क्यों राजस्थान में BSP के साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहती कांग्रेस?

राजस्थान में दलित 17 फीसदी हैं जो कि राजस्थान में अगली सरकार बनाने के लिए काफी महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.

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Updated: June 13, 2018, 7:38 PM IST
क्यों राजस्थान में BSP के साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहती कांग्रेस?
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: June 13, 2018, 7:38 PM IST
(नारायण बारेठ)

राजस्थान में बसपा 1993 से ही अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है लेकिन अभी तक उसे बहुत सफलता नहीं मिली. दिल्ली में कांग्रेस लगातार इस बात पर विचार कर रही है कि बसपा के साथ गठबंधन कर लिया जाए लेकिन कांग्रेस की राज्य इकाई ने इस तरह के किसी भी गठबंधन से इनकार कर दिया.

राजस्थान में दलित 17 फीसदी हैं जो कि राजस्थान में अगली सरकार बनाने के लिए काफी महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. बीएसपी पहले ही अपने नेताओं से कह चुकी है कि वो राजस्थान में अपनी तैयारी तेज़ कर दें. राजस्थान में दलितों के लिए 34 सीटें आरक्षित हैं. पिछले चुनाव में 2 सीटें छोड़कर सारी बीजेपी ने जीत ली थीं. कांग्रेस के पूर्व मंत्री और दलित नेता बाबूलाल नागर ने कहा कि बसपा के साथ एलायंस करने की कोई ज़रूरत नहीं है. हमें पता है कि अभी समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है कि बीजेपी को हराया जाए लेकिन औपचारिक एलायंस का कोई अर्थ नहीं है.

उनका कहना है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस दलितों के लिए आरक्षित सभी सीटों पर हार गई. इसलिए उसे और ज़्यादा से ज़्यादा दलितों को पार्टी अफेयर्स में शामिल करना चाहिए. उन्होंने कहा कि राजस्थान की स्थिति मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तुलना में अलग है क्योंकि पारंपरिक रूप से दलित हमेशा कांग्रेस का समर्थन करते आए हैं.

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सेंटर फॉर दलित राइट्स के डायरेक्टर पीएल मिमरोथ का कहना है कि पिछले दिनों की कुछ घटनाओं ने दलितों को कांग्रेस पार्टी की ओर से कुछ निराश किया है. चाहे वो पूर्व मंत्री भरोसी लाल जाटव का घर जलाया जाना हो चाहे अलवर के भिवाडी में होली पर दो दलित युवकों को पीटकर मार डालने की घटना हो. इन सभी मामलों में कांग्रेस दलितों की भावनाओं पर खरी नहीं उतर पाई.

शुरुआती दौर में बीएसपी का वोट आधार बढ़ा लेकिन पिछले चुनाव में फिर से घट गया. दरअसल, 1993 में बीएसपी ने पहली बार 50 उम्मीदवार मैदान में उतारे और उसे 0.56 फीसदी वोट मिला. 1998 के विधानसभा चुनाव में 2.17 फीसदी वोट पाकर पार्टी ने दो सीटें जीत लीं. 2003 के विधानसभा चुनाव में भी बीएसपी दो ही सीटें जीत सकी लेकिन इस बार उसका वोट प्रतिशत थोड़ा बढ़कर 3.97 फीसदी हो गया.

2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 35.65 फीसदी वोट मिला और बीजेपी ने 39 फीसदी वोट पाकर सरकार बनाई. इस चुनाव के बाद कांग्रेस बीएसपी को साथ लेकर चलने पर विचार करने लगी क्योंकि दोनों को वोट मिलाकर लगभग बीजेपी के बराबर हो रहा था. 2008 के अगले विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने 7.60 फीसदी वोट पाकर 6 सीटें जीतीं. लेकिन बीएसपी के सारे 6 विधायक कांग्रेस के साथ मिल गए और कांग्रेस ने सरकार बना ली.

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बीएसपी के लिए यह काफी बड़ा झटका था क्योंकि इस घटना के बाद दलितों के मन में कहीं ये बात बैठ गई कि बीएसपी को वोट देना बेकार है. शायद इसी कारण से 2013 में बीएसपी ने 183 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा लेकिन उसे कुल 3.37 फीसदी वोट ही मिल सके.

कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री नागर ने कहा कि लोगों को लगता है कि बीएसपी को वोट देना वोट बर्बाद करना है. दलित कार्यकर्ता भंवरलाल मेघवंशी का कहना है कि दलित कांग्रेस को ही अपनी पार्टी मानते हैं लेकिन पिछले चुनावों में वो मोदी लहर की वजह से प्रभावित हुए.

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उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े चार सालों में काफी कुछ हो चुका है. रोहित वेमुला केस, डेल्टा मेघवाल रेप केस और भारत बंद के दौरान हुई हिंसा ऐसे ही घटनाएं हैं जिन्होंने बीजेपी की छवि को खराब किया है. लेकिन कांग्रेस को भी सिर्फ शब्दों से ही काम नहीं लेना चाहिए. नागपुर मे 6 दलित मारे गए और कांग्रेस ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. लेकिन खेमचंद धमानी जो कि अलवर जिले से हैं उन्होंने कहा कि कांग्रेस को बीएसपी से एलायंस कर लेना चाहिए.

बीएसपी को मिलने वाला हर वोट कांग्रेस का है और ये बात कांग्रेस को समझना चाहिए. उन्होंने कहा कि अलवर लोकसभा उपचुनाव में बीएसपी ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा तो परिणाम आपके सामने है.

धमानी ने कहा कि दलितों के पास कांग्रेस से शिकायत होने का पूरा कारण है क्योंकि जब भारत बंद के दौरान दलितों को पीटा जा रहा था तो कांग्रेस चुपचाप खड़ी होकर देख रही थी. दलित ऐक्टिविस्ट ओम प्रकाश का कहना है कि बीएसपी राजस्थान में अपना आधार खो चुकी है.
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