NDA से राहें अलग क्यों कर रहे हैं पुराने भरोसेमंद सहयोगी दल?

एनडीए के सहयोगी दल अब साथ छोड़ रहे हैं.
एनडीए के सहयोगी दल अब साथ छोड़ रहे हैं.

किसी न किसी बहाने से सहयोगी दल एनडीए (NDA) छोड़ रहे हैं लेकिन बीजेपी (BJP) चिंतित नहीं है क्योंकि लोकसभा में उनके पास पूर्ण बहुमत है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 23, 2020, 3:59 PM IST
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कल्‍याणी शंकर
नई दिल्‍ली. बीजेपी (BJP) और उनके सहयोगियों के बीच कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. अधिकतर क्षेत्रीय दल साधारण कारणों से नाराज हैं कि बीजेपी किसी भी कीमत पर पार्टी के आधार का विस्तार करना चाहती है. किसी न किसी बहाने से सहयोगी दल एनडीए (NDA) छोड़ रहे हैं लेकिन बीजेपी चिंतित नहीं है क्योंकि लोकसभा में उनके पास पूर्ण बहुमत है. उच्च सदन में भी पार्टी बहुमत के करीब है.

हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार में 2014 और 2019 में सहयोगियों को कैबिनेट में शामिल किया गया लेकिन बोलने वालों में भी कमी नहीं आई. पीएम मोदी ने एक बार कहा था कि गठबंधन भारतीय लोकतंत्र के लिए जरूरी है. उनकी सरकार राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को जोड़ती है.
बीजेपी नेतृत्व ने पिछली बार तेलुगु देशम पार्टी और शिवसेना को गठबंधन छोड़ने से रोकने का प्रयास नहीं किया और न ही उन्हें राजी करने की कोशिश की. यही इस सप्ताह अकाली दल की एकमात्र मंत्री हरसिमरत कौर बादल द्वारा पद छोड़ने के दौरान हुआ.
अकाली दल ने संसद में किसानों से जुड़े तीन बिल पास करने को लेकर विरोध किया था. बीजेपी का ऐसा बर्ताव रहा है कि 'आपको जाना है तो जाएं.' पिछले छह महीने में ज्यादातर गठबंधन के साथी एनडीए छोड़कर जा चुके हैं लेकिन यह भी देखने को मिला है कि उनके साथ नए साथी जुड़े हैं. एनडीए में तेलुगु देशम पार्टी, शिवसेना, अकाली दल, जेडीयू और पीडीपी मुख्य पार्टियां थीं. इनमें से शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी जा चुकी हैं. अकाली दल उसी रास्ते पर जाने के प्रयास में है और पीडीपी से बीजेपी ने खुद किनारा कर लिया. अब एनडीए में सिर्फ जेडीयू बची है. इससे यह गठबंधन कमजोर हुआ है.



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ऐसा नहीं है कि बीजेपी को गठबंधन वाले दलों की जरूरत नहीं है. राज्यसभा की 250 सीटों में बीजेपी के पास 87 सीट है और सहयोगियों को मिलाकर यह 100 से बाहर जाती है. 17वीं लोकसभा में एनडीए के सदस्य 335 हैं और सहयोगियों की आवश्यकता नहीं है. जब बीजेपी सत्ता में आई थी तब उनके पास राज्यसभा में 23 सीटें थी लेकिन आज उनकी संख्या 87 हैं. पार्टी ने अब तक जम्मू और कश्मीर को विभाजन करने या सीएए जैसे विवादास्पद बिलों को पास करने में सफलता हासिल की है. किसानों से जुड़े तीन बिल भी इस तरह पास हो गए हैं.

दूसरी बात यह भी है कि बीजेपी के ज्यादातर सहयोगी दल छोटे और क्षेत्रीय हैं जिनका अन्य राज्यों पर प्रभाव नहीं है. तीसरी चीज यह है भी है कि बीजेपी और उनकी लीडरशिप में बदलाव आया है. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जब नेतृत्व करते थे तो वे बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल और मुफ़्ती मोहम्मद सईद से डील करते थे. दूसरी जनरेशन ने चीजें अब अपने हाथ में ली हैं और बीजेपी में भी बदलाव आया है. नरेंद्र मोदी के आने के बाद बीजेपी में भी बदलाव आया है. मोदी युग में सहयोगियों के लिए मामला आसान नहीं है. यही वजह है कि तेलुगु देशम पार्टी और शिव सेना ने गठबंधन छोड़ दिया और अकाली दल को चिंता है.

बीजेपी ने पिछले छह सालों में अपना आधार बढ़ाया है और यह सबसे अमीर पार्टी बन गई है. ज्यादातर बड़े राज्यों में बीजेपी पावर में है और अब दक्षिण और नॉर्थ-ईस्ट में भी विस्तार की तरफ नजरें हैं. त्रिपुरा में लेफ्ट को हटाया और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पर बढ़त बनाने में कामयाब रही है. ओडिशा में भी सत्तारूढ़ पार्टी को चुनौती देने वाली मुख्य पार्टी बनी है. पीएम मोदी अपने सहयोगियों की वापसी के लिए दरवाजे खुले रखना चाहते हैं.  बावजूद इसके बीजेपी अन्य राज्यों में जहां उनकी सरकार नहीं है, वहां पावर में आने के लिए आक्रामकता से उद्देश्य की तरफ बढ़ रही है. मोदी अभी मजबूत स्थिति में हैं इसलिए उन्हें सहयोगियों की जरूरत नहीं है लेकिन सहयोगियों को बीजेपी की जरूरत है.

एक समय ऐसा था जब बीजेपी की ज्यादा पहुंच नहीं थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और पंजाब में बीजेपी के विस्तार के प्रयास लचीले साबित हुए हैं. एनडीए के सहयोगियों की कई शिकायतें हैं. उन्हें लगता है कि अहम मामलों में उनसे सलाह नहीं ली जाती. सहयोगी वापस वाजपेयी युग को याद करते हैं जहां संयोजक के लिए सहयोगी को चुना गया और वाजपेयी एनडीए के अध्यक्ष बने रहे. अब एनडीए की बैठकें नहीं होती. पीएम मोदी शासन ऐसे संबंध बनाना चाहता है जिनसे बीजेपी को अन्य दलों के नुकसान से लाभ हो. ज्यादातर ऐसा पिछले छह सालों में हुआ है.

बीजेपी अपना विस्तार करने और आने वाले समय में अकेले जाने के प्रयासों में सही है. अगले चुनावों से पहले पुराने सहयोगी वापस आ सकते हैं और नए जा सकते हैं. इसके अतिरिक्त बीजेपी अकेले ही जाने का प्रयास कर रही है. बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि जब तक पार्टी राज्यों और केंद्र में चुनावी रूप से मजबूत रहेगी, सहयोगी दल उनके साथ ही रहेंगे. अभी अगले चुनावों में चार साल का समय बचा हुआ है.
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