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आखिर क्यों NRC मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठा पा रही है कांग्रेस?

राहुल गांधी और तरुण गोगोई (पीटीआी)

राहुल गांधी और तरुण गोगोई (पीटीआी)

कई राज्यों में चुनाव को देखते हुए कांग्रेस को बहुत सम्हल कर चलना होगा. वो किसी भी पक्ष को नाराज़ नहीं कर सकती.

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    (सुमित पांडेय)

    तीन बार असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई ने एनआरसी के बारे में कहा कि यह उनकी सरकार का आइडिया था. उनकी इस प्रतिक्रिया से कांग्रेस मुश्किल में पड़ सकती है क्योंकि इससे लोकसभा की 14 सीटें दांव पर लगी हैं इसके अलावा दूसरे राज्यों के चुनावों पर भी असर पड़ सकता है.

    इसीलिए कांग्रेस इस पर बहुत सोच-समझकर बयान दे रही है. तरुण गोगोई के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी एनआरसी में 40 लाख लोगों के नाम न होने पर बहुत सोच-समझकर बयान दिया. उन्होंने एनआरसी पर सवाल नहीं उठाए हैं बल्कि रजिस्टर को ड्राफ्ट करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया है.

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    कई राज्यों में चुनाव को देखते हुए कांग्रेस को बहुत संभल कर चलना होगा. वह किसी भी पक्ष को नाराज़ नहीं कर सकती. ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने यह तरीका तरुण गोगोई से ही सीखा है. तरुण गोगोई जिस तरह से हितेश्वर सैकिया से सत्ता छीनने के बाद 15 सालों तक असम पर के मुख्यमंत्री पद पर काबिज़ रहे वह उनकी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देता है.

    साल 2006 में उन्होंने बदरुद्दीन अजमल की 'ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट' के साथ किसी भी तरह का एलायंस करने से मना कर दिया था. उनका काफी प्रसिद्ध वाक्य था, 'कौन है अजमल?' उन्होंने कांग्रेस को बहुमत की जनसंख्या की संवेदनाओं के साथ जोड़ा जिससे असम गण परिषद के लिए राजनीति की कोई जगह ही नहीं बची.

    लेकिन खास बात ये है कि जब आठ साल बाद गौरव गोगोई कालियाबोर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे तो तत्कालीन सीएम ने अजमल के साथ अपने संबंधों को बेहतर बना लिया था.

    बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और टीएमसी नेता ममता बनर्जी द्वारा राज्यसभा में एनआरसी पर दिया गया बयान असम के बाहर के क्षेत्र में पड़ने वाले इसके प्रभाव को दिखाता है.

    ममता बनर्जी ने एनआरसी को लेकर मुहिम तेज़ कर दी है. ममता बनर्जी सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की परेशानियों की बात कर रही हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल की कुछ संसदीय क्षेत्रों में मुसलमानों की जनसंख्या एक तिहाई से अधिक है. क्षेत्रीय पार्टियों के लिए इस तरह के मुद्दों पर सीधे-सीधे बात करना काफी आसान होता है लेकिन राष्ट्रीय पार्टियों के लिए ये उतना आसान नहीं होता. जैसे कावेरी मुद्दे पर जेडीएस और डीएमके के लिए बात करना उतना जटिल नहीं है जितना कि बीजेपी या कांग्रेस के लिए.

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    पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष दिलीप घोष ने राज्य में भी असम जैसे हालात होने का दावा करते हुए एनआरसी के मुद्दे पर सत्ताधारी तृणमूल पर निशाना साधा. बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनावों में होने वाले किसी तरह के नुकसान की भरपाई देश के पूर्वी राज्यों से करने की सोच रही है और इसी के मद्देनजर पार्टी यहां टीएमसी के खिलाफ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है.

    राज्यसभा में मंगलवार को राजीव गांधी और असम अकॉर्ड का जिक्र करके अमित शाह ने इस बेहद जटिल सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे से निपटने में कांग्रेस की कमजोरी को ही उजागर किया है. मध्यमार्गी पार्टी होने के नाते कांग्रेस नेतृत्व के लिए आगे की डगर कठिन ही लग रही है और पार्टी के कमजोर सांगठनिक ढांचे की वजह से उनका सफर और मुश्किल होने की आशंका है.

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