OPINION: पाक पीएम के साथ नेहरू ने की थी कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात

जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में मुख्य सचिव के तौर पर नियुक्त रह चुके IAS अधिकारी मूसा रज़ा ने अपनी नई किताब में बताया है कि कैसे आदर्शवाद से प्रभावित नेहरू ने जनमत-संग्रह (Plebiscite) के मसले पर पाकिस्तानी पीएम (Pakistan's PM) के साथ अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया था.

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Updated: September 1, 2019, 9:03 PM IST
OPINION: पाक पीएम के साथ नेहरू ने की थी कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात
जवाहरलाल नेहरू ने पाक पीएम के साथ कश्मीर पर जनमत संग्रह की बात कही थी (फाइल फोटो)
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Updated: September 1, 2019, 9:03 PM IST
(रशीद किदवई)

एक नई किताब जिसमें जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) को कश्मीर समस्या (Kashmir Problem) की उत्पत्ति के लिए मुख्य आरोपी के तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है. इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे आदर्शवाद से प्रभावित नेहरू संयुक्त तौर पर (पाकिस्तान के साथ) जनमत संग्रह की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते रहे.

अपनी किताब 'कश्मीर: लैंड ऑफ रिग्रेट्स' (कश्मीर: पछतावे की जमीन) में जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में मुख्य सचिव रह चुके मूसा रज़ा कश्मीर का एक संक्षिप्त इतिहास उपलब्ध कराया है. इसके अलावा वे 'कश्मीर विवाद' (Kashmir dispute) और 'कश्मीर समस्या' (Kashmir problem) के बीच बिल्कुल सही अंतर करते हैं. लेखक के मुताबिक 'विवाद' के मायने भारत और पाकिस्तान के बीच 1948 से कश्मीर की स्थिति को लेकर चल रहे मतभेद से है. जबकि 'समस्या' का संबंध उग्रवाद, विद्रोह और आतंकवाद (Terrorism) से है, जो 1988 से राज्य में मजबूत होने शुरू हुए और इनमें से ज्यादातर 'कश्मीर विवाद' के ही परिणाम हैं.

जब इंदिरा गांधी ने किया था पाकिस्तानी पीएम का बायकॉट

रज़ा का यह काम कई सारे चौंकाने वाले खुलासे भी करता है. नेहरू की कई सारी गलतियां, जिनकी बात किताब करती है उनमें रज़ा 1953 में संयुक्त तौर पर भारतीय और पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों की ओर से कश्मीर में जनमत संग्रह कराए जाने की बात को रखते हैं. जिसमें दोनों ही देशों ने जनमत संग्रह को लेकर इच्छा व्यक्त की थी. यह वह समय था जब नेहरू सरकार ने घाटी में 'भारतीय सेना को कश्मीर से बाहर निकाला जाना चाहिए' के नारे सुनने के बाद शेख अब्दुल्ला (Sheikh abdullah) को जेल की सलाखों के पीछे डाल रखा था.

तत्‍कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा (Muhammad Ali Bogra) अपनी दूसरी पत्नी लेबनानी-कनाडियन मूल की आलिया के साथ नई दिल्ली आए हुए थे, जो पहले बोगरा की सामाजिक मामलों की सचिव भी रह चुकी थीं. बोगरा के अपनी पूर्व कर्मचारी से शादी करने के चलते पाकिस्तान में उनके प्रति गुस्सा था. खासकर पाकिस्तान के खास नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की पत्नियों में, जो कि बोगरा की पहली पत्नी की करीबी थीं. इंदिरा गांधी (Indira Gandhi), जोकि अनौपचारिक तौर पर नेहरू की संरक्षक के तौर पर उनके साथ रहती थीं, उन्होंने भी इस अवसर पर छुट्टी लेने की सोची, ऐसा करके वे कराची की बेगमों (बोगरा की पहली पत्नी का समर्थन करने वाली महिलाएं) के साथ एकजुटता दिखाने की कोशिश की.

नेहरू और पाकिस्तानी पीएम दोनों ही जनमत संग्रह पर थे राजी
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नेहरू इसी दौरान संयुक्त विज्ञप्ति में कश्मीर में जनमत संग्रह (Plebiscite) पर राजी हुए और इसके लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया. इस विज्ञप्ति में कहा गया था, 'दोनों ही प्रधानमंत्री इन समस्याओं को जल्दी, उचित शांति के साथ और आपसी सहयोग से इन समस्याओं को हल करने के लिए दृढ़ता से काम करेंगे ताकि दोनों ही देशों को साझा फायदा हो सके.'

रज़ा लिखते हैं कि कश्मीर के मसले पर नेहरू और बोगरा के बीच प्रमुखता से चर्चा की गई और एक दृढ़ सहमति बनी की इस विवाद को आपसी तालमेल और राज्य के लोगों की इच्छा के मुताबिक सुलझाया जाना चाहिए. "फैसले में राज्य के लोगों की इच्छा को शामिल करने का सबसे अधिक संभव तरीका साफ-सुथरा और निष्पक्ष जनमत-संग्रह था."

बता दें कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने कहा था कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के संकल्प (UN resolution) के पालन न होने की वजह कुछ प्राथमिक मुद्दों पर सहमति की कमी को बताया था और यह महसूस किया था कि जैसे ही इन मुद्दों पर चर्चा हो जाएगी तो बड़ा कदम उठाते हुए अप्रैल, 1954 के आखिरी तक अगले कदम के तौर पर एक जनमत संग्रह अधिकारी की नियुक्ति कर दी जाएगी.

इसलिए नहीं हुआ जनमत -संग्रह
हालांकि रजा ने कहा था कि सारी प्रगति इसलिए शून्य हो गई क्योंकि नेहरू ने जनमत संग्रह के मामले में दोबारा से विचार शुरू कर दिया था और शायद इसकी सलाह उन्हें उनके साथी मंत्रियों ने दी थी. दूसरी बात, भारत एक अमेरिकन एडमिरल डब्ल्यू निमित्ज़ को जनमत संग्रह अधिकारी के तौर पर नियुक्त करने के प्रस्ताव से खुश नहीं था. इस समय भारत के सोवियत संघ के प्रति झुकाव को देखते हुए पाकिस्तान, अमेरिका के नजदीक जा रहा था. साथ ही एक ऐसा व्यक्ति जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मित्र देशों की वायुसेना, थलसेना और नौसेनाओं का कमांडर-इन-चीफ रहा हो, उसकी निष्पक्षता भी सवालिया घेरे में ही थी.

जब मेनन ने पटेल और नेहरू को कर लिया था कश्मीर हल के लिए राजी
रज़ा की किताब में दावा किया गया है कि सितंबर, 1948 में नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) कश्मीर समस्या के निदान के लिए एक विचार के बहुत ज्यादा करीब आ गए थे. वीपी मेनन (जो कि राज्य सचिव थे) ने अलेक्जेंडर सिमन, जो कि भारत में इंग्लैंड के उप उच्चायुक्त थे और फिलिप नील बेकर जो कि ब्रिटेन में राष्ट्रमंडल संबंधों के राज्य सचिव थे, उनसे कई सारी गुप्त मुलाकातें की थीं. (इस मामले में लेखक मेनन का हलावा देते हुए कहते हैं) मेनन नेहरू और पटेल को एक समझौते पर ले आए थे.

यह प्रस्तावित हल जम्मू-कश्मीर के विभाजन पर आधारित था. जिसमें भारत को पहले से ही हिंदु बहुल प्रांतों को बिना जनमत संग्रह के ही रख लेना था. दूसरा, पाकिस्तान को गिलगित सहित कुछ पहले से मुस्लिम बहुल प्रांतों को बिना किसी जनमत संग्रह के रख लेना था. और अंत में, संयुक्त राष्ट्र के जरिए कराए जाने वाले जनमत संग्रह के जरिए कश्मीर घाटी का भविष्य तय किया जाना था.

ये हैं जम्मू-कश्मीर के असली गुनहगार
रज़ा के मुताबिक कश्मीर समस्या को बनाने वाले चार प्रमुख गुनहगारों में नेहरू भी शामिल हैं. अन्य तीन गुनहगार, जिनका इसे लेकर विस्तार से जिक्र होना चाहिए हैं- लॉर्ड लुईस माउंटबेटन (Mountbatten), महाराजा हरि सिंह (Maharaja Hari Singh) और मोहम्मद अली जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah).

रज़ा की 'कश्मीर: लैंड ऑफ रिग्रेट्स', उनके लिए जो अफगान, सिख और डोगरों के जम्मू-कश्मीर में शासन के बारे में पढ़ना चाहते हैं और कैसे इसे भारत में मिलाना चाहते हैं यह जानना चाहते हैं, यह उनके लिए एक काम की और प्राथमिक परिचय देने वाली किताब है.

जम्मू-कश्मीर सरकार हमेशा भारत पर निर्भर रही
प्रस्तावना में, जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा (Former Governor NN Vohra) ने लेखक के इस विचार को रेखांकित किया है कि जम्मू-कश्मीर में एक के बाद एक शासन में आने वाली सरकारों ने केवल भारत सरकार की दया पर शासन किया है. वोहरा ने अपनी प्रस्तावना में रज़ा की ही बात का जिक्र करते हुए लिखा है, शेख अब्दुल्ला के पास इंदिरा गांधी से समझौते के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह गया था और उनके बेटे फारुक अब्दुल्ला ने उनके (इंदिरा गांधी के) बेटे राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) से हाथ मिला लिए थे.

जहां तक कश्मीर के लोगों में वहां की राज्य सरकार को लेकर साधारणत: और भारत सरकार को लेकर खासकर बड़ी मात्रा में गुस्सा है, इसका श्रेय रज़ा खराब प्रशासन को देते हैं. वे इसकी वजह बढ़े हुए मटन के दाम, सर्दियों में पानी की कमी, राशन की अपर्याप्त सप्लाई, सर्दियों में किसी भी तरह की सरकार का घाटी में न होना, भीड़ और यहां तक कि साधारण नागरिक प्रशासन का श्रीनगर से नदारद होने को बताते हैं.

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First published: September 1, 2019, 6:20 PM IST
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