बिहार महागठबंधन ने एक साल पहले बनी VIP को क्यों दी तीन सीटें

तेजस्वी यादव के साथ मुकेश साहनी (फाइल फोटो)

तेजस्वी यादव के साथ मुकेश साहनी (फाइल फोटो)

साहनी ने अभी तक एक भी चुनाव नहीं लड़ा है. लेकिन निषाद समुदाय में उनके प्रभाव को देखते हुए 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें स्टार प्रचारक बनाया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2019, 11:15 PM IST
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सुहास मुंशी



बिहार में महागठबंधन की सीट शेयरिंग में महादलित पार्टियों को 11 सीट देकर राष्ट्रीय जनता दल ने एक बड़े सामाजिक गठबंधन का तानाबाना बुनने की कोशिश की है. इसके पीछे राजद का मकसद है प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों पर बीजेपी को जाति के आधार पर वोटरों को रिझाने से रोकना.



पटना में शुक्रवार को महागठबंधन ने सीटों के बंटवारे की घोषणा की. इस सीट शेयरिंग में सबसे अधिक फायदे में रही- विकासशील इंसान पार्टी (VIP).





यह पार्टी एक साल से भी कम वक्त पहले अस्तित्व में आई है और इसने अभी तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है. ऐसे में इसे महागठबंधन में तीन सीटें मिलने को पार्टी की बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है. पार्टी के प्रमुख मुकेश साहनी ने जिस तरीके से प्रदेश की पिछड़ी जातियों को मोबिलाइज किया है, उसे देखते हुए इस सीट शेयरिंग के मायने समझ में आते हैं.
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साहनी ने निषाद विकास संघ से अपने काम की शुरुआत की. यह संघ की शुरुआत निषादों को एकजुट करने के मकसद से की गई थी. निषाद 20 उपजातियों में बंटे हुए हैं. साहनी ने कई मौकों पर दावा किया है कि प्रदेश के करीब 1.75 करोड़ निषादों पर उनका प्रभाव है. निषाद प्रदेश की 30 प्रतिशत ईबीईस कम्युनिटी का हिस्सा हैं.



न्यूज 18 के साथ एक इंटरव्यू में साहनी ने कहा, “निषाद समुदाय के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि महागठबंधन में हमें 3 सीटें मिली हैं.”



साहनी ने अभी तक एक भी चुनाव नहीं लड़ा है. लेकिन निषाद समुदाय में उनके प्रभाव को देखते हुए 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें स्टार प्रचारक बनाया था.



अखबारों में छपने वाले बीजेपी के विज्ञापनों और पोस्टरों में निषाद का नाम शामिल किया गया था. उन्होंने ‘आगे बड़ी लड़ाई है, एनडीए में भलाई है’ का नारा उन्होंने ही दिया था.



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भले ही बीजेपी वह चुनाव हार गई थी लेकिन साहनी का दावा है कि बिहार के 7 प्रतिशत निषादों ने उनकी वजह से ही बीजेपी को वोट दिया था.



साहनी लंबे वक्त से मांग कर रहे हैं कि निषाद समुदाय को अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया जाए. उनकी इस मांग के चलते निषाद समुदाय का समर्थन उन्हें मिल रहा है.



उत्तरी यूपी और पश्चिमी बिहार के लोकसभा क्षेत्रों में निषाद समुदाय की जनसंख्या काफी है. गोरखपुर उपचुनाव में सपा ने एक निषाद उम्मीदवार को उतारा था. इस उम्मीदवार ने योगी आदित्यनाथ का गढ़ माने जाने वाली इस सीट पर बीजेपी को हरा दिया था. निषाद समुदाय भले ही सिर्फ अपनी संख्या के आधार पर चुनाव में बहुत अधिक असर न दिखा सके लेकिन अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर यह समुदाय बड़ा असर दिखा सकता है.



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बिहार की 20 लोकसभा सीटों और यूपी की करीब दर्जनभर सीटों पर इस समुदाय की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का असर साफतौर पर नजर आने वाला है.



वीआईपी के अलावा महागठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा की RSLP को पांच सीटें मिली हैं. माना जा रहा है कि ऐसे बिहार के ताकतवर ओबीसी समुदाय कुशवाहा कम्युनिटी को ध्यान में रखते हुए किया गया है. यह समुदाय अभी तक कुर्मी समुदाय के साथ मिलकर वोट करता था. बता दें कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार कुर्मी समुदाय से ही आते हैं.



साल 2014 में कुशवाहा की पार्टी को एनडीए गठबंधन में तीन सीटें मिली थीं, इस बार एनडीए ने उन्हें तीन से ज्यादा सीटें देने इनकार कर दिया. आरएलएसपी को पांच सीटें दिये जाने को कुशवाहा और कुर्मी समुदाय को एक दूसरे से अलग करने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है.



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