OPINION: किसानों का विरोध प्रदर्शन आखिर क्यों 'बनावटी असंतोष' जैसा दिख रहा है?

दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का विरोध प्रदर्शन

भारत में पिछले कुछ समय से एक ट्रेंड देखा गया है. मसलन हर घरेलू मामला चाहे वो बड़ा हो या छोटा उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाया गया. ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है कि देश बड़े संकट के हालत में है.

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    (अभिषेक बनर्जी)

    भारत में पिछले एक महीने के दौरान हमें अविश्वसनीय तस्वीरें देखने को मिली हैं. कड़ाके की ठंड के बीच हज़ारों की संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हैं. इनकी मांग है कि हाल ही में पास किए गए तीन नए कृषि कानूनों को निरस्त किया जाए. दूसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि किसान ये चाहते हैं कि कृषि उपज की बिक्री पर, प्रत्येक राज्य और हर जिले में, बिचौलियों के दशकों पुराने एकाधिकार को बनाए रखा जाए.

    ये एक बड़ा ही अजीबोगरीब मामला है. एक किसान या कोई दूसरा भी अपनी इनकम का एक हिस्सा बिचौलियों को देने पर जोर क्यों देगा? इसके अलावा इन कृषि सुधारों ने भारतीय किसान से कोई मौजूदा विकल्प नहीं छीना है. बल्कि उन्हें इसके बदले एक नया विकल्प दिया गया है. लेकिन वो इस आंदोलन में नहीं दिख रहा है.

    सबसे पहले हम ये बता दें कि ऐसे कृषि सुधारों की लंबे वक्त से देश में मांग थी. 2019 के चुनावों के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में इसी तरह के वादे किए गए थे. पंजाब में आम आदमी पार्टी का मैनिफेस्टो भी यही चीजें कह रहा था. भारतीय किसान यूनियन ने हमेशा मांग की है कि किसानों को भारत में कहीं भी अपनी उपज बेचने की अनुमति दी जानी चाहिए. तो ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर विरोध करने वाले लोग आ कहां से रहे हैं?


    आइए हम इस सवाल के जवाब को तलाशने की कोशिश करते हैं. राजनीतिक दलों और किसान यूनियनों ने इन सुधारों की आवश्यकता पर लंबे समय से सहमति व्यक्त की है. ऐसे में सवाल उठता है कि पिछली सरकारों ने उन्हें लागू क्यों नहीं किया? शायद इसलिए कि यहां शक्तिशाली लॉबी हैं, जो लोगों के बीच असंतोष पैदा करने में सक्षम हैं. देश में मंडियों और बिचौलियों की व्यवस्था दशकों से चली आ रही है. भारत के संदर्भ में देखा जाय तो ऐसे लोगों की स्थानीय सत्ता में मजबूत पकड़ है. जब इन्हें यहां से खिसकाने की कोशिश की जाती है तो ये राजनीतिक दलों के लिए ही खतरा बन जाते हैं.

    आंदोलन में कुछ प्रमुख आवाज़ों ने सुझाव दिया है कि किसान कानून की बारीकियों के बजाय, सरकार के साथ एक सामान्य संघर्ष का विरोध कर रहे हैं. इस स्पष्टीकरण को केवल काल्पनिक माना जा सकता है. चालू वर्ष में कृषि क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में अच्छी वृद्धि देखी गई है. इस बार मानसून का अच्छा सीज़न देखने को मिला. इसके संकेत इस बात से भी मिल रहे हैं कि ट्रैक्टर की बिक्री रिकॉर्ड ऊंचाई पर है. किसानों के बीच असंतोष पैदा करने वाली सामान्य स्थितियां गायब हैं.

    भारत में पिछले कुछ समय से एक ट्रेंड देखा गया है. मसलन हर घरेलू मामला चाहे वो बड़ा हो या छोटा उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाया गया. ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है कि देश बड़े संकट के हालत में है.


    क्या किसी को NEET-JEE परीक्षा के खिलाफ प्रदर्शन याद है और कैसे स्वीडन से आने वाले सभी कार्यकर्ताओं ने इसमें शामिल होने की कोशिश की? किसानों का मौजूदा विरोध प्रदर्शन भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है इस आंदोलन में न सिर्फ बिहार बंगाल, कर्नाटक, महाराष्ट्र या तमिलनाडु के किसान शामिल नहीं हुए हैं. बल्कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के लोग भी इस आंदोलन में नहीं दिख रहे हैं. इसके बावजूद ये आंदोलन 36 ब्रिटिश सांसद और यहां तक ​​कि कनाडा के प्रधानमंत्री का समर्थन हासिल करने में कामयाब रहा.

    हमें पूछना होगा कि इन विरोधों का नेतृत्व कौन कर रहा है और इससे किसको फायदा मिलता है. इन विरोध प्रदर्शनों में जो बैनर सबसे ज्यादा देखा जाता है, वह हथौड़ा और कचिया. भारत की आधी आबादी कृषि पर निर्भर है. अगर इन्हें किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ जाना है, तो क्या वे वास्तव में कम्युनिस्टों की ओर मुड़ेंगे? क्या भारत में कम्युनिस्टों ने बहुत पहले अपना जनाधार नहीं खोया था?

    इन विरोधों का स्पष्ट पैमाना एक तर्क नहीं है. कुछ भी हो विरोध करने वालों की संख्या इनके निर्वाचन क्षेत्र के विशाल आकार की तुलना में बहुत कम हैं.


    भारत की आधी आबादी लगभग साठ करोड़ लोगों के लिए काम करती है. यदि 60 करोड़ लोगों को अपनी आजीविका के लिए खतरा है तो ये देश तत्काल अराजकता में डूब जाता. इन कानूनों को पारित हुए अब सात महीने हो चुके हैं. हमारे पास दस हजार से अधिक प्रदर्शनकारी हैं, जिनमें से ज्यादातर एक राज्य से हैं. वे संभवतः पूरे भारत के किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते है. लेकिन दुनिया भर के अखबारों के जगह को भरने के लिए ये भीड़ काफी है. और वास्तव में इनका यही उद्देश्य दिक रहा है.

    तो इससे किसका फायदा हो रहा है? चीन के मुकाबले भारत के लिए अच्छी बात ये है कि यहां लोकतंत्र हैं. इसी वजह से, दुनिया भर के लोग चीनी सरकार की तुलना में हमारे इरादों पर ज्यादा भरोसा करते हैं. चीन चाहता है कि दुनिया यह मान ले कि भारत के पास असंतोष के लिए कोई जगह नहीं है, हम उतने ही तानाशाही के साथ हैं जितना वे हैं. लोगों को लगता है कि भारत और चीन के बीच कोई अंतर नहीं है, तो हम इस लाभ को पूरी तरह से खो देते हैं.

    क्या चीन के इन हितों की अनदेखी की जा सकती है? क्या भारतीय कम्युनिस्टों और चीन सरकार के बीच के फिजिकल लिंक को अनदेखा किया जा सकता है? इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान सारा विरोधाभास निजी उद्यम में निर्देशित होता है. लेकिन, अधिक विशेष रूप से, बड़े भारतीय व्यवसाय. चीनी व्यवसायों के विरोध या बहिष्कार का कोई आह्वान नहीं है. वास्तव में इसी लॉबी ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध और आत्मानिभर भारत का मज़ाक उड़ाया था.

    विदेशियों का नाम आने से बदनामी होती है. इससे पहले सरकारों ने अपनी कमियों को दूर करने के लिए एक विदेशी हाथ की बात कही है. इसलिए वे अक्सर कहते हैं कि विदेशी हाथ की बात करना भेड़िया रोने जैसा है. लेकिन अगर आप वास्तव में इसके बारे में सोचते हैं, तो उस कहानी में दूसरा सबक यह है कि कभी-कभी वास्तव में एक भेड़िया होता है.

    (लेखक एक गणितज्ञ और स्तंभकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)
    Published by:Manish Kumar
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