सहयोगी दलों की जासूसी कराना कोई नई बात नहीं, इसी आरोप में गिर गई थी चंद्रशेखर की सरकार

सहयोगी दलों की जासूसी कराना कोई नई बात नहीं है प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार सिर्फ इसी आरोप में गिर गई थी. उत्तर प्रदेश में मायावती तो अपने मंत्रियों पर नजर रखने के लिए जानी जाती हैं. मायावती के अपने मंत्रियों पर नजर रखने के तमाम किस्से मशहूर हैं.

Anil Rai | News18Hindi
Updated: July 18, 2019, 11:59 AM IST
सहयोगी दलों की जासूसी कराना कोई नई बात नहीं, इसी आरोप में गिर गई थी चंद्रशेखर की सरकार
जासूसी सिर्फ नेताओं की ही नहीं होती है पिछले दिनों सीबीआई-बनाम सीबीआई के मामले में आईबी के दो अफसर सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आलोक वर्मा के घर पर जबरन रोक लिए गए थे.
Anil Rai
Anil Rai | News18Hindi
Updated: July 18, 2019, 11:59 AM IST
बिहार में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की जासूसी कराने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. जो चिट्ठी सामने आई है उससे एक बात तो तय है कि संघ की जासूसी की गई और वो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण से पहले. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर नीतीश कुमार को ऐसा क्या लगा कि संघ और उससे जुड़े संगठनों पर नजर रखना जरूरी हो गया है. इसके जवाब अलग-अलग हैं, लेकिन जासूसी की खबरों का खंडन अब तक नही आया है. सरकार इस मामले पर खुलकर बोलने से बच रही है जबकि नेता और अफसर अधिकारी अलग-अलग बयान दे रहे हैं.

सहयोगी दलों की जासूसी आम बात
सहयोगी दलों की जासूसी कराना कोई नई बात नहीं है प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार सिर्फ इसी आरोप में गिर गई थी. उत्तर प्रदेश में मायावती तो अपने मंत्रियों पर नजर रखने के लिए जानी जाती हैं. उत्तर प्रदेश में मायावती के अपने मंत्रियों पर नजर रखने के तमाम किस्से मशहूर हैं. कर्नाटक में भी कांग्रेस और जेडीएस में जासूसी को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगे, विपक्ष में बैठे नेता अक्सर सरकार में बैठे नेताओं पर फोन टेप कराने का आरोप लगाते रहते हैं चाहे वो यूपीए की सरकार हो या एनडीए की, कई बार तो ऐसे रिकॉर्ड किए गए फोन लीक भी हुए हैं.

लगभग सभी सरकारों पर अपनों की जासूसी करवाने के आरोप लगते रहे हैं.
लगभग सभी सरकारों पर अपनों की जासूसी करवाने के आरोप लगते रहे हैं.


क्या सच में होती है नेताओं की जासूसी
किसी राज्य के मुख्यमंत्री की दिनचर्या पर नजर डाले तो अक्सर उनसे मिलने वाला अंतिम व्यक्ति राज्य खुफिया विभाग का प्रमुख होता है, ऐसा माना जाता है कि मुख्यमंत्री को वह पूरे दिन की राजनीतिक घटना क्रम का ब्योरा देता है. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो तत्कालीन डीजी इंटेलिजेंस मल्कियत सिंह को अपने आवास 5-कालीदास मार्ग में ही कार्यालय तक आवंटित कर दिया था.

आखिर क्यों होती है जासूसी
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जासूसी सिर्फ नेताओं की ही नहीं होती है. पिछले दिनों सीबीआई-बनाम सीबीआई के मामले में आईबी के दो अफसर सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आलोक वर्मा के घर पर जबरन रोक लिए गए थे. खुफिया एजेंसियों में लंबे समय तक काम कर चुके एक अधिकारी ने बताया कि सरकार के लिए जो-जो व्यक्ति महत्वूर्ण होता है उसकी निगरानी आम बात है यहां तक कि सरकार जरूरत पड़ने पर अपने मंत्रियों और अधिकारियों की निगरानी कराने से भी परहेज नहीं करती. लेकिन पॉलिटिकल मॉनिटरिंग उसी समय की जाती है जब सरकार अल्पमत में हो या कोई बड़ा बिल आने वाला हो. इसके पीछे सरकार का मकसद विपक्ष और सहयोगी दलों की प्लानिंग जानना होता है, क्योंकि गठबंधन  की सरकार का अस्तित्व सहयोगी दलों को रणनीति पर ही निर्भर होता है.

क्या ये था जासूसी का असली कारण
ऐसे में सवाल उठता है क्या नीतीश कुमार की सरकार ने  संघ से जुड़े इन संगठनों की जासूसी केंद्र सरकार में बिहार से होने वाले मंत्रियों का नाम जानने के लिए तो नहीं कराई या बीजेपी को इतना बड़ा बहुमत मिलने के बाद बिहार में गठबंधन के भविष्य पर पड़ने वाले असर को जानने के लिए. क्योंकि संघ का रोल बीजेपी की भावी रणनीति बनाने में महत्वूर्ण होता है. फिलहाल इस मामले पर दोनों राजनीतिक दलों का कोई बड़ा नेता भले ही खुलकर नहीं बोल रहा है लेकिन सूत्रों की मानें तो बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व इस जासूसी कांड की तह तक जाने का मन बना चुका है.

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First published: July 18, 2019, 11:16 AM IST
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