ANALYSIS: पानीपत की हार के जरिए 2019 जीतने का अमित शाह का 'मराठा प्लान'

राजनीतिक गलियारों में अमित शाह के इस नई रणनीति को हिंदू अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है. पहली नजर में देखा जाए तो ऐसा आकलन करना गलत भी नहीं होगा, लेकिन अमित शाह की राजनीति को समझने वाले जानते है कि वो 'एक तीर से कई शिकार' करने में माहिर हैं.

Manoj Khandekar | News18Hindi
Updated: January 21, 2019, 2:57 PM IST
ANALYSIS: पानीपत की हार के जरिए 2019 जीतने का अमित शाह का 'मराठा प्लान'
अमित शाह की फाइल फोटो
Manoj Khandekar | News18Hindi
Updated: January 21, 2019, 2:57 PM IST
हिंदी हार्टलैंड के हालिया विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जब पहली सार्वजनिक रूप से कार्यकर्ताओं से मुखातिब हुए थे तो उनके तेवर बदले हुए थे. एक सप्ताह से भी कम समय में हार को भुलाकर अमित शाह ने कहा था बीजेपी का कार्यकर्ता जय और पराजय से न तो उत्साहित होता है न विचलित. साथ ही उन्होंने विधानसभा चुनाव के नतीजों को पीछे छोड़ते हुए 2019 आम चुनाव का बिगुल फूंक दिया था.

भाजपा प्रमुख ने 2019 आम चुनाव की तुलना पानीपत के तीसरे युद्ध से ही कर डाली थी. इसके बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं में छत्रपति शिवाजी और पेशवाओं का जिक्र तो अमित शाह की जुबां से 'अगर चुनाव में हमारी हार होती है तो यह पानीपत की लड़ाई में मराठाओं की हार की तरह होगी.' बात सुनाई दे रही है.

भाजपा प्रमुख का लोकसभा चुनाव के लिए यह नया दांव है. उन्होंने 250 से ज्यादा साल पुरानी हिंदू मराठाओं की हार को आधार बनाकर सियासी बिसात पर अपना दांव खेल दिया है. 2019 के चुनावों को युद्ध का नाम देने वाले भाजपा के 'चाणक्य' ने कहा कि इन्हें पानीपत की तीसरी लड़ाई की तरह देखा जा सकता है, जिसके बाद मराठों को 200 साल की गुलामी करनी पड़ी थी.

दुर्भाग्य से पानीपत के तीसरे युद्ध जो अब्दाली और सदाशिवराव भाऊ के बीच लड़ा गया, उसमें मराठा सेना पराजित हो गई. यह निर्णायक युद्ध था. 131 युद्ध जीतने वाली मराठा सेना एक युद्ध हार गई और इसके कारण 200 साल गुलामी झेलनी पड़ी.


राजनीतिक गलियारों में अमित शाह के इस नई रणनीति को हिंदू अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है. पहली नजर में देखा जाए तो ऐसा आकलन करना गलत भी नहीं होगा, लेकिन अमित शाह की राजनीति को समझने वाले जानते है कि वो 'एक तीर से कई शिकार' करने में माहिर हैं. ऐसे में पानीपत, मराठा और पेशवाओं के जरिए महाराष्ट्र की सियासत में विरोधियों (जिसमें शिवसेना भी शामिल है) को शह और मात देने का दांव भी छिपा है.

वरिष्ठ पत्रकार सुरेश भटेवारा का मानना है, 'विरोधियों के एक मंच पर आने से भाजपा को डर सता रहा है. इसकी वजह से भाजपा हर जगह पानीपत का जिक्र कर अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने का प्रयास कर रही है, लेकिन भाजपा को असली इतिहास पता है या नहीं इस बारे में शंका है.'


दरअसल, उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 48 सीटें हैं. ऐसे में शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के जरिए कांग्रेस यहां ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करना चाहती है. भाजपा को भी पता है कि महाराष्ट्र के जरिए सत्ता के द्वार एक बार फिर खुल सकते है. ऐसे में मराठाओं की हार, पानीपत और पेशवाओं को चुनावी का केंद्र बिंदू बनाकर भाजपा ने महाराष्ट्र में मराठाओं को अपनी तरफ करने के लिए अपनी चाल खेल दी है.
भाजपा का गेम चेंजर 'प्लान'
राज्य में ये माना जाता है कि ओबीसी वर्ग हमेशा से भाजपा के साथ रहता है. भाजपा के कई बड़े नेता इसी तबके से आते हैं, लेकिन मराठाओं में अब भी भाजपा पैठ करने में कामयाब नहीं हुई है. ऐसे में माना जा रहा है कि अब राज्य की करीब 33 फीसदी आबादी वाले मराठा समाज को भी अपने पाले में खींचने के लिए भाजपा नयी रणनीति पर काम कर रही है. इसकी शुरुआत मराठाओं को 16 फीसदी आरक्षण के साथ हुई थी. मराठाओं का 'दिल जीतने' वाले फडणवीस सरकार के इस कदम को 'मास्टर स्ट्रोक' माना गया था, लेकिन पानीपत, पेशवाओं और मराठाओं की हार का अपमान, को लगातार फोकस करना इसी 'मोमेंटम' को बरकरार रखने की नजर से देखा जा रहा है.

क्यों महत्वपूर्ण है 'मराठा'
महाराष्ट्र की राजनीति में मराठाओं को 'किंगमेकर' माना जाता है. राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से करीब 22 सीटों और विधानसभा की 288 सीटों में से अधिकांश सीटों पर मराठा वोट निर्णायक माने जाते हैं. ऐसे में भाजपा हर हाल में मराठा समाज का विश्वास जीतना चाहती है.

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2019 के चुनाव में भाजपा की रणनीति मराठा और ओबीसी गठजोड़ के जरिए राज्य की अधिकांश सीटों पर फतह हासिल करना है. पिछले चुनाव में भाजपा और शिवसेना गठबंधन को 42 सीटें मिली थीं. भाजपा के खाते में 23 और शिवसेना के खाते में 18 सीटें थीं, जबकि एक सीट गठबंधन के सहयोगी स्वाभिमानी पक्ष को मिली थी.

भाजपा जानती है कि मोदी लहर में मिली सफलता को बरकरार रखना आसान नहीं होगा. ऐसे में पार्टी ने अपनी रणनीति में परिवर्तन करते हुए ओबीसी वर्ग के साथ मराठा वर्ग को साधने की कवायद में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

एनसीपी के जरिए शिवसेना को पटखनी
मराठा वर्ग में पैठ जमाने के जरिए भाजपा की रणनीति सिर्फ एनसीपी की जमीन को कमजोर करना नहीं है, बल्कि इसके जरिए शिवसेना में भी संदेश छिपा हुआ है. दबाव की राजनीति कर रही शिवसेना यदि चुनाव पूर्व समझौते के लिए तैयार नहीं होती है तो 2019 की 'पानीपत' की लड़ाई में भाजपा मराठा और ओबीसी वर्ग के जरिए महाराष्ट्र में बड़ी जीत हासिल करने की रणनीति पर काफी आगे बढ़ चुकी है.

(अजय कौटीकवार के इनपुट के साथ)

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