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संविधान की विकास गाथा : क्यों मूल्यवान है भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया?

Sachin kumar Jain | News18Hindi
Updated: February 12, 2020, 12:01 PM IST
संविधान की विकास गाथा : क्यों मूल्यवान है भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया?
(News 18 Hindi Creative)

यह भी एक तथ्य है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद 24 अमेरिकी लोगों ने जापान का संविधान सात दिन के भीतर लिख कर जापान के लोगों को सौंप दिया था. इसके विपरीत भारत का संविधान भारत के लोगों ने भारतीय समाज और बड़ी चुनौतियों की पृष्ठभूमि में खुद तैयार किया.

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  • Last Updated: February 12, 2020, 12:01 PM IST
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भारत ने अपना संविधान बिना ब्रिटिश शासन दखल के खुद बनाया था. इसके लिए लंबा राजनीतिक संघर्ष भी किया गया. बहरहाल ब्रिटिश साम्राज्य ने यह भरसक कोशिशें कीं कि भारत किसी न किसी रूप में उसके नियंत्रण में बना रहे. इसीलिए मिंटो-मारले सुधार के आधार पर भारत परिषद् अधिनयम (1909) और फिर मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के आधार पर भारत शासन अधिनियम (1919) बनाया गया. इन अधिनियमों में प्रांतीय और केन्द्रीय विधान मंडल में भारतीयों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने, मुस्लिमों को पृथक निर्वाचन का प्रावधान, द्वि-सदनीय विधान मंडल आदि के प्रावधान किये गए, किन्तु अंतिम निर्णय प्रशासन के अधिकार गवर्नर जनरल के हाथ में ही रहे. पूर्ण स्वराज के सपने की साथ आज़ादी के संघर्ष आगे बढ़ा. एक अरसे तक ब्रिटिश सरकार भारत पर शासन के लिए भांति-भांति के अधिनियम बना रही थी. तब महात्मा गांधी ने वर्ष 1922 में यह मांग की थी कि भारत का राजनीतिक भाग्य भारतीय स्वयं बनायेंगे. क़ानून आयोग, सुधारों के प्रस्ताव और गोलमेज़ परिषदों के बाद भारत में यह भावना जम गयी कि वे बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपना संविधान बनाना चाहते हैं. फिर श्रीमती एनीबेसेंट की पहल पर कामनवैल्थ आफ इंडिया बिल (1925) अस्तित्व में आया. लेकिन वर्ष 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज हासिल करने का निर्णय लिया. इसके बाद भी ब्रिटिश हुकूमत गोलमेज़ वार्ताओं के जरिये अपनी सत्ता और प्रभाव बनाए रखने की कोशिशें करती रही. यही कारण है कि पृथक निर्वाचन व्यवस्था के जरिये उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की बीज भी बोये.

वर्ष 1934 में कांग्रेस की कार्यकारिणी ने वयस्क मताधिकार के माध्यम से निर्वाचन करके संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव पारित किया और यह घोषणा की कि संविधान सभा की भारत का संविधान तैयार करेगी. इसके बाद भारत शासन अधिनियम (1935) बनाया गया. यह ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा तैयार एक लिखित संविधान ही था, जिसमें केवल शासन व्यवस्था के तरीकों का उल्लेख था, नागरिकों के अधिकारों, न्याय और इंसानियत और जन-कल्याण का कोई प्रावधान इसमें नहीं था. इस अधिनियम में ब्रिटिश नियंत्रण के क्षेत्रों और रियासतों को मिलाकर अखिल भारतीय फेडरेशन की स्थापना के जरिये संघीय प्रणाली लाने का प्रावधान किया गया. शासन की उस प्रणाली को तिलांजलि देने की सतही कोशिश, जिसके जरिये ब्रिटिश व्यवस्था एकात्मक तरीके से शासन करती थी. हांलाकि भारतीय संघ बनाने का प्रावधान सफल नहीं रहा.  कांग्रेस ने इस अधिनियम को खारिज करते हुए और संविधान सभा के गठन के विषय पर प्रांतीय विधान मंडलों के चुनाव लडे और कांग्रेस की विजय भी हुई.

वर्ष 1938 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा की मांग रखते हुए कहा था कि “कांग्रेस स्वतंत्र और लोकतंत्रात्मक राज्य का समर्थन करती है. उसने यह प्रस्ताव किया है कि स्वतंत्र भारत का संविधान बिना बाहरी हस्तक्षेप के ऐसी संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए, जो वयस्क मतदान के आधार पर निर्वाचित हो.” इसके बाद दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और स्थितियां बदल गयीं. इस माहौल में भारत के राष्ट्रवादी संगठन और आन्दोलनकारी पूर्ण स्वराज और स्व-निर्मित संविधान की वकालत करते रहे. विश्व युद्ध की समाप्ति तक संवैधानिक समस्या का हल नहीं हो पाया. जब युद्ध ख़तम हुआ, तब इस प्रक्रिया ने गति पकड़ी. तब ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन के जरिये एक प्रक्रिया तय करने की कोशिश की. हांलाकि मांग तो यही थी कि व्यस्त मताधिकार के जरिये संविधान सभा का गठन होता, किन्तु यह प्रक्रिया बहुत ज्यादा समय लेती. और संविधान के निर्माण में बहुत समय लगता. तब यह तय किया गया कि उसी वक्त निर्वाचित प्रांतीय विधान मंडलों के माध्यम से संविधान सभा के सदस्यों का चयन किया जाये.


संविधान सभा का गठन प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन से हुआ था. हर प्रांत को, देसी रियासतों या रियासतों के समूह को अपनी जनसंख्या के अनुपात में कुल स्थान आवंटित किये गए थे. एक रूप से 10 लाख की जनसंख्या के लिए एक स्थान का अनुपात था. संविधान सभा के लिए 389 सदस्यों की संख्या तय की गयी. संविधान सभा में भारत के वयस्क मतदाताओं ने सदस्यों का चुनाव नहीं किया था. इसके बजाये प्रांतीय चुनावों के जरिये चुनी गयी प्रांतीय सभाओं के सदस्यों ने संविधान सभा के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव किया. इसमें कुल 389 सदस्य चुने गए. जिनमें से 292 प्रांतीय सभाओं ने चुने, 93 रियासतों ने और 4 चीफ कमिश्नर के प्रान्तों से चुने गए. विभाजन के बाद सभा में सदस्यों की संख्या 299 रह गयी.

इन 299 सदस्यों में से 229 सदस्य 12 भारतीय प्रान्तों से चुने गए और 29 रियासतों ने 70 सदस्यों को सभा में भेजा. संविधान सभा में 15 महिला प्रतिनिधि थी. संविधान सभा में 30 सदस्य अनुसूचित जाति के थे, 12 महिला सदस्य थीं. इनमें वकील, न्यायविद भी थे. सभा में पारसी, आंग्ल भारतीय, ईसाई समुदाय के सदस्य भी थे. प्रत्येक प्रांत के स्थानों को तीन प्रमुख समुदायों में जनसंख्या के अनुपात में बांटा गाया. ये सम्प्रदाय थे मुस्लिम, सिख और साधारण.

जब पाकिस्तान की अलग संविधान सभा बनी तो बंगाल, पंजाब, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, बलोचिस्तान और आसाम के सिलहट जिले (जो जनमत संग्रह द्वारा पाकिस्तान में शामिल हुए थे) के प्रतिनिधि भारत की संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे. पश्चिम बंगाल और पूर्वी पंजाब के प्रान्तों में नए निर्वाचन कराये गए. इसके बाद भारत की संविधान सभा जब 31 अक्टूबर 1947 को पुनः जुटी तब सदन की सदस्यता घटकर 299 हो गयी.


जब यह तय हो गया कि अंग्रेज भारत से जायेंगे ही, तब एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में नव-निर्माण की रुपरेखा तय करने के लिए स्वतंत्र भारत का संविधान बनाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई. उस दौर के सबसे कठिन समय में यानी दिसंबर 1946 से दिसम्बर 1949 के बीच की अवधि में एक सघन प्रक्रिया के आधार पर इसे निर्मित किया गया.

13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने संविधान के निर्माण से सम्बंधित लक्ष्य सम्बन्धी प्रस्ताव संविधान सभा में प्रस्तुत किया. जिसमें भारत की भौगोलिक रूपरेखा से साथ स्वतंत्र भारत के स्वरुप और स्वभाव का चित्रण था. इस संकल्प में कहा गया था कि "प्रभुत्व संपन्न स्वतंत्र भारत की सभी शक्तियां और प्राधिकारौर शासन के सभी अंग लोक (यानी भारत के लोगों से) व्युत्पन्न होंगे. भारत की जनता को सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, प्रतिष्ठा की तथा विधि के समक्ष संता, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगम और कार्य की स्वतंत्रता विधि और सदाचार के अधीन रहते हुए होगी. अल्पसंख्यकों के लिए, पिछड़े और जनजाति क्षेत्रों के लिए और दलित और अन्य पिछड़े हुए वर्गों के लिए पर्य्वाप्त रक्षोपाय किये जायेंगे. आखिर में कहा गया कि यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शान्ति तथा मानव कल्याण के लिए स्वैच्चा से अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करेगी."

भारत की संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई. 26 नवम्बर 1949 को संविधान बन कर और सभी सदस्यों के हस्ताक्षर से पूरा हुआ. यूँ तो संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, किन्तु नागरिकता, निर्वाचन और अंतरिम संसद से सम्बंधित उपबंधों को तथा अस्थायी और संक्रमणकारी उपबंधों को तुरंत यानी 26 नवम्बर 1949 को ही लागू कर दिया गया. शेष संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ.


संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया. संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकार करने से पहले 2 साल, 11 महीने और 18 दिनों में से 166 दिन बैठकें कीं. संविधान सभा में देश को व्यापक प्रतिनिधित्व देने के लिए कुल 299 सदस्य थे. वास्तव में 389 सदस्य होने चाहिए थे, लेकिन विभाजन के कारण यह संख्या 299 हो गयी. अंत में 284 सदस्यों ने संविधान की दो प्रतियों (हिन्दी और अंग्रेजी) पर हस्ताक्षर किये.

26 नवंबर 1949 को अंगीकार किये जाने के बाद संविधान को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया. यह दिन इसलिए चुना गया क्योंकि वर्ष 1930 में इसी दिन लाहौर में रावी नदी के तट पर पूर्ण स्वराज की घोषणा की गई थी.

यह भी एक तथ्य है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद 24 अमेरिकी लोगों ने जापान का संविधान सात दिन के भीतर लिख कर जापान के लोगों को सौंप दिया था. इसके विपरीत भारत का संविधान भारत के लोगों ने भारतीय समाज और बड़ी चुनौतियों की पृष्ठभूमि में खुद तैयार किया.

भारत के संविधान की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पक्ष

भारत के संविधान में 395 अनुच्छेद थे. अमरीका के लोगों ने सात अनुच्छेद रखे थे, जिनमें से पहले चार को 21 धाराओं में बांटा गया था. कनाडा के संविधान में 147, आस्ट्रेलिया के संविधान में 128 और दक्षिण अफ्रीका के संविधान में 159 धाराएं हैं. यह उल्लेख करना जरूरी है कि अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के संविधान के निर्माताओं को संशोधनों और उन पर बहसों का सामना नहीं करना पड़ा था, जो अनुच्छेद और धाराएँ प्रस्तुत की गयीं, उन्हें पेश किया हुआ मान लिया गया.

अमरीका का संविधान बनना 25 मई 1787 को शुरू हुआ और यह काम 17 सितम्बर 1787 (चार माह) को पूरा हो गया. कनाडा का संविधान 10 अक्टूबर 1864 को बनना शुरू हुआ और मार्च 1867 (2 वर्ष 5 माह) को पूरा हुआ. आस्ट्रेलिया का संविधान मार्च 1891 में बनना शुरू हुआ और 9 जुलाई 1900 (नौ वर्ष) को इसका निर्माण पूरा हुआ. दक्षिण अफ्रीका का संविधान अक्टूबर 1908 में बनना शुरू हुआ और 20 सितम्बर 1909 (एक वर्ष) को पूरा हुआ. भारत के संविधान को बनने में दो साल 11 महीने और 17 दिन लगे.


संविधान सभा को मसौदे पर 7637 संशोधन भेजे गए. इनमें से 2473 संशोधन सभा में पेश किये गए. संविधान सभा की प्रारूप समिति (मसौदा समिति) की 141 बैठकें हुईं. संविधान सभा की प्रारूप समिति को संविधानिक परामर्शदाता बी. एन राऊ द्वारा तैयार किये गए संविधान के मूल मसौदे में 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थीं और  फिर मसौदा समिति द्वारा पेश किये गए प्रारूप में 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थी.

मसौदा समिति द्वारा प्रस्तुत किये गए संविधान प्रारूप (जो कि दूसरा प्रारूप था) पर सभा में बहस हुई और इसमें अनुच्छेदों की संख्या बढ़कर 386 हो गयी. मसौदे को अंतिम रूप (तीसरे प्रारूप में) में आते-आते इसमें 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां हो गयीं.

आपको शायद विश्वास न हो, किन्तु यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को स्वीकृति देकर पारित किया, उसी दिन सभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद ने सभा को बताया कि 22 नवम्बर की तारीख तक संविधान सभा पर लगभग तीन वर्षों में रुपये 63,96,729.00 का खर्च आया है. यानी सभा वित्तीय मामलों पर जवाबदेह और पारदर्शी थी.  प्रक्रिया के नज़रिए से भी भारत के संविधान को विशेष माना जाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया में वास्तविक समावेशीपन था, खुलापन था, अभिव्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता थी और समानुभूति का भाव था.

नोट - यह वक्त भारत को भारत के संविधान से परिचित कराने का है. इस संविधान से परिचित होने के लिए इसकी पटकथा, इसकी पृष्ठभूमि से साक्षात्कार करना एक अनिवार्यता है. भारतीय संविधान की विकास गाथा को समाज के समक्ष लाने के लिए हमने एक श्रृंखला शुरू की है. इसमें संविधान निर्माण के उन अनछुए पहलुओं पर आलेख होंगे, जिन्हें अब तक विस्मृत किया गया है, जिनकी उपेक्षा की गई है. संविधान को आत्मार्पित किए हुए अब 70 वर्ष गुज़र गए हैं, लेकिन समाज ने इसे अपनाया नहीं है. आज भारत और भारतीयता के वजूद को संरक्षित करने के लिए संविधान लोक शिक्षण अभियान की महती आवश्यकता है. आशा है कि "भारतीय संविधान की विकास गाथा" के लेखक सचिन कुमार जैन द्वारा news18 के लिए विशेष रूप से लिखी गई श्रृंखला को उपयोगी पाएंगे.

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First published: February 12, 2020, 11:31 AM IST
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