2019 में इन 7 सीटों पर कमल खिलने के बाद ममता बनर्जी के लिए बुरा सपना बन गया है उत्तर बंगाल

2019 में इन 7 सीटों पर कमल खिलने के बाद ममता बनर्जी के लिए बुरा सपना बन गया है उत्तर बंगाल
ममता बनर्जी ने 2021 में अगले विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी में गुटबाजी से निपटने के लिए एक बड़े संगठनात्मक फेरबदल का फैसला किया है. (PTI)

बीजेपी उत्तर बंगाल में तेजी से बढ़ी है. ऐसे में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने 2021 में अगले विधानसभा चुनावों (West Bengal Assembly Election 2021) से पहले पार्टी में गुटबाजी से निपटने के लिए एक बड़े संगठनात्मक फेरबदल का फैसला किया है.

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  • Last Updated: July 20, 2020, 11:57 AM IST
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(सुजीत नाथ)

कोलकाता. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग या 'डोरज-लिंग' (वज्र) के ठंडे इलाकों समेत पूर्व, पश्चिम और दक्षिण क्षेत्र में बीजेपी की पैठ बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) अब उत्तर बंगाल पर नजर गड़ाए हुए हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विनाशकारी प्रदर्शन के बाद ये ममता के लिए एक बुरा सपना बन गया है.

लोकसभा चुनाव में कूच बिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, रायगंज, बालुरघाट, उत्तरी मालदा और दक्षिण मालदा सहित आठ लोकसभा सीटों में ममता बनर्जी की पार्टी एक भी सीट जीतने में नाकाम रहीं. आठ में से सात सीटें बीजेपी के पास गई. जबकि मालदा दक्षिण सीट दिवंगत गनी खान चौधरी के भाई अबू हसीम खान चौधरी (कांग्रेस) ने जीत ली थी, जिन्हें बंगाल में 'दल्लू दा' के नाम से जाना जाता है.



उत्तरी मालदा में बीजेपी के खगेन मुर्मू ने सांसद मौसिम नूर (पूर्व कांग्रेस सांसद लेकिन टीएमसी के टिकट पर आखिरी लोकसभा चुनाव लड़ा) को हराया. जबकि मालदा दक्षिण में 'दल्लू दा' ने बीजेपी के श्रीरूपा मित्रा चौधरी को हराकर सीट जीती. टीएमसी के मोअज़्ज़म हुसैन 27.47 वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर रहे.
2019 में कूच बिहार से बीजेपी के निशीथ प्रमाणिक, अलीपुर द्वार से जॉन बारला, जलपाईगुड़ी से जयंत कुमार रे, दार्जिलिंग से राजू सिंह बिष्ट, रायगंज से देवश्री चौधरी, बालुरघाट से सुकांता मजूमदार और उत्तरी मालदा से खगेन मुर्मू ने जीत हासिल की थी. इस तरह बीजेपी उत्तर बंगाल में तेजी से बढ़ी है. ऐसे में ममता बनर्जी ने 2021 में अगले विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी में गुटबाजी से निपटने के लिए एक बड़े संगठनात्मक फेरबदल का फैसला किया है.


राजनीतिक विशेषज्ञ कपिल ठाकुर को लगता है कि पुरुलिया के अलावा उत्तर बंगाल में 24 उत्तर-परगना और जुंगलमहल (जहां टीएमसी अपनी पकड़ खो रही है) सभी लड़ाइयों की जननी होगी. इनमें कुल 294 सीटों में से 54 विधानसभा सीटें आती हैं. इन सीटों पर जीत के बाद ही बंगाल में बीजेपी और टीएमसी के भाग्य का फैसला होगा.

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कपिल ठाकुर आगे कहते हैं, 'आपने देखा होगा कि कैसे ममता बनर्जी ने राजबंशी या कामतापुरी समुदाय पर अपना सामुदायिक कार्ड खेलना शुरू किया है. कभी-कभी वह अनुकूलचंद्र (बांग्लादेश में पैदा हुए एक आध्यात्मिक नेता और सत्संग के संस्थापक) का कार्ड खेलती हैं. फिर कभी-कभी वह मटुआ कार्ड आजमाती हैं. यह बंगाल में नया नहीं है, क्योंकि अधिकांश राजनीतिक दल राजबंशी को लुभाने की कोशिश करते हैं, जो किसी भी चुनाव में उत्तर बंगाल में एक निर्णायक कारक होते हैं.'

ममता बनर्जी यह अच्छी तरह से जानती हैं कि राजबंशी के वोट शेयर में विभाजन उनके 'मिशन एकुश' (2021 विधानसभा चुनाव) को खतरे में डाल सकता है.


वहीं, अलीपुर द्वार के बीजेपी सांसद जॉन बारला ने कहा, 'हाल ही में ममता बनर्जी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पंचानन बर्मा (राजबंशी के एक नेता और कूचबिहार के सुधारक) से संबंधित मुद्दे को उठाया, जिनकी 1935 में मृत्यु हो गई थी. पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय के वीसी स्वप्ना बर्मन को इसके लिए राज्यपाल की ओर से शो-कॉज नोटिस भी दिया गया था. तब मुख्यमंत्री ने तुरंत यह कहकर अपना राजनीतिक कार्ड खेला कि राज्यपाल ने न केवल वीसी का अपमान किया है, बल्कि पंचानन बर्मा ने जो राजबंशी समुदाय का गौरव बढ़ाया, उसे भी क्षति पहुंचाई है.'

उत्तर बंगाल में लगभग 27 से 29 फीसदी मुस्लिम वोटों (जो कि मतदान के मामले में समान रूप से बड़े कारक हैं) के बारे में बात करते हुए जॉन बारला ने कहा, 'यहां तक ​​कि मुस्लिम मतदाताओं ने महसूस किया है कि टीएमसी में कोई भविष्य नहीं है. उनमें से अधिकांश अब भाजपा की ओर बढ़ गए हैं. हम न सिर्फ उत्तर बंगाल में सभी सीटें जीतेंगे, बल्कि 2021 में बंगाल में हमारी सरकार भी बनने जा रही है. अगर एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होता है, तो हम सभी 54 विधानसभा सीटों को जीतने जा रहे हैं. कोई भी हमें रोक नहीं सकता है.'

2016 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 10.2 प्रतिशत था. 2019 लोकसभा में यह 40.3 प्रतिशत हो गया. मुख्य रूप से हिंदुओं के भाजपा के साथ तालमेल के कारण 30.1 प्रतिशत वोट शेयर में वृद्धि हुई थी. पिछले तीन वर्षों में बीजेपी बंगाल में धार्मिक प्रेरित राजनीति करने में सफल रही. यह उसके वोट शेयर के मामले में बंगाल में महत्वपूर्ण वृद्धि के साथ स्पष्ट हुआ.


आंकड़े बताते हैं कि 2011 के विधानसभा से लेकर 2016 के विधानसभा चुनावों तक वाम मोर्चे को अपना वोट शेयर 9.88 फीसदी और 2014 लोकसभा से 2019 लोकसभा में अपना वोट शेयर करीब 16 फीसदी तक गिर गया है.

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News18 से बात करते हुए राज्य के पर्यटन मंत्री गौतम देब ने कहा, 'यह टीएमसी का लाभ है, क्योंकि बीजेपी का बंगाल में कोई मुख्यमंत्री चेहरा नहीं है. बंगाल में लोग आम तौर पर एक मुखर पार्टी के लिए चुनते हैं. विशेष रूप से विधानसभा चुनावों में ऐसा होता है. हमने ममता बनर्जी के नेतृत्व में उत्तर बंगाल में वास्तव में कड़ी मेहनत की है. हमें आने वाले चुनावों में अच्छी संख्या में सीटें मिलना सुनिश्चित है.' (अंग्रेजी में इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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