इसलिए नहीं स्वीकार हो रहा है कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इस्तीफा

इसलिए नहीं स्वीकार हो रहा है कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इस्तीफा
राहुल अड़े हैं, फिर भी इस्तीफा नहीं स्वीकार कर रही है कांग्रेस पार्टी (फाइल फोटो)

मनाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं नाकाम, राहुल गांधी अपने फैसले पर अड़े हुए हैं

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है लेकिन उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हो रहा है, ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर राहुल गांधी के बार-बार मना करने के बाद भी पार्टी उनका इस्तीफा स्वीकार क्यों नहीं कर रही है. हालांकि अब उनको मनाने की हर कोशिश नाकाम हो गई है. कांग्रेस के सूत्रों की माने तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नए अध्यक्ष की तलाश होने तक राहुल का इस्तीफा स्वीकार नहीं करना चाहता.

राहुल गांधी ने जब से अपना इस्तीफा दिया है तबसे पार्टी में नए अध्यक्ष की तलाश तेज हो गई है. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के शीर्ष नेता अंदरखाने में नए अध्यक्ष की तलाश में लगे हुए हैं, लेकिन आखिरी फैसला अब तक नहीं हो पाया है. अब तक जो नाम मीडिया में आ है उनमें पहले अशोक गहलोत और अब पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे दावेदार बताए जा रहे है. कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस के नए अध्यक्ष पर फैसला जल्दी हो जाएगा और फिलहाल सुशील कुमार शिंदे के नाम पर सहमति बनती दिख रही है.

आखिर शिंदे कैसे बने गांधी परिवार की पहली पसंद
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के लिए जो सबसे पहला नाम आया वो था राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का. लेकिन सोनिया गांधी ने उनके नाम पर सहमित नहीं दी. कांग्रेस सूत्रों की माने तो विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट आमने-सामने आ गए थे. उसके बाद सोनिया गांधी अशोक गहलोत से खुश नहीं थीं. साथ ही कांग्रेस नेतृत्व किसी ऐसे नेता को पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनाना चाहता जिसकी महत्वाकांक्षा भविष्य में गांधी परिवार के आड़े आ जाए. सीताराम केसरी एपिसोड के बाद गांधी परिवार नेता चुनने के मामले में फूंक-फूंक कर कदम रखता है. ये उस समय भी देखने को मिला जब बड़े दिग्गजों को दर किनार कर 2004 में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना.
यहां पिछड़ गए अशोक गहलोत


कांग्रेस की राजनीति समझने वाले बताते हैं कि जनता पार्टी के उदय और इमरजेंसी के बाद से ही कांग्रेस का सवर्ण और ओबीसी वोट बैंक तो आता-जाता रहा लेकिन दलित और अल्पसंख्यक फिर भी कांग्रेस के साथ रहा. 90 के दशक में स्थानीय स्तर पर दलित नेताओं के उदय के साथ उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े राज्यों के साथ-साथ दक्षिण में भी कांग्रेस का दलित वोट धीरे-धीरे खिसकता चला गया. 2019 के लोकसभा चुनावों में तो कांग्रेस को दलित और अल्पसंख्यक किसी का साथ नहीं मिला. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व सुशील कुमार शिंदे को आगे कर एक बार फिर दलित वोट बैंक को अपने साथ लाने की कोशिश में लगा है . कांग्रेस नेतृत्व को भरोसा है कि दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ के सहारे ही कांग्रेस को आगे खड़ा किया जा सकता है.

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