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Coronavirus : डेल्टा से जूझती दुनिया लैम्बडा वेरियंट को लेकर क्यों है परेशान?

सी.37 के नाम से भी पहचान रखने वाला ये वैरियंट पहली बार पिछले साल दिसंबर में पेरु में पाया गया था.   (File pic)

सी.37 के नाम से भी पहचान रखने वाला ये वैरियंट पहली बार पिछले साल दिसंबर में पेरु में पाया गया था. (File pic)

कोरोना वायरस जिस हैरान करने वाली तेजी से म्यूटेशन करता है उनमें से सभी इंसानों को नुकसान पहुंचाने वाले नहीं होते हैं. इनमें से ज्यादातर म्यूटेशन से वायरस को कोई विशेष लाभ नहीं होता है.

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    डेल्टा वेरियंट से जूझते अमेरिका को देखकर पता चलता है कि कोरोना वायरस के बारे में चिंता शुरू करना कभी भी जल्दी नहीं होता है. क्योंकि जितनी तेजी से ये वायरस अपना रूप बदलता है और फैलता है साथ ही वैक्सीन तक को धोखा देने की काबिलियत रखता है. ऐसे में इसके बारे में लगातार चिंता करना और उपाय करना बेहद ज़रूरी होता जा रहा है. अमेरिका में नए संक्रमण की लहर ने विशेषज्ञों को एक बार फिर तनाव में ला दिया है. नई स्ट्रेन की दस्तक हालातों को और जटिल बना सकती है. इनमें से एक स्ट्रेन जो चिंता का विषय है वो है लैम्बडा वेरियंट- इसका नामकरण ग्रीक अल्फाबेट के 11 अक्षर के आधार पर किया गया है. जो अभी दक्षिण अमेरिका तक ही सीमित रहा है. लेकिन कोरोना वायरस का कोई भरोसा नहीं है कब इसका नया वेरियंट अपने लिए नई जगह तलाश ले.

    क्या है लैम्बडा वेरियंट
    सी.37 के नाम से भी पहचान रखने वाला ये वेरियंट पहली बार पिछले साल दिसंबर में पेरू में पाया गया था. उस दौरान उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वेरियंट ऑफ इंट्रेस्ट बताया है जिसका मतलब है ऐसा वेरियंट जिसमें जेनेटिक बदलाव के अनुमान के साथ वायरस के लक्षणों जैसे संक्रामकता, बीमारी की गंभीरता, इम्यूनिटी, उपचार से बच कर निकलने के लक्षणों पर असर डालने की क्षमता हो. यानी एक ऐसा वेरियंट जिसमें देश को चिंता में डालने और सामान्य जिंदगी में लौटने नहीं देने की तमाम काबिलियत मौजूद हो. चिली में हुए एक अध्ययन जिसकी समीक्षा होनी बाकी है, इसमें लैम्बडा के संक्रमण फैलाने की क्षमता और वैक्सीन से बनने वाली एंटीबॉडी को नाकाम करने की ताकत को लेकर चिंता ज़ाहिर की गई है. अध्ययन से जुड़े शोधार्थी का कहना है कि हमारे अध्ययन बताते हैं कि लैम्बडा के स्पाइक प्रोटीन में मौजूद म्यूटेशन में कोरोना वैक्सीन से विकसित एंटीबॉडी से बचकर निकलने और उसे नाकाम करने की काबिलियत होती है. चिली में लैम्बडा का अच्छा खासा असर देखा गया है.

    विशेषज्ञ लैम्बडा को लेकर क्यों हैं चिंतित
    कोरोना वायरस जिस हैरान करने वाली तेजी से म्यूटेशन करता है उनमें से सभी इंसानों को नुकसान पहुंचाने वाले नहीं होते हैं. इनमें से ज्यादातर म्यूटेशन से वायरस को कोई विशेष लाभ नहीं होता है. हालांकि ऐसे मामले सामने आए हैं जब वायरस का जेनेटिक अपडेट तेजी से फैलता है और फिर उस पर वैक्सीन और थेरेपी भी असर नहीं करती हैं

    चिली में हुआ अध्ययन बताता है कि लैम्बडा वेरियंट का स्पाइक प्रोटीन कोरोना वैक्सीन के असर को कम करता है. लैम्बडा वेरियंट वैक्सीन से मिली सेल्युलर प्रक्रिया को भी छका सकता है इसे लेकर अभी जानकारी हासिल नहीं हुई है.

    विशेषज्ञों ने लैम्बडा के स्पाइक प्रोटीन में सात म्यूटेशन पाए हैं, जिससे कोरोना वायरस जब इंसानों की कोशिका पर हमला करता है, तो उसके लिए इंसानों की कोशिकाओं से जुड़ना आसान हो जाता है और इस तरह से वायरस को पकड़ना या बेअसर करना मुश्किल हो जाता है.

    अध्ययन बताता है कि लैम्बडा वेरियंट के स्पाइक प्रोटीन में अल्फा और गामा वेरियंट के मुकाबले में ज्यादा संक्रामकता रहती है. अल्फा को डब्ल्यूएचओ ने वायरस ऑफ कन्सर्न वेरियंट घोषित किया है, ये पहली बार सितंबर में इंग्लैंड में पाया गया था वहीं गामा की पहली स्ट्रेन ब्राजील में मिली थी.

    लैम्बडा को काबू में करने के उपाय
    अनुभवियों का कहना है कि अभी तक के अध्ययन और शोध के बाद तो यही कहा जा सकता है कि इस वेरियंट को नियंत्रित करने के लिए भी वही उपाय अपनाए जाने चाहिए जो दूसरे वेरियंट के आने पर अपनाए गए, मसलन मास्क पहनना, शारीरिक दूरी बनाकर रखना, हाथ धोना, यहां तक कि जिन्हें वैक्सीन लग गई है उन्हें भी ये सावधानी बरतनी है क्योंकि हो सकता है वो एसिम्पटोमैटिक बनकर दूसरों को संक्रमित कर दें. साथ ही लोगों को वैक्सीन भी लगाना चाहिए क्योंकि ये एकमात्र तरीका है जिससे बीमारी को खत्म भले नहीं किया जा सकता हो लेकिन उसकी गंभीरता कम की जा सकती है.

    दुनियाभर में वैक्सीन वितरण के समान वितरण सुनिश्चित करने वाले गावी का कहना है कि ये जानना ज़रूरी है कि केवल एंटीबॉडी के नाकाम हो जाने से कुछ नहीं होता है, टी सेल भी अहम भूमिका निभाती हैं. तो कुछ म्यूटेशन हो जाने पर ऐसा ज़रूरी नहीं है कि लैम्बडा हमारे इम्यून सिस्टम को छका ही दे. एंटीबॉडी खून में पाई जाती है लेकिन वैक्सीन कोशिका स्तर पर भी सुरक्षा प्रदान करता है. जिसमें बी और टी सेल का उत्पादन भी शामिल है. तो अगर कोई वेरियंट एंटीबॉडी से बच भी जाता है तो ज़रूरी नहीं है कि कुछ हो ही, लेकिन ये सब कुछ वैक्सीन के प्रकार पर निर्भर करता है. शुरुआती अध्ययन से पता चला कि फाइजर और मॉडर्ना और चीनी वैक्सीन कोरोना वैक के जरिए बनी एंटीबॉडी को ये वेरियंट छका देता है.

    लैम्बडा कहां कहां फैल चुका है
    लैम्बडा के मामले मुख्यतौर पर लैटिन अमेरिकी देशों में ज्यादा रहे हैं. अप्रैल 2021 की कोरोना वायरस का जेनेटिक आकलन बताता है कि पेरू में करीब 97 वजह यही वेरियंट था .

    अगस्त 10 को डब्ल्यूएचओ के साप्ताहिक कोविड-19 अपडेट से पता चलता है कि पिछले हफ्ते के मुकाबले इस हफ्ते मामलों में 14 फीसद की बढोतरी देखने को मिली है. वहीं मौत के मामले में हल्की गिरावट देखने को मिली है. साप्ताहिक मामलों में जहां पेरू में 64 फीसद उछाल दर्ज किया गया वहीं अमेरिका में पिछले हफ्ते के मुकाबले 35 फीसद की बढोतरी दर्ज की गई. पेरू को लेकर ज्यादा डराने वाली बात वहां की मृत्यु दर है जो दुनिया में सबसे अधिक है. यहां प्रति एक लाख में 600 लोगों की जान गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि पेरू में मृत्युदर के बढ़ने की वजह आर्थिक अभाव है. जिसकी वजह से स्वास्थ्य सुविधाएं लचर हैं, टीकाकरण की दर कम है, टेस्टिंग क्षमता सीमित है. हालांकि लैम्बडा अब धीरे धीरे दूसरे देशों में अपने पैर पसार रहा है.

    जून के मध्य में डब्ल्यूएचओ ने बताया कि कम से कम 29 देशों से लिए गए सैंपलों में लैम्बडा वेरियंट पाया गया था. हालांकि भारतीय स्वास्थ्य संगठनों ने जुलाई की शुरुआत में कहा था कि देश में ये वेरियंट नहीं मिला है. नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल का कहना है कि हमारा निगरानी तंत्र इतना मजबूत है कि वो इसे आसानी से पकड़ लेगा, जीनोम सीक्वेंसिंग ट्रैकर जैसे जीसेड और आउटब्रेक. इन्फो ने 43000 सैंपलों में से 6 में लैम्बडा वेरियंट होना दिखाया था और पिछले चार हफ्तों से वो भी नहीं मिला है.

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