स्तर' का बता रहा है. दूसरी ओर हरियाणा में बीजेपी की सहयोगी पार्टी जननायक जनता पार्टी का आधार वोट किसान हैं और दुष्यंत चौटाला के लिए ये आंदोलन मुसीबत बन सकता है. हालांकि चौटाला पहले ही किसानों की मांग पूरी ना होने पर समर्थन वापसी की बात कह चुके हैं. उनके कुछ विधायक तो पहले ही इसे भांप चुके हैं कि समर्थन वापसी के बाद हरियाणा में कोई दूसरी सरकार का गठन संभव नहीं है, इसलिए चुनावों का सामना करना होगा.
पंजाब की मुख्य विपक्षी पार्टियों की बात करें तो आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल ने बहुत बाद में किसानों के सुर में सुर मिलाया है, लेकिन आम आदमी पार्टी की स्थिति ऐसे सांप की है, जो ना उगल सकता है ना निगल सकता है. पार्टी को एक तरफ दिल्ली में शुद्ध हवा चाहिए तो दूसरी ओर किसान चाहते हैं कि पराली जलाने को लेकर बने कानून को वापस लिया जाए. अकाली दल के लिए कानून बनते समय मोदी कैबिनेट का हिस्सा होना ही उसकी साख पर बट्टा लगा गया.

कांग्रेस के लिए विपक्ष से डरने को कुछ खास तो नहीं है, लेकिन कैप्टन के खिलाफ उनके अपने ही मुखर हैं. राज्यसभा सांसद प्रताप सिंह बाजवा और उनके समर्थक मुख्यमंत्री के खिलाफ लंबे समय से विद्रोही राग अलापे हुए हैं. बाजवा के पार्टी छोड़ने को लेकर भी अफवाहें उड़ती रही हैं. पंजाब में अगर कांग्रेस में दो फाड़ होती है, तो ये बीजेपी के लिए फायदे की चीज होगी, क्योंकि ध्रुवीकरण के बने बनाए पैमाने पंजाब में फिट नहीं बैठते हैं. इसके साथ ही पंजाब कांग्रेस में नई लीडरशिप की संभावनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता, और पिछले चुनाव में नई नवेली आम आदमी पार्टी का ऊपर उठना सबने देखा है.

अमरिंदर सिंह के लिए सबसे बेहतर चीज ये है कि वो केंद्र सरकार को पीछे हटने पर मजबूर करे और कृषि कानून का मुख्य उद्देश्य भी पूरा हो जाए. क्योंकि पंजाब की अर्थव्यवस्था रेल परिचालन बंद होने से पटरी से उतरी हुई है और किसान आंदोलन से इसकी हालत बिगड़ती जा रही है. आंदोलन को लेकर ये माहौल भी बनता जा रहा है कि समृद्ध किसान अपना हित बचाने के लिए सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं. वॉशिंग मशीन, फुट मसाजर का आंदोलन में दिखना, इसे अमीर और गरीब के वर्ग संघर्ष में बांट सकता है.

अमरिंदर सिंह के लिए बेहतर यही होगा कि वे केंद्र के उस वादे को स्वीकार कर लें, जिसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर पंजाब से उपज खरीदती रहेगी और राज्य के टैक्स ट्रेड अधिकार का भी सम्मान करेगी. इसके साथ ही पंजाब के मुख्यमंत्री राज्य की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए बेलआउट पैकेज पर मोलभाव कर सकते हैं.

बेलआउट पैकेज की मांग करना अमरिंदर को इलेक्ट्रिसिटी बिल के मुद्दे पर विपक्ष के ऊपर बढ़त दिला सकता है. विपक्ष जहां किसानों के लिए डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर की मांग कर रहा है, वही पंजाब में ये राजनीतिक रूप से बड़ा संवेदनशील मुद्दा है. सच ये है कि डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर का फायदा बड़ी संख्या में मीडियम लेवल के किसानों को मिलता है, जिनकी संख्या कम है, लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावी हैं, जोकि बीजेपी द्वारा टारगेट किए जा सकते हैं.

कुछ तो आर्थिक और कुछ राजनीतिक मजबूरियों के चलते अमरिंदर सिंह उन वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं, जिन मुद्दों पर बात करके वे सत्ता में लौटे थे. बेरोजगारी इस समय चरम पर है, जीडीपी और कृषि की रफ्तार धीमी है और ड्रग्स के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. ये सभी मुद्दे 2022 के चुनाव में बुलंद रहेंगे, लेकिन अमरिंदर सिंह के लिए और ज्यादा खराब आर्थिक हालत को संभाल पाना मुश्किल होगा. केंद्र सरकार की तरह ही पंजाब के मुख्यमंत्री के लिए भी मौजूदा आंदोलन का सम्मानजनक हल बहुत मायने रखता है.

डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.
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