EXIT POLL विश्‍लेषण: बंगाल में क्यों दिख रही कांग्रेस-लेफ्ट की बुरी हार?

बंगाल में कांग्रेस की हार एग्जिट पोल में दिखाई गई है. (File pic)

बंगाल में कांग्रेस की हार एग्जिट पोल में दिखाई गई है. (File pic)

West Bengal Exit Polls: अलग अलग एग्जिट पोल में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन को ज्यादातर में करीब 10 से लेकर 25 के करीब सीटें दी गई हैं.

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नई दिल्‍ली. चुनाव आयोग आज यानि रविवार को चार राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश के नतीजे घोषित करेगा. हालांकि, मतदान के बाद आए 5 राज्यों के चुनाव के एग्जिट पोल (Exit Polls) में कांग्रेस के लिए एक बार फिर निराशाजनक तस्वीर दिखाई गई है. पश्चिम बंगाल (West Bengal) में बुरी तरह से हार तो केरल, असम में कांग्रेस को पराजित दिखाया गया है. तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस की जीत एग्जिट पोल (Exit Polls) में दिखाई गई है लेकिन तमिलनाडु में कांग्रेस कम ही सीट पर लड़ रही है इसलिए जीत का सेहरा डीएमके के माथे ही बंधेगा. पुडुचेरी में यूपीए की जीत दिखाई गई है.

लेकिन सवाल ये है कि आखिर बंगाल में कांग्रेस-लेफ्ट-आईएसएफ गठबंधन की एग्जिट पोल में इतनी बुरी हार क्यों दिखाई गई है. अलग अलग एग्जिट पोल में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन को ज्यादातर में करीब 10 से लेकर 25 के करीब सीटें दी गई हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतनी बुरी हार गठबंधन की क्यों हुई है. दरअसल इसके लिए गठबंधन की कई खामियां जिम्मेदार हैं-

पहला, कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन का विकल्प न दे पाना. बंगाल में ममता बनर्जी के मुकाबले कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन की तरफ से कोई विकल्प नहीं पेश किया जा सका जिसका नतीजा रहा कि ममता के टीएमसी के मुकाबले बीजेपी अपने आप को मजबूत विकल्प के तौर पर पेश कर पाई. ये स्थिति तब है जब पिछले चुनाव में ममता बनर्जी के बाद राज्य में सबसे अधिक सीटें कांग्रेस ने जीती थी. मजबूत विकल्प न देने का नतीजा ये हुआ कि अल्पसंख्यक वोट का बड़ा हिस्सा जो कि अब तक ममता बनर्जी और लेफ्ट-कांग्रेस के आमने सामने की स्थिति में लेफ्ट-कांग्रेस के साथ था वो टीएमसी और बीजेपी के आमने सामने मुकाबले की स्थिति में लेफ्ट-कांग्रेस का हाथ छोड़कर टीएमसी से पूरी तरह जुड़ गया.
दूसरा, कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन का गम्भीर न होना. बंगाल चुनाव की घोषणा से बहुत पहले दोनों पार्टियों में ये तय हो चुका था कि राज्य विधानसभा का चुनाव दोनों पार्टियां साथ लड़ेंगी. लेकिन सीटों के तालमेल को लेकर खींचतान अंत तक जारी रही. कांग्रेस 130 से 140 सीटों की मांग करती रही जबकि लेफ्ट चाहता था कि 2016 के फार्मूले पर सीटों का तालमेल हो. दोनों पार्टियों में सीटों की संख्या पर बात बनी भी तो फिर कौन पार्टी किस सीट पर चुनाव लड़ेगी इसपर लड़ाई शुरू हो गई. दोनो पार्टियों ने गठबंधन में सीटों के तालमेल को लेकर अच्छा खासा वक्त गंवाया. नतीजा ये हुआ कि चुनावी प्रचार में दोनो पार्टियां कमजोर रही.

तीसरा, आईएसएफ के गठबंधन में शामिल होने से कुछ हिन्दू वोट भी कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन से छिटक गया. आईएसएफ के चीफ पीरज़ादा अब्बास के भड़काऊ बयानों से जो हिन्दू वोटर्स लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन के साथ था वो भी दूर चला गया.

चौथा, कांग्रेस का कमजोर प्रचार. बंगाल में कांग्रेस का सबसे कमजोर चुनावी प्रचार रहा. राहुल गांधी का फोकस केरल पर रहा तो दूसरी तरफ प्रियंका गांधी का असम पर.



राहुल गांधी 14 अप्रैल को एक दिन के लिए बंगाल चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे लेकिन उसके बाद कोरोना की वजह से बाकी रैलियां रद्द कर दी. बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने चुनाव प्रचार तो किया लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से प्रचार के दौरान वो सपोर्ट नहीं मिल सका जो मिलना चाहिए था. राज्य के कांग्रेस प्रभारी जितिन प्रसाद भी अकेले ही बंगाल में दिखे. कांग्रेस ने स्टार प्रचारकों की सूची तो बंगाल के लिये जारी की, लेकिन सूची के नेता कागजों तक ही रहे बंगाल की चुनावी जमीन तक ज्यादातर लोग नहीं पहुंचे.



पांचवां, देश की दूसरे हिस्से की पार्टियों का बीजेपी के मुकाबले टीएमसी को समर्थन न कि लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को. सपा, आरजेडी, जेएमएम, शिवसेना, एनसीपी जैसे दलों ने ममता बनर्जी का समर्थन किया जबकी सपा नेता जया बच्चन और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव तो ममता के पक्ष में प्रचार करने भी उतरे.

कांग्रेस-लेफ्ट का गठबंधन पूरे चुनाव के दौरान गंभीर नहीं दिखा जिसका नतीजा रहा कि राज्य की चुनावी राजनीति टीएमसी और बीजेपी के बीच ध्रुवीकृत हो गई और लेफ्ट-कांग्रेस का गठबंधन हाशिये पर.
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