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क्या इन 4 घटनाओं ने नीतीश कुमार को बीजेपी से गठबंधन खत्म करने के लिए मजबूर किया? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

क्या इन 4 घटनाओं ने नीतीश कुमार को बीजेपी से गठबंधन खत्म करने के लिए मजबूर किया? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

 नीतीश कुमार की नारजगी. (AP)

नीतीश कुमार की नारजगी. (AP)

Bihar Politics: बिहार में अब सत्ता में आने वाले गठबंधन में 164 विधायकों के साथ 7 दल शामिल हैं, ये 2015 के गठबंधन से काफी बड़ा है. इससे पता चलता है कि बिहार में सभी विपक्षी दल राज्य में भाजपा की बढ़ती पैठ को रोकने के लिए उत्सुक हैं.

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हाइलाइट्स

बिहार में अगला चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा
जद (यू) और राजद जाति के आधार पर चुनाव लड़ना चाहते हैं
बिहार की जाति जनगणना 2024 में अगले लोकसभा चुनाव से पहले जारी होने की उम्मीद

नई दिल्ली. ‘मुझे भाजपा द्वारा लगातार अपमानित किया गया…’ ये शब्द नीतीश कुमार के हैं. उन्होंने ये बातें मंगलवार को भाजपा के साथ अपने पांच साल चले गठबंधन को खत्म करने से पहले पार्टी के विधायकों से कही. दरअसल जद (यू) नेता नीतीश उन चार प्रमुख घटनाओं का जिक्र कर रहे थे जिनके कारण गठबंधन टूटने के हालात बने. सबसे पहले उन्होंने देखा कि 2020 के चुनावों में स्व-घोषित ‘मोदी के हनुमान’ चिराग पासवान ने जद (यू) को नुकसान पहुंचाया. नीतीश की पार्टी को महज 43 सीटों पर जीत से संतोष करना पड़ा.

दूसरी बात जो नीतीश कुमार को पसंद नहीं आई वो है जद (यू) के पूर्व नेता आरसीपी सिंह का एक साल बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना. तीसरा मुद्दा जाति जनगणना से जुड़ा है. केंद्र सरकार देश भर में जाति जनगणना के खिलाफ थी. लेकिन इसके बावजूद नीतीश पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ मिले. ये गठबंधन के ताबूत में तीसरी कील थी. इसके बाद पिछले महीने महाराष्ट्र के घटनाक्रम ने उन्हें डरा दिया. नीतीश को लगा कि शायद उनका भी उद्धव ठाकरे जैसा हाल न हो जाए.

हालांकि उनके इस कदम का मतलब कुछ और भी है. दरअसल बिहार में इन दिनों विपक्षी दल राज्य में ‘मंडल’ की कहानी को पुनर्जीवित करने के लिए एक साथ आ रहे हैं और भाजपा का मुकाबला करने के लिए जाति-आधारित राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. इसका ट्रेलर तब देखने को मिला जब नीतीश और तेजस्वी यादव ने बिहार की अन्य पार्टियों के साथ मिलकर पिछले साल प्रधानमंत्री के पास एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर जाति जनगणना की मांग की थी. जब केंद्र ने मना किया तो कुमार ने बिहार में जाति जनगणना शुरू करने का फैसला किया, जिसका बिहार में भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों ने समर्थन किया था. बिहार की ये जाति जनगणना 2024 में अगले लोकसभा चुनाव से पहले जारी होने की उम्मीद है.

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सभी जातियों के हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए ‘राष्ट्रवादी’ और ‘हिंदुत्व’ की अपील का इस्तेमाल किया, जिससे राज्य की राजनीति में समाजवादी पार्टी और बसपा जैसी क्षेत्रीय जाति-आधारित पार्टियों को अप्रासंगिक बना दिया गया. कुमार को आशंका थी कि इसी तरह की कहानी बिहार में हावी हो रही है. बीजेपी ने अपना आधार बढ़ाया है और हाल ही में राज्य की सभी 243 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी रणनीति तैयार की है.

जद (यू) और राजद जाति के आधार पर चुनाव लड़ना चाहते हैं. साल 2015 में दोनों दलों ने आरक्षण पर आरएसएस प्रमुख के बयान का फायदा उठाते हुए जीत दर्ज की थी. लालू प्रसाद ने 2015 में गठबंधन के पक्ष में मतदाताओं को यह कहकर झुका दिया कि भाजपा बिहार में सत्ता में आने पर आरक्षण की समीक्षा करेगी और उसे खत्म कर देगी.

बिहार में अब सत्ता में आने वाले गठबंधन में 164 विधायकों के साथ 7 दल शामिल हैं – ये 2015 के गठबंधन से काफी बड़ा है. इससे पता चलता है कि बिहार में सभी विपक्षी दल राज्य में भाजपा की बढ़ती पैठ को रोकने के लिए उत्सुक हैं. राज्य में जाति समीकरण राजद-जद (यू) के नेतृत्व वाले गठबंधन के पक्ष में है, लेकिन भाजपा विकास, स्थिरता, भ्रष्टाचार विरोधी और कानून व्यवस्था के मुद्दे पर मतदाताओं को एकजुट करने और लड़ाई के लिए आक्रामक रुख अपनाएगी. बिहार में अगला चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा. भाजपा 2015 में सफलता का स्वाद नहीं चख सकी थी लेकिन उसे उम्मीद है कि एक दशक बाद 2025 के चुनावों में उसकी रणनीति रंग लाएगी.

Tags: Nitish kumar

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