सिक्खों और पंजाब के लिए क्यों खास है 'मलेरकोटला', जिसे अलग जिला बनाने पर छिड़ा सियासी विवाद

मलेरकोटला का रेलवे स्टेशन

मलेरकोटला का रेलवे स्टेशन

Punjab Malerkotla: ईद (14 मई) के दिन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मलेरकोटला को पंजाब का 23वां जिला बनाने की घोषणा की.

  • Share this:

पंजाब का एकमात्र शहर जो मुस्लिम बाहुल्य है, लेकिन अपने हिंदु-मुस्लिम भाईचारे के लिए पूरे भारत में पहचान रखता है. यह शहर है मलेरकोटला जो एक बार फिर सुर्खियों में हैं. हुआ यूं कि ईद (14 मई) के दिन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मलेरकोटला को पंजाब का 23वां जिला बनाने की घोषणा कर दी. इस घोषणा के बाद मुख्यमंत्री के इस फैसले पर पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गया. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा कि नया जिला बनाने की घोषणा करना ‘कांग्रेस की बांटने की नीति को दर्शाता है.’ योगी आदित्यनाथ के इस बयान पर पलटवार करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री शायद इतिहास से अनभिज्ञ हैं तभी जानते नहीं हैं कि मलेरकोटला के सिक्ख और मुस्लिमों के बीच नाता काफी पुराना रहा है, बल्कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री का बयान सांप्रदायिक दुर्भावना पैदा कर रहा है. आखिर मलेरकोटला सिक्खों के लिए क्यों खास हैं? और वर्तमान में ये क्यों चर्चा का विषय बना हुआ है-

कैसे बना मलेरकोटला का अस्तित्व?

इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो पता चलता है कि मलेरकोटला की नींव 15 वीं सदी में एक सूफी संत शेख सदरुद्दीन सदर-ए-जहां - जिन्हें हैदर शेख के नाम से भी जाना जाता है - ने रखी थी. पहले ये इलाका बहुत ही मामूली-सा था जिसे बेहलोल लोधी ने शेख को तोहफे में दिया था, जो लोधी की ही तरह अफगानी थे, ऐसा माना जाता है कि ये दोनों दूर के रिश्तेदार थे. आगे चलकर 17 वीं सदी में इसमें कुछ गांवों को जोड़ कर जागीर तैयार की गई, ये वो गांव थे जो शेख के वंशज बेयजिद ख़ान को मुगल शासक शाहजहां ने तोहफे में दिए थे. इसके बाद इसे एक किले या गढ़ी में तब्दील किया गया और मलेर के आगे ‘कोटला’ जोड़ा गया. बेयजिद खान ने औरंगजेब का समर्थन किया था, जब उसकी अपने भाई दारा शिकोह से लड़ाई छिड़ गई थी. इसके बाद से वो मुग़ल परिवार का खास हो गया था. मुगल साम्राज्य के पतन के बाद मलेरकोटला के शासक ज्यादा स्वंतत्र तरीके से काम कर रहे थे, लेकिन जब भारत में अफगानिस्तान से आए अहमद शाह अब्दाली ने आक्रमण किया तो यहां के शासकों ने उसके साथ हाथ मिला लिया.

मलेरकोटला के अपने पड़ोसी राज्यों के साथ कैसे रिश्ते रहे
इतिहासविद एना बिगेलो के ‘पंजाब के मुस्लिम’ अध्ययन के मुताबिक 19 वीं सदी की शुरुआत में जब महाराजा रणजीत सिंह उत्तरी पंजाब के अपने शासन को संगठित करने में लगे हुए थे, उस दौरान मलेरकोटला ने अपने पड़ोसी राज्य पटियाला, नाभा, जींद के साथ हाथ मिला लिया क्योंकि वो रणजीत सिंह के सिक्ख शासन के संगठन से घबरा गए थे. इसलिए सतलज नदी के आस-पास की इन रियासतों ने 1809 में अपनी सुरक्षा के लिए ब्रिटिश शासन की शरण में जाना स्वीकार किया ताकि वो सिक्ख महाराजा के हस्तक्षेप से खुद को बचा सकें. तब से 1947 तक मलेरकोटला, ब्रिटेन शासन के अंतर्गत रहा और पूर्वी पंजाब का अकेला मुस्लिम बाहुल्य सिक्ख राज्य बना. 1948 में जब रियासतों का विलय हुआ उस दौरान मलेरकोटला ने पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पेप्सू) के साथ हाथ मिला लिया. आगे चलकर 1954 में पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ पंजाब में मिल गया और इस तरह मलेरकोटला पंजाब राज्य का हिस्सा बन गया.

मलेरकोटला का कैसे रहे हैं सिक्ख समुदाय के साथ रिश्ते?

मलेरकोटला और सिक्खों के बीच के खास रिश्ते तब पनपे जब सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह अपने क्षेत्र में मुगलों के अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. शेर मोहम्मद खान उस दौरान मलेरकोटला के नवाब थे. हालांकि वह औरंगजेब के समर्थक और लेफ्टिनेंट थे जिनका उस दौरान पंजाब पर शासन था, लेकिन उन्होंने 1705 में गुरु गोबिंद सिह के दो बच्चों ज़ोरावर सिंह (उम्र 9 साल) और फतेह सिंह ( उम्र 7 साल) के सिरहिंद के सूबेदार वज़ीर खाने के द्वारा जिंदा चुनवाए जाने को लेकर अपना दुख जताया था. जब दोनों बच्चों को ईंट की दीवार में जिंदा चुनवाने का आदेश दिया गया, उस दौरान शेर मोहम्मद खान ने वज़ीर खान के सामने ‘हा दा नारा’ यानी न्याय का नारा दिया था. इस घटना को सदियों तक दोनों युवा साहिबजादों के प्रति नवाब की संवेदना के तौर पर सुनाया जाता रहा है और इस वजह से मलेरकोटला सिक्ख इतिहास में खास जगह रखता है.



गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु के बाद जब उनके अनुयायी बंदा सिंह बहादुर ने सिरहिंद को लूटा और उसे शिकस्त दी, उस दौरान उन्होंने मलेरकोटला को छोड़ दिया. इतिहासविद एना बिगेलो कहती हैं कि बंदा सिंह बहादुर के ऐसा करने के पीछे कई कारण थे. इफ्तिख़ार ख़ान जो मलेरकोटला के आखिरी नवाब थे, उन्होंने अपने साम्राज्य के इतिहास की जानकारी में बताया है कि कई लोगों का ऐसा मानना है कि मलेरकोटला को छोड़ने के पीछे की वजह ‘हा दा नारा’ था. मलेरकोटला के छोड़ने की और कोई खास वजह तो सामने नहीं आती है, लेकिन जनश्रुतियों और चली आ रही कहानियों से भी यही जानकारी मिलती है कि लोगों में मलेरकोटला को लेकर विशेष सम्मान इसलिए भी है क्योंकि उनका ऐसा मानना है कि इस जगह पर गुरु गोबिंद सिंह का आशीर्वाद रहा है.

‘हा दा नारा’ के बाद सिक्खों के साथ कैसे रहे मलेरकोटला शासकों के संबंध

इतिहास बताता है कि ‘हा दा नारा’ घटना के बाद भी मलेरकोटला के शासकों का मुगल शासकों के प्रति झुकाव बना रहा और जब मुगल शासन का सूर्य अस्त होने लगा तो उन्होंने अफगान के आक्रांता अहमद शाह अब्दाली के साथ हाथ मिला लिया. हालांकि पंजाब के विभिन्न शासक जिनमें मलेरकोटला भी शामिल था, उनकी एक-दूसरे से लड़ाई की कई वजह थी जिसमें पैसा, अस्थायी गठजोड़ और खुद को बचाए रखने की प्रवृत्ति शामिल थी. मसलन मलेरकोटला के नवाब जमाल खान ने पटियाला के शासक के साथ युद्ध किया और अब्दाली के साथ हाथ मिलाने से पहले उसके साथ भी विरोध किया था. नवाब जमाल खान का उत्तराधिकारी भीकम शाह 1762 में सिक्खों के खिलाफ लड़ाई में अब्दाली की सेना के समर्थन में लड़ा था. ‘वड्डा घल्लूघारा’ नाम से चर्चित इस लड़ाई में बहुत तबाही हुई थी और हज़ारों सिक्खों ने अपन जान गंवाई थी. इसके बाद 1769 में पटियाला की रियासत के राजा अमर सिंह और मलेरकोटला के नवाब के बीच एक मित्र संधि हुई, इसके बाद पटियाला रियासत ने कई बार मलेरकोटला की मदद की खासकर 1795 के दौरान जब साहिब सिंह बेदी, जो सिक्खों के पहले गुरु, गुरु नानक देव के वंशज थे, उन्होंने गायों को काटे जाने के मुद्दे पर मलेरकोटला पर चढ़ाई कर दी थी.

हालांकि, 1872 में मलेरकोटला में नामधारी (सिक्ख पंथी) का नरसंहार इतिहास में इस शहर के नाम एक काला पन्ना जोड़ता है. इस नरसंहार को लेकर अलग-अलग मत हैं. कुछ लोगों का मानना है कि कुछ असामाजिक अनुयायियों ने शहर पर हमला किया था, कुछ का मानना है कि ये हमला लूटमार के उद्देश्य से किया गया था, वहीं कुछ मानते हैं कि मलेरकोटला में नामधारी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था, जिसकी वजह से ये घटना घटी. ऐसा माना जाता है कि उस दौरान मलेरकोटला में ब्रिटिश प्रशासन काम कर रहा था क्योंकि नवाब उम्र में छोटे थे और उन्हें क्रूरतापूर्वक मार दिया गया था, जिसका बदला लेने के लिए 69 नामधारियों को मौत के घाट उतार दिया गया था, जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे.

विभाजन के दौरान हुए दंगों में कैसे बचा मलेरकोटला

1935 में हुई एक सांप्रदायिक घटना को अगर छोड़ दें, तो मलेरकोटला में हमेशा ही सौहार्द्रपूर्ण माहौल रहा है. जब 1947 में विभाजन के वक्त पूरा देश दंगों की आग में झुलस रहा था और पंजाब की कई रियासतों में कानून-व्यवस्था चकनाचूर हो चुकी थी और पटियाला, नाभा, जींद जैसे क्षेत्रों में बड़े स्तर पर लोगों को मौत के घाट उतारा जा रहा था उस दौरान भी मलेरकोटला में कोई घटना नहीं घटी थी. प्रोफेसर इश्तियाक़ अहमद ने अपनी किताब ‘पंजाब- ब्लडीड, पार्टीशन एंड क्लींस्ड’ में कई प्रत्यक्षदर्शियों ने अपनी कहानी बयान की है. उनका कहना है कि उस दौरान जब भारत में कत्ले-आम चल रहा था तब भी मलेरकोटला आने वाले शरणार्थियों को किसी ने हाथ नहीं लगाया था. कई लोगों का ऐसा मानना था कि मलेरकोटला पर गुरु गोबिंद सिह का आशीर्वाद है. उस दौरान हिंसा का हिस्सा रहे एक शख्स प्रोफेसर को बताते हैं ‘रोड तो एधर किस्से नु छड़ेया नही,, रोड तो ओधर किस्से नु हाथ नई लाया... यानी हमने सड़क के इस पार किसी को छोड़ा नहीं और (मलेरकोटला की सीमा) सड़क के उस पार किसी को हाथ तक नहीं लगाया. ’

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज