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सिंधिया फास्ट डायल पर रखते थे राहुल-प्रियंका का नंबर, फिर क्यों कांग्रेस छोड़ने पर हुए मजबूर

सिंधिया समर्थकों के अनुसार कांग्रेस में हमेशा उन पर नजर रखी जाती थी. (फाइल फोटो)

सिंधिया समर्थकों के अनुसार कांग्रेस में हमेशा उन पर नजर रखी जाती थी. (फाइल फोटो)

जो लोग सिंधिया (Scindia) के करीबी हैं, वे कह रहे हैं कि यह उनका एक प्यारा सा बदला है. जिन्होंने ज्‍योतिरादित्‍य को 'गुना (Guna) और उसके आस-पास का एक छोटा खिलाड़ी' मानकर खारिज करना चाहा था, वह अब इस बात पर पछताएंगे कि उनकी अनदेखी की गई.

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    (पल्लवी घोष)
    कमलनाथ (Kamal Nath) को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री (CM of Madhya Pradesh) और उनके साथी सचिन पायलट (Sachin Pilot) को राजस्थान (Rajasthan) का उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के सिर्फ दो दिन बाद जब हमने ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Sindhiya)से पूछा कि क्या वे बाहर छूटा महसूस कर रहे हैं. उस समय उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा था, 'हर किसी को चीजों के बड़े और अच्छे होने का इंतजार करना चाहिए'. लेकिन यह एक ऐसा इंतजार था, जो इतना लंबा खिंचा कि अंतत: सिंधिया को आगे बढ़ जाने का निर्णय करना पड़ा.

    जहां तक कांग्रेस (Congress) की बात है, सिंधिया पर हमेशा से उसमें विश्वास में कमी रही है. जब वे लोकसभा में राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के कानों में यह बताया करते थे कि एक प्रचार अभियान के दौरान संसद में क्या बोलना है या जब वे प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) के साथ उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के प्रभारी महासचिव हुआ करते थे और उन्हें कुछ सलाह देते थे तो इसे हमेशा गुना के महाराज के खिलाफ प्रचार के तौर पर यूज किया जाता था और कहा जाता था- "सिंधिया पर भरोसा मत करना. वह राहुल गांधी के लिए खतरा है."

    सिंधिया की बेचैनी के बारे में राहुल-प्रियंका को जरूर रही होगी जानकारी

    सिंधिया के कुछ समर्थकों ने तर्क दिया है कि यही बात थी, जिसके चलते राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मंडली के नेता उन पर निगरानी रखना अच्छा समझते थे. और ऐसा ही एक मौका था जब उन्हें राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण राज्यों जैसे यूपी का प्रभारी बनाया गया, लेकिन प्रियंका गांधी के साथ. उन्होंने ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) में भी एक पद संभाला और कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठकों के दौरान एक-दूसरे के अगल-बगल बैठते थे. सिंधिया को शायद ही कभी अकेले छोड़ा जाता था.

    इसमें कोई शक नहीं है कि सिंधिया, कांग्रेस (Congress) के लिए एक बड़ा नुकसान हैं. वे समझदार, मुखर और भीड़ जुटाने वाले नेता हैं. वे राहुल गांधी की तरह अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहते हैं, यह उनकी तमाम गतिविधियों में से एक है, जो दोनों को करीब लाती थींं. सिंधिया की फास्ट डायल लिस्ट पर गांधी भाई-बहनों के नंबर रहते थे, ऐसे में यह संभव नहीं है कि उन्हें सिंधिया की बेचैनी का पता न हो. उन्होंने दोनों ही भाई-बहन को बता रखा था कि मध्यप्रदेश की राजनीति पर दिग्विजय सिंह-कमलनाथ (Kamal Nath) की पकड़ के जरिए उन्हें छोटा किया जा रहा है.

    डिनर मीटिंग में चीजें खराब होने के बाद बीजेपी नेताओं के संपर्क में आए सिंधिया

    सिंधिया 2001 में अपने पिता के एयरप्लेन क्रैश में मारे जाने के बाद राजनीति में आए थे. पिछले साल तक, सिंधिया गुना से सांसद थे और इस इलाके और इसके आस-पास के इलाकों पर उनकी पकड़ काफी मजबूत थी. वे एक क्रिकेट प्रेमी भी हैं, और यह उनका ट्विटर परिचय (Twitter Bio) भी कहा रहा है, सिंधिया मध्यप्रदेश क्रिकेट बोर्ड के एक सदस्य भी हैं.

    यह सिंधिया का एक छक्का ही है, जिसने पार्टी को क्लीन बोल्ड कर दिया है. लेकिन इसके लक्षण पहले से ही मौजूद थे. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) के साथ एक डिनर मीटिंग के दौरान, जिसे चीजों को सुलझाने के लिए बुलाया गया था, सिंधिया ने बताया था कि चीजें कैसे उनके हिसाब से नहीं चल सकतीं. इस डिनर का अंत संबंधों के और भी खराब होने के साथ हुआ और यही वह समय था जब सिंधिया कुछ बीजेपी नेताओं के संपर्क में आए.

    सिंधिया का जाना आलाकमान के लिए सबक और शाही लड़ाई की शुरुआत
    सिंधिया ने स्थितियों के सुधरने का इंतजार किया और आशा की कि उन्हें कोई ऑफर दिया जाएगा. लेकिन यह एक बहुत लंबा और व्यर्थ इंतजार साबित हुआ. लगता है सिंधिया की विदाई और कमलनाथ की सरकार का अंत साथ ही होगा. सिंधिया के करीबी लोगों का कहना है कि यह उनका प्यारा बदला है. उन्होंने आशा जताई है कि उन्हें कांग्रेस को विनम्र करन की आशा थी और वे यह साबित करना चाहते थे कि जिन्होंने उन्हें 'गुना और उसके आस-पास का एक छोटा खिलाड़ी' मानकर खारिज करना चाहा था, अब इस बात पर पछताएंगे कि उनकी अनदेखी की गई. सिंधिया ने भी अपने करीबी साथियों को बताया है कि अब उनकी लड़ाई सिर्फ एक राज्यसभा सीट (Rajya Sabha Seat) की नहीं रह गई है. यह पार्टी की आलाकमान के लिए एक सबक भी है कि किसी की अनदेखी न करें. लेकिन अंदर ही अंदर यह दो महाराजाओं के बीच की लड़ाई है. सिंधिया हमेशा दिग्विजय सिंह को उनके नाम से बुलाते आए थे, जो उन्हें परेशान करता था. आज सिंधिया दूसरे खेमे में चले गए हैं, ऐसे में शाही लड़ाई आमने-सामने की हो चुकी है.

    ह भी पढ़ें: अपमान, झगड़ा और किसी सिंधिया की विदाई: दादी-पिता की राह पर ज्योतिरादित्य

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