तमिलनाडुः उपचुनावों में देरी आखिर क्यों है DMK और AIADMK के फायदे में

तमिलनाडुः उपचुनावों में देरी आखिर क्यों है DMK और  AIADMK के फायदे में
ओ पन्नीरसेल्मम और स्टालिन

मौजूदा परिस्थितियों में डीएमके में पड़ी इस फूट का विरोधी पार्टियां फायदा उठा सकती हैं और अलागिरी को डीएमके के खिलाफ भड़का सकती हैं.

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  • Last Updated: October 8, 2018, 9:19 AM IST
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(टीएस सुधीर)

तमिलनाडु में उपचुनाव अक्टूबर 2016 में चुनाव करवाए जाने थे लेकिन ये अभी तक संभव नहीं हो पाया है. जे जयललिता के निधन के बाद आरके नगर में होने वाले उपचुनाव को अप्रैल 2017 में भारी मात्रा में धन बांटने और अन्य गलत गतिविधियों के आधार पर रद्द कर दिया गया और तब से एक लगभग एक साल हो गई लगातार वही स्थिति बनी हुई है.

अब एके बोस और एम करुणानिधि के निधन के बाद थिरुप्परनकुंद्रम और थिरुवरूर विधानसभा सीट भी खाली हो गई है. तकनीकी रूप से चूंकि दोनों नेताओं की मौत अगस्त में हुई है इसलिए चुनाव आयोग के पास इन सीटों पर उपचुनाव कराने के लिए फरवरी तक का समय है. हालांकि नवंबर-दिसंबर में पांच अलग-अलग राज्यों में  विधानसभा चुनाव और कर्नाटक में उपचुनाव करवाए जा रहे थे इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि तमिलनाडु की इन दो सीटों पर भी चुनाव करवा लिए जाएंगे.



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लेकिन इन दोनों सीटों पर चुनाव न करवाने के लिए तमिलनाडु की मुख्य सचिव गिरिजा वैद्यनाथन ने दो अलग-अलग कारण बताते हुए चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखी. थिरुवरूर सीट के लिए उन्होंने कहा कि चूंकि ये विधानसभा सीट डेल्टा क्षेत्र में पड़ती है इसलिए नवंबर-दिसंबर के महीने में मानसून की वजह से वहां काफी बारिश होने की संभावना है. अगर ऐसा होता है तो पूरी प्रशासनिक मशीनरी राहत कार्यों में लगी रहेगी. इसलिए उस वक्त चुनाव करवाना ठीक नहीं रहेगा. इसी तरह थिरुप्परनकुंद्रम सीट के लिए मुख्य सचिव ने चुनाव आयोग से कहा कि वहां की सीट से हारने वाले डीएमके उम्मीदवार पी सरवनन ने मद्रास हाईकोर्ट में एके बोस के नॉमिनेशन गलत होने के आधार पर मामला दर्ज करवाया था. कोर्ट ने मामले की सुनवाई की तारीख 23 अक्टूबर रखी थी. ऐसी स्थिति में चुनाव की तारीख को नोटीफाई करना हाईकोर्ट की शक्तियों का अतिक्रमण करने जैसा होगा.

चुनाव आयोग द्वारा मुख्य सचिव की सलाह को मान लेना उस घटना से बिल्कुल अलग था जिसमें तत्कालीन गवर्नर के रोसैया ने मई 2016 में चुनाव आयोग को थंजावुर और अरावकुरुचि सीटों पर लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए तुरंत चुनाव कराने की सलाह दी थी.

इन दोनों सीटों पर मई 2016 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के साथ बड़ी मात्रा में पैसे बांटे जाने की खबर के चलते चुनाव नहीं हो पाया था. संयोग से थंजावुर, अरवाकुरुचि और थिरुप्परनकुंद्रम में पूर्वोत्तर मानसून के समय ही 19 नवंबर 2016 को चुनाव करवाए गए थे. उस वक्त एआईएडीएमके सरकार ने भारी मानसून का हवाला देकर चुनाव टालने की मांग नहीं की थी.

इसके बाद उसी साल दिसंबर के मध्य में चेन्नई के तट पर वरदा चक्रवात आया. काफी संभावना है कि उस वक्त चुनाव न करवाने की सलाह सिर्फ एआईएडीएमके सरकार द्वारा सिर्फ इसलिए नहीं दी गई थी क्योंकि जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने की वजह से लोंगों की सहानुभूति उनके साथ थी.

वर्तमान परिस्थितियों में ज़ाहिर है कि अगर अभी चुनाव टलता है है तो दोनों द्रविड़ियन पार्टियों एआईएडीएमके और डीएमके के फायदे में है. एआईएडीएमके के विरोधी गुट के नेता टीटीवी दिनाकरन थिरुप्परनकुंद्रम में लीड लेने में अगर सफल रहते हैं तो पलानीस्वामी और एम के स्टालिन दोनों के लिए ये काफी शर्मनाक स्थिति होगी.

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दरअसल, थिरुप्परनकुंद्रम तमिलनाडु के मदुरई ज़िले में है. यहां थेवर जाति की संख्या काफी अधिक है. एआईएडीएमके अगर यहां हार जाती है तो ये पन्नीरसेल्वम के लिए काफी शर्मनाक होगा क्योंकि वो दक्षिणी तमिलनाडु के काफी मज़बूत नेता माने जाते हैं. जबकि स्टालिन के लिए उनके भाई एम के अलागिरी द्वारा किया जाने वाला नुकसान चिंता का विषय हो सकता है.

थिरुवरूर सीट डीएमके के लिए वैसे ही है जैसे आरके नगर एआईएडीएमके के लिए है. फिर अगर अलागिरी थिरुवरूर से लड़ते हैं और अपने पिता के नाम पर लोगों से वोट मांगते हैं तो वो डीएमके लिए नुकसानदायक हो सकता है.

मौजूदा परिस्थितियों में डीएमके में पड़ी इस फूट का विरोधी पार्टियां फायदा उठा सकती हैं और अलागिरी को डीएमके के खिलाफ भड़का सकती हैं. इसलिए डीएमके के लिए भी अच्छा है कि चुनाव को अभी टाल दिया जाए.

(लेखक जाने-माने पत्रकार हैं. विचार उनके निजी हैं.)
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