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OPINION | दिल्ली क्यों बन गई है गैस चैंबर? इसका जवाब पराली नहीं 1980 के दौर में मिलेगा

News18Hindi
Updated: November 4, 2019, 3:23 PM IST
OPINION | दिल्ली क्यों बन गई है गैस चैंबर? इसका जवाब पराली नहीं 1980 के दौर में मिलेगा
ज़हरीली हो गई है दिल्ली की हवा

1982 में एशियाड के दौरान ढेर सारे नए निर्माण कार्य किए गए. नए स्टेडियम, फ्लाईओवर, होटल और खेल गांव से दिल्ली का दायरा रिंग रोड से आगे बढ़ गया. एशियाड के चलते यहां लोगों के लिए रोजगार के अवसर खुले.

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  • Last Updated: November 4, 2019, 3:23 PM IST
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(सिद्धार्थ मिश्रा)
ये पहली बार नहीं है जब दिल्ली गैस चैंबर में बदल गई है. पब्लिक फंड का इस्तेमाल कर साफ हवा की बात करने वाले अरविंद केजरीवाल अब पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्री को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. प्रदूषण को लेकर आरोप-प्रत्यारोप के दौर में टीवी चैनल को इस पर बहस करने का अच्छा मौका मिल गया है. टीवी चैलन पर बहस से अब हर तरफ ध्वनि प्रदूषण फैल रहा है.

हर साल कटाई के सीज़न में दो बार दिल्ली गैस चैंबर बन जाती है और ये सरकार की नाकमी को उजागर करता है. इसके लिए सिर्फ अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी की वर्तमान सरकार ज़िम्मेदार नहीं है. बल्कि पहले की सारी सरकारें इस हालात के लिए ज़िम्मेदार है. अफसोस की बात ये है कि मौजूदा सरकारें इस पर राजनीति कर रही है.

पिछले दिनों पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पीएम मोदी को लिखा, 'कैसे किसी देश को विकसित कहा जा सकता है जब वहां की राजधानी गैस चैंबर बन जाए और वो भी तब जब ये समस्या इंसानों ने पैदा की हो.'

दो दिनों के भारत दौरे पर आईं जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए डीज़ल से चलने वाली सभी सरकारी बसों की जगह इलेक्ट्रिक बसों के इस्तेमाल की सलाह दी. ये किसी को नहीं पता कि क्या किसी ने मार्केल से ये कहा कि दिल्ली में सीएनजी बसें चलते हैं और प्रदूषण की समस्या कुछ और है.

कई लोगों ने इसको लेकर कोर्ट में शिकायत की है. इसके जवाब में कोर्ट ने कहा है कि उन्हें पता था कि केंद्र और दिल्ली सरकार की लड़ाई में ऐसे हालात हो सकते हैं.

सवाल उठता है कि आखिर कैसे दिल्ली गैस चैंबर बन गई है. माना कि इसके लिए 40 फीसदी पराली का जलाना है. लेकिन बाक़ी बचे प्रदूषण कहां से आते हैं. इसे समझने के लिए हमें 1980 के दशक में जाना पड़ेगा. 1947 से 1980 के बीच दिल्ली की विकास के तहत बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए लोगों को बसाना था. उन दिनों दिल्ली का दायरा सिर्फ रिंग रोड तक सिमित था. इसके अलावा कुछ देहात थे और यमुना पार के इलाके.

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1982 में एशियाड के दौरान ढेर सारे नए निर्माण कार्य किए गए, जिसकी कई सालों से मांग थी. नए स्टेडियम, फ्लाईओवर, होटल और खेल गांव से दिल्ली का दायरा रिंग रोड से आगे बढ़ गया. एशियाड के चलते यहां लोगों के लिए रोजगार के अवसर खुले. ऐसे में बिहार और उत्तर प्रदेश से ढेर सारे लोग यहां आकर बस गए. इसके अलावा बंगाल में ढेर सारी फैक्ट्रियां बंद हो गई. इसके चलते भी वहां के लोग दिल्ली आ गए.

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) केंद्र सरकार के अंदर काम करती है. डीडीए ये अनुमान लगाने में फेल हो गई कि यहां इतने सारे लोग बाहर से काम की तलाश में आने वाले थे. डीडीए के पास कोई प्लान नहीं था. लिहाजा लोग कई अनधिकृत कॉलोनियों में रहने लगे.


हलांकि इन कॉलोनियों का निर्माण कार्य पहले से शुरू हो गया था लेकिन इसकी रफ्तार 1980 के दशक में काफी ज़्यादा बढ़ गई. आज दिल्ली में इस तरह की अनधिकृत कॉलोनियों की संख्या 1797 है. याद रहे कि इसमे से कई कॉलोनियों को पहले ही कानूनी घोषित कर दिया गया है. आखिरी बार ये काम 1993 में हुआ था. अब सरकार ने बाकी बचे सारी कॉलोनियों को नियमित करने का ऐलान कर दिया है.

सरकार को बढ़ते प्रदूषण की कोई चिंता नहीं थी. आखिरकार एमसी मेहता केस में सुप्रीम कोर्ट को सामने आना पड़ा. फैसले के तहत कोर्ट ने प्रदूषण कम करने के लिए कई सुझाव दिए. लेकिन इस पर सरकारों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

अनधिकृत कॉलोनियों का संख्या बढ़ने के चलते समस्या बढ़ती गई. यहां रह रहे लोगों की संख्या बढ़ती चली गई. राजनीतिक दलों की लिए ये वोट बैंक बन गए. समाजिक स्तर पर इससे मकान मालिक और किराएदारों के बीच तनाव बढ़ने लगे. समय के साथ-साथ मकान मालिक और प्लॉट खरीदने वाले राजनीतिक तौर पर काफी मजबूत हो गए.

अरबन प्लानर ने इसके लिए मास्टर प्लान तैयार किया. कोर्ट ने इसे लागू करने को कहा. लेकिन सांसद और एमएलए को जो फंड मिले उसने इन कॉलोनियों के विकास पर खर्च कर दिए न कि डीडीए की योजनाओं पर. बिना किसी योजना के चलते सरकारी सुविधायों पर दबाव बढ़ने लगा. इसका सबसे ताजा उधारण तीस हजारी कोर्ट में पार्किंग को लेकर मारपीट है.

अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने के लिए केंद्र सरकार इस बार शीतकालीन सत्र में बिल लाने वाली है. ये बिल कानून बन जाएगा. लेकिन क्या इसमें पर्यावरण को बचाने के लिए चर्चा की जाएगी. ये फिर ये ऐसा दस्तावेज़ बन कर रह जएगी जिससे लोग अपने गैरकानूनी संपत्ति के लिए बैंक से लोग लेकर निर्माण कार्य करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक कमेटी ने जुलाई 2019 में रिपोर्ट सौंपी थी. जिसमें कहा गया था कि अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने से मौजूदा इंफ्रास्ट्रचर पर दबाव बढ़ेगा. इसके बावजूद केजरीवाल सरकार ने इस बिल का समर्थन किया है.

(लेखक राजनीतिक राजनीतिक विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार है.)

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First published: November 4, 2019, 3:22 PM IST
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