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पराली के मुद्दे पर क्‍यों चुप हैं राजनीतिक दल, क्‍या फिर गैस चैंबर में तब्‍दील होगी दिल्‍ली?

पराली पर क्‍यों चुप हैं राजनीतिक दल, क्‍या फिर गैस चैंबर में बदलेगी दिल्‍ली?

पराली पर क्‍यों चुप हैं राजनीतिक दल, क्‍या फिर गैस चैंबर में बदलेगी दिल्‍ली?

पराली जलाने (Stubble Burning) के लिए जिम्‍मेदार पंजाब, उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) होने हैं. ऐसे में हर पार्टी किसानों (Farmers) को साधने में लगी हुई हैं. कोई भी राजनीति पार्टी किसानों को चुनाव से ठीक पहले नाराज नहीं करना चाहती है.

  • News18Hindi
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    नई दिल्‍ली. सर्दी के मौसम की आहट के साथ ही एक बार फिर पराली जलाने (Stubble Burning) का मुद्दा सिर पर आ गया है. इस बार पराली जलाने वाले राज्‍यों में पहले जैसी सख्‍ती दिखेगी, इसे लेकर अभी से लोगों में मन में संशय है. पराली जलाने के लिए जिम्‍मेदार पंजाब, उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) होने हैं. ऐसे में हर पार्टी किसानों (Farmers) को साधने में लगी हुई है. ऐसे में हर साल पराली के मुद्दे पर मुखर रहने वाली राजनीतिक पार्टियां इस साल कुछ भी बोलने से इनकार कर रही हैं. राजनीतिक पार्टियों के रुख को देखकर कहा जा सकता है कि एक बार फिर दिल्‍ली का गैस चैंबर में तब्‍दील होना तय है.

    बता दें कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की दिल्ली और उसके पड़ोसी राज्यों के साथ हुई बैठक में पराली के मुद्दे पर चिंता जाहिर की जा चुकी है. हालांकि अभी तक इन राज्‍यों में मंत्री स्‍तरीय बैठक नहीं हो सकी है. हर साल पराली जलाए जाने से पहले इस मुद्दे पर अहम बैठक की जाती है. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए अभी इस बैठक को रोका गया है. ऐसा कहा जा रहा है कि सभी राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे को जान-बूझकर पीछे खिसका रही हैं, जिससे किसानों की नाराजगी से बचा जा सके.

    पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, पराली जलाने का सीजन 20 सितंबर से 30 नवंबर तक रहता है. इसके कुछ ही महीनों बाद पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव है, जिसे देखते हुए इस मुद्दे पर कोई भी राजनीतिक पार्टी बात करने को तैयार नहीं है.

    इस साल पराली जलाने की घटनाएं इसलिए भी बढ़ सकती हैं क्‍योंकि चुनावों को देखते हुए सभी चुनावी राज्‍यों से किसानों पर पराली जलाने के दर्ज मामले वापस ले लिए गए हैं. ऐसे में किसानों को लगने लगा है कि पराली जलाने पर उनके खिलाफ किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी. चुनाव में जिस तरह से इस बार किसानों का मुद्दा गरम है, उसे देखने के लिए कोई भी राजनीतिक दल उन्‍हें नाराज नहीं करना चाह रहा है.

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