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कोरोना वायरस से निपटने के लिए क्यों नहीं काफी हैं इतने उपाय?

Sudhir Jain | News18Hindi
Updated: March 23, 2020, 7:43 PM IST
कोरोना वायरस से निपटने के लिए क्यों नहीं काफी हैं इतने उपाय?
पटना के मीठापुर बस स्टैंड पहुंचे जिलाधिकारी कुमार रवि ने बताया कि अन्य प्रदेशों से लौट रहे लोगों को सार्वजनिक हित में उनके घरों तक पहुंचाना आवश्यक है. (प्रतीकात्मक फोटो)

तीन महीने के भीतर ही कोरोना वायरस (Coronavirus) ने लगभग हर देश की हर व्यवस्था को झकझोर दिया. अभी तक यही कहा जा रहा था कि इस महामारी (Pandemic) का कोई इलाज ढूंढा नहीं जा सका है और न ही जल्द ही इसका कोई टीका (Vaccine) बनने पाने के आसार हैं.

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  • Last Updated: March 23, 2020, 7:43 PM IST
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कोरोना वायरस (Coronavirus) ने क्या वाकई जीवविज्ञानियों (Biologists) के सामने इतनी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है? या फिर मौजूदा समस्या के बेकाबू फैलाव के लिए दुनियाभर के स्वास्थ्य प्रशासकों (Health Administrators) और शासकों की नाकामी को जिम्मेदार माना जाए? इन सवालों का मकसद किसी को कटघरे में खड़ा करना नहीं है. बल्कि इन सवालों के जवाब मौजूदा संकट (crisis) से निपटने की रणनीति (strategy) बनाने में काम आ सकते हैं.

बचाव के पारंपरिक तरीकों के अलावा ज्यादा सोचा नहीं
तीन महीने के भीतर ही कोरोना ने लगभग हर देश की हर व्यवस्था को झकझोर दिया. चौबीस घंटे पहले तक यही कहा जा रहा था कि इस महामारी का कोई इलाज ढूंढा नहीं जा सका है और न ही जल्द ही इसका कोई टीका बनने पाने के आसार हैं. बस एक ही उपाय बताया जा रहा है कि बचाव कीजिए. इस महामारी को तेजी से फैलने से रोकिए. ये पारंपरिक सुझाव कोई और नहीं बल्कि बड़े-बड़े देशों के शासकों की तरफ से दिए जा रहे हैं. नागरिकों की जान और दूसरी सलामती की जिम्मेदारी शासकों ने ही ले रखी है. ये अलग बात है कि हर देश के पास शासकों की मदद के लिए विशेषज्ञों का बड़ा भारी अमला हमेशा मौजूद रहता है. हर देश के पास चिकित्सा विज्ञान या जीव विज्ञान के शोध की अच्छी व्यवस्था भले न हो लेकिन कई बड़े देशों के पास चिकित्सा प्रौद्योगिकी (medical technology) का उन्नत तंत्र उपलब्ध है. फिर भी ये विकसित, संपन्न और समृद्ध देश एक वायरस की चुनौती से निपट न पाए हों, हैरत की बात है.

कटघरे में कौन?



संकट से नहीं निपट पाने की जिम्मेदारी से जीवविज्ञानियों (Biologists), फार्मास्यूटिकल विशेषज्ञों और चिकित्सा विज्ञानियों को बरी करने के कई आधार मौजूद हैं. मसलन आज से 13 साल पहले सार्स कोरोना वायरस पर लिखे एक शोध पत्र में विंसेंट सीसी चेंग, एस केपी लाउ, सीवाई वू और क्वॉक यू ने अपने शोध प़़त्र में आगाह किया था कि सार्स कोरोना जैसे वायरस आगे चलकर टाइम बम साबित होंगे. ऐसा कहने के पीछे यह ज्ञान था कि वायरस अपने डीएनए का रूप बदलते रहते हैं. ये बात वैज्ञानिकों ने पहले ही पता कर ली थी कि वायरस नया भेष धारण कर और मजबूत और ज्यादा घातक होते रहते हैं.

बहरहाल चेंग और उनके साथियों का यह शोध पत्र आज के भयावह संकट को लेकर आगाह कर चुका था. जरूरत थी उस पर गंभीरता से आगे शोध करने की. आज हमें पता चल रहा है कि कोविड-19 नाम का यह वायरस कोरोना समूह का ही एक नया वायरस है. जाहिर है कि उसके इलाज के लिए दवा और उसके टीके का निर्माण लगभग पुरानी तर्ज पर ही करना होगा. इसी बीच महामारी से निपटने में बुरी तरह नाकाम दिग्गज देश अमेरिका के राष्ट्रपति (American President) की तरफ से कल ही कोरोना की जो दवा सुझाई गई है वह कोई नई दवा नहीं बल्कि पहले से उपलब्ध फॉर्म्यूलेशन है.

हाइड्रॉक्सीक्लारोक्विन नाम की यह दवा मलेरिया और फेफड़ों (Lungs) में संक्रमण के इलाज के लिए पहले से ज्ञात है. जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिका के राष्ट्रपति यह बता रहे थे उसी आयोजन में विशेषज्ञों ने सवाल भी खड़े कर दिए. कहा गया है कि इस दवा को पूरी तौर पर सही इलाज मानना ठीक नहीं होगा क्योंकि यह विश्वसनीय शोधपद्धति से निकल कर नहीं आया है. यानी यह घटना बताती है कि कोरोना को लेकर किस हद तक भ्रम है. क्या इस बात पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि चीन, इटली, ईरान, अमेरिका जैसे देशों में कोई साढ़े तीन लाख लोगों के बीमार होने और 15 हजार लोगों की मौत के बाद कोई दवा बताई जा सकी और वह भी शोधपूर्ण आधार के बगैर सुझानी पड़ी. सबक यह है कि दुनियाभर की सरकारों को मेडिकल रिसर्च पर जरूरी खर्च करना ही पड़ेगा. नई परिस्थितियों में अब टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि साइंस पर ध्यान बढ़ाना पड़ेगा. यानी पूर्व ज्ञान के औद्योगिक इस्तेमाल के साथ साथ ज्ञान के सृजन पर ज्यादा ध्यान देना होगा.

आखिर ऐसा हुआ क्योंकर
दरअसल सरकारें सारे काम अपने हाथ में लेने लगीं हैं. वैसे जिम्मदारियां लेना अच्छी बात है. लेकिन विशेषज्ञता वाले काम में राजव्यवस्थाओं का इस तरह का अतिक्रमण या दंभ ठीक नहीं. लगता है कि शासकों को जनता के सामने अपनी नाकामी उजागर होने का भय बना रहता है. चीन में जो हुआ उसे यह कहकर छोड़ भी नहीं सकते हैं कि इस महामारी (Pandemic) की चपेट में पहले पहल वही आया था. उसने बहुत नुकसान झेला. लेकिन उसने अपनी पुख्ता माली हालत के बल पर इस संकट से पार भी पा लिया. लेकिन इटली में तो कमाल ही हो गया. उसके पास चीन का सबक उपलब्ध था. वह अपने यहां शुरू में ही युद्धस्तर पर कोरोना के परीक्षण की व्यवस्था बढ़ाकर संक्रमण के संभावित मरीजों की पहचान कर सकता था और समय रहते महामारी को फैलने से रोक सकता था.

सभी सरकारें टेस्टिंग की व्यवस्था से बचती क्यों हैं?
गौर से देखें तो दुनिया में हर देश की सरकारें कोरोना के परीक्षण पर जोर लगाने की बजाए उसे हतोत्साहित करती पाई गईं. जबकि यह पहले से पता था कि यह बहुत तेजी से फैलने वाला वायरस है. यह उत्तरोत्तर चक्रवृद्धि दर से फैलता है. इसे रोकने के लिए समय रहते इसके फैलने का चक्र रोकने की जरूरत थी. चक्र आसानी से तब रोका जा सकता था जब यह पता चलता कि किन लोगों में संक्रमण की संभावना हो सकती है. उनका फौरन से पेशतर परीक्षण किया जाए. इसके लिए कोरोना परीक्षण की यु़द्धस्तर पर व्यवस्था करने की जरूरत थी और इस समय भी है. लेकिन लगभग सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अपने अपने देश में सोशल डिस्टेंसिंग के लिए लॉकडाउन का ही उपाय अपनाया. और वह भी तब जब रोग तेजी से फैल चुका था. सवाल यह है कि ग्लोबलाइजेशन के स्वभाव वाले और ताबड़तोड़ औद्योगिकीकरण वाले इस दौर में समग्र रूप से सोशल डिस्टेटिंग (Social Distancing) क्या संभव है?

एकबारगी दो चार रोज़ या हफ़्ते दो हफ्ते के लॉक डाउन कर भी लें तो क्या इतने भर से, फैल चुकी महामारी को काबू करने में कामयाबी मिल सकती है? हां इतना जरूर हो सकता है कि कोरोना के आकार को कमतर दिखाया जा सके और अफरातफरी के हालात बनने से रोका जा सकेे. सरकारें यह प्रचार करने में सफल हो सकती हैं कि उन्होंने अपनी तरफ से कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन कई बड़े देशों में फीलगुड का यह उपाय छलावा साबित हो चुका है. हम और हमारे जैसे तमाम देश, जो बाद में इसकी चपेट में आए हैं, कम से कम यह सबक ले सकते थे कि कोरोना के युद्धस्तर पर परीक्षण की मुहिम चलाकर ही वास्तविक पीड़ितों को तय समय के लिए अलगाव में रखा जा सकता है. आज के दिन तक यह पता नहीं चल पा रहा है कि कोरोना पीड़ितों (Corona Infected) की वास्तविक संख्या क्या है. बहुत संभव है कि ये अज्ञात रोगी अनजाने में इस महामारी को फैला रहे हों. अभी भी वक्त है. समय रहते हमें कोरोना के पैथालाजिकल परीक्षण की व्यवस्था और बढ़ाने पर जोर लगा देना चाहिए. भले ही ऐसा करने से यह बात उजागर हो जाए कि रोग काफी फैल गया है. दहशत को रोकने के तमाम उपाय किए जा सकते हैं.

यह भी पहले से पता है
सिद्ध तथ्य है कि युवाओं में इस वायरस के संक्रमण के बावजूद कई बार रोग के लक्षण जल्दी दिखाई नहीं देते. परीक्षण की कमी के कारण ऐसे संक्रमित युवा (Infected Youth) निश्चिंत होकर सबसे मिलते जुलते हैं, और उम्रदराज लोगों को संक्रमित करने का अंदेशा पैदा करते हैं. सिर्फ अपनी बात करें तो दूसरे देशों की तुलना में अपने देश मेे कोरोना का संक्रमण इस समय जरूर कम दिखाई दे रहा है लेकिन एक्सपोनेंशियल यानी चक्रवृद्धि दर से हिसाब लगाएं तो रोगियों की वास्तविक स्थिति चिंताजनक ही समझी जानी चाहिए. वैसे भी 22 मार्च को जनता कफर्यू की जो सांकेतिक कवायद की गई है उससे नागरिकों में एकजुटता का अहसास तो कराया गया है लेकिन उससे यह इशारा भी मिला है कि हम निश्चिंत नहीं हैं.

कितनी मुमकिन है सभी के परीक्षण की व्यवस्था
खर्च के लिहाज से अपने देश के लिए यह बहुत बड़ा काम है. वैसे भी एक सौ 35 करोड़ लोगों की टेस्टिंग का काम फौरन ही करने के लिए हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था सक्षम नहीं है. कोई सात लाख करोड़ रुपये खर्च करके यह काम करना हमारे बूते के बाहर है. जिस तरह से 75 जिलों में आंशिक लाॅकडाउन (Partial lockdown) का निर्णय लिया गया है वह भी मुश्किल ही दिखता था लेकिन दूसरे देशों के अनुभव को देखकर यह काम किया ही गया. लेकिन यह करने के बावजूद फिर वही सवाल खड़ा दिखाई दे रहा है कि यह कोरोना बंदी कितने दिनों तक जारी रखी जा सकती है. लंबे समय तक इसे जारी रखने में नागरिकों का कितना सहयोग मिल पाएगा? यानी समग्र रूप से सोशल डिस्टेंटिंग की बजाए संभावित कोरोना पीड़ितों की पहचान ही चारा बचता है. युद्धस्तर पर टेस्टिंग की व्यवस्था के अलावा कोई और विकल्प फिलहाल तो नज़र नहीं आता.

बचाव के लिए हाथ धोने और सैनेटाइज़र का प्रचार
दोनों ही तरीके से वायरस से तात्कालिक मुक्ति के उपाय के तौर पर प्रचारित हुए. यह बात भी सही है कि अभी हम संक्रमण के दूसरे चरण में ही हैं. यानी संक्रमित देशों से लौटे लोगों या उनके संपर्क में आए लोगों को ही संवेदनशील मानकर चल रहे हैं. यानी समस्या सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित मानी जा रही है. इसीलिए साबुन से देर तक हाथ धोने और अल्कोहलयुक्त सैनेटाइज़र (Alcohol based Sanitiser) और मास्क पहनने का जोर शोर से प्रचार किया गया. लेकिन शहरी बाजारों में इन चीजों की कमी पड़ गई. मामला जान पर आफत का है सो दहशत में शहरी लोग वह सब कर रहे हैं जैसा करने के लिए उनसे कहा जा रहा है. लेकिन और अच्छा तब हो जब उन्हें यह बताया जाए कि बचाव के इन उपायों का असर आखिर होता किस तरह से है. मसलन साबुन से हाथ धोते रहने के पीछे के वैज्ञानिक तर्क के जरिए जागरूकता और ज्यादा बढ़ाई जा सकती है.

किस तरह काम करता है साबुन
दरअसल वायरस किसी मजबूत जैविक कोश में बंद नहीं होता. वह सिर्फ डीएनए (DNA) के रूप में होता है. यानी डीआक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड नाम का यह जैविक पदार्थ अपनी रक्षा के लिए अपने चारों तरफ एक पतली झिल्ली या एक लेप चढ़ाए रखता है. किसी के हाथ पर अगर यह वायरस लगा हो तो हाथों को साबुन के धोने से वायरस का सुरक्षा लेप या कवच घुलकर बह जाता है और झिल्ली घुलने के कारण वायरस जीवित नहीं रह पाता.

इसी तरह सैनेटाइजर और मास्क (Mask) किस तरह से बचाव करते हैं? यह बात तफसील से प्रचारित की जानी चाहिए. वरना आम लोग इसे हल्के में ही लेते रहते हैं. ऐसे मुश्किल समय में मीडिया जागरूकता अभियान चलाकर बड़ा यश पा सकता है. हालांकि कोरोना जैसे वायरस के मामले में ये सारे उपाय एक सीमा तक ही कारगर हैं. खासतौर पर देश के नागरिकों की माली हालत के मद्देनज़र उनसे खुद ही बचाव के सारे उपाय करने की उम्मीद करना भी ठीक नहीं हैं. ऐसे संकट में सरकारी खजाने ही काम आते हैं.

दवा के इस्तेमाल को लेकर आने वाली है नई चुनौती
आज दिन तक इतना तो तय हो गया है कि कोरोना महामारी में फेफड़ों में संक्रमण की दिक्कत कम करने के लिए पहले से प्रचलित दवाएं इस्तेमाल होने लगेंगी. चिकित्सा विज्ञानी और फार्मा कंपनियां यह सुझाव लेकर भी आएंगी कि वायरस के असर को कम करने के लिए निरोधी या प्रतिरोधी दवाई भी ली जा सकती है. लगे हाथ यह जिक्र भी किया जा सकता है कि कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भारत में हाइड्रॉक्सीक्लारोक्विन बनाने वाली सबसे मशहूर कंपनी आइपीसीए (IPCA) के शेयर अचानक तेजी से बढ़ गए. सोमवार को सवेरे शेयर बाजार के बुरी तरह ढहने के बीच किसी फार्मा कंपनी के शेयर बढ़ना कोई अनोखी बात भी नहीं है.

बहरहाल कोरोना के इलाज के अज्ञान के बीच एक मुश्किल यह आ सकती है कि कोरोना की दहशत में कुछ दवाइयों का बेजा इस्तेमाल न होने लगे. इस मामले में देश की चिकित्सा नियामक संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) पर बड़ी जिम्मेदारी आती दिखाई पड़ती है.

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First published: March 23, 2020, 7:03 PM IST
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