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Climate Change: डॉक्टर को दूर रखने वाला सेब भारत में खतरे में... जानिए कैसे?

Climate Change: डॉक्टर को दूर रखने वाला सेब भारत में खतरे में... जानिए कैसे?

कश्मीर के उद्यानिकी विभाग के मुताबिक 2018 में 500 करोड़ रूपये की फसलों को नुकसान पहुंचा था, 2019 में यह बढ़कर 2250 करोड़ रुपये तक चला गया, इस साल कश्मीर में पिछले 60 सालों में सबसे अधिक बर्फबारी देखने को मिली थी. (Image - Shutterstock)

कश्मीर के उद्यानिकी विभाग के मुताबिक 2018 में 500 करोड़ रूपये की फसलों को नुकसान पहुंचा था, 2019 में यह बढ़कर 2250 करोड़ रुपये तक चला गया, इस साल कश्मीर में पिछले 60 सालों में सबसे अधिक बर्फबारी देखने को मिली थी. (Image - Shutterstock)

Climate Change: किसानों का मानना है कि नई किस्मों को अपनाना आसान नहीं है, उसके लिए पहले उन्हें मौजूदा बाग को उखाड़ना होगा और नए सिरे से शुरुआत करनी होगी. इस प्रक्रिया में काफी लागत आएगी. कई किसान तो ऐसे हैं, जिनकी तीन दशक की मेहनत बर्फ में दब कर रह गई है. 2018 की बर्फबारी मे उनके 70 फीसद पेड़ क्षतिग्रस्त हो गए थे. ऐसे में किसान सेब की खेती के विचार को त्याग कर कुछ और काम करने का विचार करने लगे हैं, जिससे उनकी परिवार की गुजर बसर तो हो सके.

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    नई दिल्ली. भारत में उगाया जाने वाला सेब (Kashmiri Apple) खतरे में है और दुर्लभ होने की कगार पर पहुंच रहा है, इस साल भी किसानों (Farmers) की आधी फसल बरबाद हो चुकी है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि देश के प्रमुख बाग जल्द ही नष्ट हो सकते हैं. कश्मीर, जहां देश के 80 फीसदी सेब उगाए जाते हैं, वहां वक्त से पहले हुई बर्फबारी (Snowfalls) की वजह से किसान लगातार तीसरे साल अपनी आधी फसल खो चुके हैं. अधिकारी सेब उद्योग के घाटे की गणना करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका योगदान स्थानीय वार्षिक अर्थव्यवस्था का लगभग एक तिहाई (5000 करोड़) है. यह सेब भारत के साथ-साथ विदेश भी भेजे जाते हैं.

    शोधार्थियों ने चेताया है कि कश्मीर घाटी (Kashmir Valley) के यह बाग, जो हिमालय (Himalaya) और पीर पंजाल (Pir Panjal Range) की पहाड़ियों से घिरा है, वह जलवायु संकट (Climate Change) की वजह से कुछ ही सालों में खत्म होने की कगार पर पहुंच जाएगा. पिछले 20 सालों से इस क्षेत्र में मौसम के तरीके में धीरे धीरे बदलाव देखा जा रहा था, जो पिछले 5 सालों में तेज हुआ है. यह तीसरा साल है, जब जल्दी और भारी बर्फबारी की वजह से कश्मीर घाटी में फसल को नुकसान पहुंचा है. कश्मीर के उद्यानिकी विभाग के मुताबिक 2018 में 500 करोड़ रुपये की फसलों को नुकसान पहुंचा था, 2019 में यह बढ़कर 2250 करोड़ रुपये तक चला गया, इस साल कश्मीर में पिछले 60 सालों में सबसे अधिक बर्फबारी देखने को मिली थी.

    आमतौर पर कश्मीर में 16 दिसंबर के आसपास बर्फबारी शुरू होती है, लेकिन पिछले दो दशकों से ये थोड़ा पहले हो रही है, जबकि नवंबर के महीने में सेब की कई किस्मों की कटाई होती है. पिछले 5 सालों में तीन बार तो इतनी अनियमित बर्फबारी देखने को मिली है, जिसने भारी नुकसान पहुंचाया है. भविष्य में इसके और बढ़ने की आशंका है. जहां तक अनियमित मौसम का सवाल आता है, जलवायु मॉडल बहुत गंभीर स्थिति का ही अनुमान लगाता है.

    हिमालय, जिसमें कश्मीर का क्षेत्र भी आता है, वहां और इस तरह की मौसम से जुड़ी चरम घटनाएं देखने को मिल सकती है. ऐसे हालातों को देखते हुए कश्मीर उद्यानिकी विभाग के अधिकारी किसानों को सेब की नई प्रजातियों को उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो जल्दी लगाई जा सकें. इसके साथ ही सरकार किसानों को सब्सिडी भी प्रदान करने की योजना बना रही है.

    इस साल प्रकाशित एक शोध में सलाह दी गई है कि नई किस्मों से उल्लेखनीय रूप से आर्थिक लाभ हो सकता है. लेकिन स्थानीय प्रजाति जैसे अम्बरी की पैदावार में काफी कमी देखने को मिली है. साथ ही नई किस्मों को लेकर चलाए गए पायलट प्रोजेक्ट की असफलता को देखकर यहां के किसान नई किस्मों को अपनाने में हिचक महसूस कर रहे हैं.

    किसानों का मानना है कि नई किस्मों को अपनाना आसान नहीं है, उसके लिए पहले उन्हें मौजूदा बाग को उखाड़ना होगा और नए सिरे से शुरुआत करनी होगी. इस प्रक्रिया में काफी लागत आएगी. कई किसान तो ऐसे हैं, जिनकी तीन दशक की मेहनत बर्फ में दब कर रह गई है. 2018 की बर्फबारी में उनके 70 फीसद पेड़ क्षतिग्रस्त हो गए थे. ऐसे में किसान सेब की खेती के विचार को त्याग कर कुछ और काम करने का विचार करने लगे हैं, जिससे उनकी परिवार की गुजर बसर तो हो सके.

    Tags: Climate Change, Forest and Climate Change, Jammu and kashmir

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