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2019 में पीएम मोदी के ‘न्यू इंडिया’ को ‘किसानों के भारत’ से चुनौती

2019 में पीएम मोदी के ‘न्यू इंडिया’ को ‘किसानों के भारत’ से चुनौती

मोदी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया है

मोदी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया है

सबसे बड़ा सवाल: 2013 में किसानों की औसत मासिक आय 6426 रुपये थी. जबकि खर्च 6223 रुपए था. बचता है सिर्फ 203 रुपये. ऐसे में कोई खेती क्यों करेगा?

    2014 में सरकार बनने के बाद इंडिया फर्स्ट का नारा देने वाले पीएम मोदी के लिए 2019 में ‘भारत’ चुनौती बन रहा है. ये वो भारत जिसमें किसान रहते हैं. ग्रामीण इलाके में मोदी सरकार के खिलाफ फैला असंतोष गुजरात चुनाव में साफ नजर आया. पाटीदार समाज जो मुख्यतः कृषि प्रधान है उसके नौजवानों ने रोजगार न मिल पाने के कारण आरक्षण के लिए आंदोलन चलाया.

    महाराष्ट्र के दलित और मराठा आंदोलन भी इसी परिवेश से उपजे हैं. महाराष्ट्र में कृषि ऋण माफी योजना के जरिए बीजेपी सरकार ने किसानों के गुस्से को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की है लेकिन इसका नफा मापने के लिए पार्टी को चुनावों तक इंतजार करना होगा.

    किसानों का आंदोलन मध्यप्रदेश में पिछले साल हिंसक रूप ले चुका था. यहां भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तीसरे कार्यकाल में होने के बावजूद किसानों का असंतोष दूर नहीं कर सके. ऐसे में उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार भाव में अंतर की खाई को पाटने के लिए भावांतर योजना शुरू की है.

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    उत्तरप्रदेश में एक साल पहले बम्पर समर्थन के साथ सत्ता में आई बीजेपी को कृषि ऋण माफी का दांव खेलना पड़ा था. यूपी ने 36 हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया. महाराष्ट्र सरकार ने अपने किसानों का 30 हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ करने की घोषणा की है. कर्नाटक सरकार ने भी 6 हजार करोड़ की कर्जमाफी की घोषणा की है.

    उत्तर के ही अन्य बीजेपी शासित राज्य हरियाणा और राजस्थान में गुर्जर और जाट आरक्षण आंदोलन चला चुके हैं. इन राज्यों में यह समुदाय भी कृषि पर ही आश्रित है. ऐसे में किसानों का ‘भारत’ मोदी के ‘न्यू इंडिया’ के लिए चुनौती बनता नजर आ रहा है.

    नरेंद्र मोदी सरकार के अंतिम पूर्ण बजट में किसान को साधना बड़ी चुनौती है. सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का आश्वासन दिया हुआ है, लेकिन इसके लिए जवाबदेह कमेटी को ही नहीं पता कि पिछले दो साल में किसानों की आय बढ़ी कितनी है.

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    प्रधानमंत्री ने फरवरी 2016 में किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी करने का आश्वासन दिया था. इसके लिए 13 अप्रैल 2016 को 'डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी' का गठन किया गया.

    कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अशोक दलवाई ने hindi.news18.com से कहा कि "किसानों की आय को जानने के लिए अभी तक देश में कोई सिस्टम नहीं है. इसे भी बनवाएंगे ताकि एक निश्चित अंतराल में किसानों की आय के बारे में सही जानकारी मिले और फिर हम उसी हिसाब से उनके लिए काम कर सकें. अभी तक ऐसा कोई सर्वे नहीं आया है जिससे पता चले कि किसानों की आय दो साल में कितनी बढ़ी है."

    देश में करीब करीब 9.5 करोड़ किसान परिवार हैं. जिन पर औसतन 47 हजार रुपये का कर्ज है. एक सरकारी अनुमान के मुताबिक करीब 52 प्रतिशत कृषि परिवार ऋणग्रस्त हैं. इसलिए यह बड़ा सियासी मुद्दा है. केंद्र सरकार ने कर्जमाफी की कोई योजना लाने से साफ इनकार किया हुआ है. लेकिन कई राज्यों ने अपने बूते पर राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए कर्जमाफी की है.


    कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक "2016 के इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार देश के 17 राज्यों में किसानों की सालाना आय सिर्फ 20 हजार रुपये है. जो न्यूनतम मजदूरी से भी कम है." नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक 2013 में किसानों की औसत मासिक आय 6426 रुपये थी. जबकि खर्च 6223 रुपए था. बचता है सिर्फ 203 रुपये. ऐसे में कोई किसानी क्यों करेगा.

    खेती-किसानी संकट में है. लोगों का इससे मोहभंग हो रहा है. एक निजी संस्था के सर्वे के अनुसार 2005 से 2012 के बीच 3.70 करोड़ किसान खेती छोड़ चुके हैं.
    विजयपाल सिंह तोमर, भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष


    कृषि परिवारों का आर्थिक स्थिति मूल्यांकन सर्वेक्षण के अनुसार प्रति कृषि परिवार औसत मासिक आय 2003 में 2115 रुपये थी. अब दलवाई कमेटी के पास इस बात का सटीक जवाब नहीं है कि जब 10 साल में तीन गुना आय बढ़ी है तो छह साल में (2016 से 2022) तक आय दोगुनी हो भी गई तो इसमें विशेष बात क्या है.

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    किसानों के पास लगातार कृषि भूमि भी घट रही है. लोकसभा में रखे गए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार

    '1970-1971 में प्रति किसान जोत का औसत आकार 2.28 हेक्टेयर था जो 2010-11 में 1.15 हेक्टेयर रह गया है.' कृषि  विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के मुताबिक "सिर्फ चार फीसदी किसान ऐसे हैं जिनके पास 10 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन है."


    हमने कृषि विज्ञानी डॉ. पुला राव से बातचीत की. वह कहते हैं कि "किसानों की आय तभी बढ़ सकती है जब वह आर्गेनिक फार्मिंग अपनाएं. मार्केट की मांग के मुताबिक खेती करें. सरकारें न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाएं. किसानों की लागत पर कम से कम 50 फीसदी मुनाफा मिलेगा तभी खेती-किसानी में लोग दिलचस्पी लेंगे."

    दलवाई कमेटी के सदस्य एवं भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विजयपाल सिंह तोमर कहते हैं कि "अब तक कृषि यंत्रों में सिर्फ ट्रैक्टर पर 5 फीसदी टैक्स लगता था. अब ट्रैक्टर पर 12 फीसदी जीएसटी लगा दी गई है. अन्य कृषि यंत्रों पर 5 फीसदी की दर से जीएसटी ली जा रही है. एक ट्रैक्टर पर किसान को पहले के मुकाबले 60 हजार रुपये अधिक देने पड़ रहे हैं. इतना जीएसटी कृषि की सेहत के लिए ठीक नहीं है."

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    तोमर के मुताबिक उन्होंने इसे खत्म करने की सरकार से मांग की है. वह कहते हैं कि "सरकार उसकी बनती है जिसके साथ किसान रहता है, क्योंकि ज्यादातर लोग कृषि पर आश्रित हैं. मौजूदा सरकार किसानों की दशा सुधारने के लिए कुछ महत्वपूर्ण काम कर रही है, लेकिन जो सिस्टम 60 साल से खराब है उसे ठीक होने में वक्त तो लगेगा ही."

    फिलहाल, सरकार लगातार कृषि पर बजट बढ़ा रही है. इस बार भी किसान अपने लिए कम से कम बजट बढ़ने की उम्मीद तो कर ही सकते हैं.

    Tags: Budget 2018, Narendra modi

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