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मोदी सरकार ने क्यों चला सवर्णों को आरक्षण का दांव, क्या संविधान देता है इजाजत?

मोदी सरकार ने क्यों चला सवर्णों को आरक्षण का दांव, क्या संविधान देता है इजाजत?

अपर कास्ट के लिए आरक्षण की पैरवी अठावले, मायावती, पासवान ने भी की थी?

अपर कास्ट के लिए आरक्षण की पैरवी अठावले, मायावती, पासवान ने भी की थी?

नरसिंह राव सरकार ने आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया था, राजस्थान, हरियाणा में भी खारिज हो चुका है इस तरह का प्रयास

    मोदी कैबिनेट ने गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मंजूरी दे दी है. रविवार 6 जनवरी को रामलीला मैदान में दलितों के लिए समरसता खिचड़ी बनवाने के अगले ही दिन सवर्णों पर दांव क्यों चला गया? सियासत के जानकारों का मानना है कि सवर्ण वोटरों की नाराजगी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ये कदम उठाया है. क्योंकि उसे अब आम चुनाव में जाना है. दलितों और पिछड़ों की ओर झुकाव की वजह से बीजेपी को यह आशंका थी कि कहीं उसका कोर वोटर खिसक न जाए. सियासी जानकारों का कहना है कि संविधान मौजूदा प्रावधानों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में सरकार को संविधान संशोधन करना पड़ेगा. जिसके लिए दोनों सदनों में उसे दो तिहाई बहुमत चाहिए होगा. (ये भी पढ़ें: SC/ST एक्‍ट के विरोध पर BJP सांसद पार्टी पर भड़कीं-'संविधान लागू करो वर्ना कुर्सी खाली करो')

    अपर कास्ट के लिए आरक्षण की पैरवी दलित नेता रामदास अठावले, मायावती और राम विलास पासवान भी कर चुके हैं. हालांकि, आर्थिक आधार पर आरक्षण को सर्वोच्च न्यायालय पहले ही खारिज कर चुका है. 1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था.  हालांकि, 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया.

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    बताया गया है कि जाट आरक्षण खत्म करने का फैसला देते हुए अदालत ने कहा था कि सिर्फ जाति पिछड़ेपन का आधार नहीं हो सकती. राजस्थान सरकार ने 2015 में उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए पांच फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, उसे भी निरस्त कर दिया. हरियाणा सरकार का भी ऐसा फैसला न्यायालय में नहीं टिक सका था. तो फिर क्या केंद्र सरकार के इस कदम का क्या होगा?

    केंद्र सरकार ने भी जो दांव चला है उसमें अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछड़े वर्ग को मिल रहे आरक्षण से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी बल्कि अलग से गरीब सवर्णों को आरक्षण दिया जाएगा. सामाजिक चिंतकों का कहना है कि हमारे देश में जातिगत भेदभाव भी गरीबी और पिछड़ेपन का प्रमुख कारण रहा है, इसलिए यहां जाति के आधार पर आरक्षण का प्रावधान लागू किया गया. किंतु इससे असंतोष भी पैदा हुआ है और समाज के अनेक वर्ग अलग-अलग राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के साथ आंदोलन कर रहे हैं. सरकार पर दबाव बना रहे हैं.

    भारत में आरक्षण की व्यवस्था

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है, बशर्ते, ये साबित किया जा सके कि वे औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं. इसे तय करने के लिए कोई भी राज्य अपने यहां पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करके अलग-अलग वर्गों की सामाजिक स्थिति की जानकारी ले सकता है.

    सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आम तौर पर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता. आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत एससी के लिए 15, एसटी के लिए 7.5 व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण है. यहां आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. इसीलिए अब तक जिन राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश हुई उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया.

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    क्या नया है सवर्णों को आरक्षण देने का मुद्दा?

    बीजेपी ने 2003 में एक मंत्री समूह का गठन किया. हालांकि इसका फायदा नहीं हुआ और वाजपेयी सरकार 2004 का चुनाव हार गई. साल 2006 में कांग्रेस ने भी एक कमेटी बनाई जिसको आर्थिक रूप से पिछड़े उन वर्गों का अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं. लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ.

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    Tags: BJP, Jat reservation issue, Reservation, Socio Economic and Caste Census

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