OPINION: बिहार में एनडीए से उपेन्द्र कुशवाहा की विदाई की इतनी जल्दबाजी क्यों हो रही है?

कहा जा रहा है कि सितंबर के आखिर में या फिर अक्टूबर के मध्य तक उपेन्द्र कुशवाहा महागठबंधन में शामिल होने का ऐलान कर सकते हैं.

फर्स्टपोस्ट.कॉम
Updated: September 7, 2018, 2:12 PM IST
OPINION: बिहार में एनडीए से उपेन्द्र कुशवाहा की विदाई की इतनी जल्दबाजी क्यों हो रही है?
कहा जा रहा है कि सितंबर के आखिर में या फिर अक्टूबर के मध्य तक उपेन्द्र कुशवाहा महागठबंधन में शामिल होने का ऐलान कर सकते हैं.
फर्स्टपोस्ट.कॉम
Updated: September 7, 2018, 2:12 PM IST
(विवेक आनंद)

बिहार में सीट शेयरिंग को लेकर बाकी चाहे जो पेंच हो. एक बात बिल्कुल साफ तौर पर कही जा रही है कि आरएलएसपी को एनडीए गठबंधन में रहते हुए 2-3 सीटों से ज्यादा नहीं मिलने वाली हैं. अब इतनी सीटों पर आरएलएसपी मानने वाली नहीं, इसलिए वो महागठबंधन में जाने को तैयार है.

राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से ये करीब-करीब तय जान पड़ता है कि एनडीए के भीतर मौजूदा स्थिति में आरएलएसपी की कोई जगह बनती नहीं है. पार्टी ने जिस तरह से पिछले दिनों विस्तार किया है और जिस तरह के दावे कर रही है, उसमें वो खुद को जेडीयू से किसी भी तरह से उन्नीस मानने को तैयार नहीं है. सो परिस्थिति ऐसी बन पड़ी है कि एक म्यान में एक ही तलवार जा सकती है या तो नीतीश जाएं या उपेन्द्र कुशवाहा. अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि सितंबर के आखिर में या फिर अक्टूबर के मध्य तक उपेन्द्र कुशवाहा महागठबंधन में शामिल होने का ऐलान कर सकते हैं.

ये भी पढ़ेंः कुशवाहा की 'खीर' का भाजपाई जवाब - वे खीर नहीं बनाते, सब्जी उगाते हैं

सीट शेयरिंग पर अभी तक न बीजेपी की तरफ से कोई आधिकारिक बयान आया है और न जेडीयू की तरफ से. लेकिन एक बात तय मान ली गई है कि आरएलएसपी की बीजेपी के साथ यारी बस यहीं तक थी. सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों है? आरएलएसपी की तरफ से तो ऐसा कहा नहीं गया है कि वो एनडीए से बाहर जाने वाली है. हर बार आरएलएसपी और उपेन्द्र कुशवाहा ने यही कहा है कि वो एनडीए का हिस्सा हैं और नरेंद्र मोदी को 2019 में भी पीएम बनाने के लिए जी जान से लगे हुए हैं. फिर आरएलएसपी को लोग एनडीए से बाहर निकालने पर क्यों तुले हुए हैं?

दरअसल उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी ने कम वक्त में ही बिहार के साथ राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी लोकप्रियता हासिल कर ली है. इसकी वजह उपेन्द्र कुशवाहा की मौके की नजाकत भांपकर फैसले लेना और एक चालाक राजनेता की तरह बयानबाजी से माहौल बनाकर मीडिया में बने रहना है. वरना पार्टी को दिन ही कितने हुए हैं राजनीति के मैदान में आए हुए.

उपेन्द्र कुशवाहा कभी नीतीश कुमार के करीबी थी. फिर बगावत कर 2013 में राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (RLSP) नाम से नई पार्टी बना ली. 2013 में नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की पीएम पद की उम्मीदवारी के विरोध में एनडीए से अलग हो गए. और एनडीए में उनकी कमी को पूरा करने के लिए बिल्कुल सही मौके पर उपेन्द्र कुशवाहा ने प्रवेश पा लिया.
Loading...


2019 में मोदी लहर में चमकी उपेन्द्र कुशवाहा की किस्मत
उपेन्द्र कुशवाहा को बिहार की तीन लोकसभा सीटें सीतामढ़ी, काराकाट और जहानाबाद की मिली और पार्टी ने तीनों ही सीटें जीत ली. जबकि एनडीए से अलग होकर लड़ी जेडीयू को सिर्फ 2 सीटें हासिल हुई. मोदी लहर में जीती इन्हीं 3 सीटों की बदौलत उपेन्द्र कुशवाहा ने अचानक ही राष्ट्रीय स्तर की चर्चा बटोर ली. एनडीए ने अपने इस छोटे साझीदार को मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री का पद देकर उनके कद को थोड़ा और बढ़ा दिया, आखिर पीएम मोदी के नाम पर बिदके नीतीश कुमार को थोड़ा सबक भी सिखाना था. इस पूरे घटनाक्रम ने उपेन्द्र कुशवाहा को वो दे दिया, जिसकी बदौलत वो नीतीश कुमार और जेडीयू को आंखे दिखाने का हौसला ला सके. 3 में से 3 लोकसभा सीटों की टैली को उपेन्द्र कुशवाहा आज तक भुना रहे हैं.

ये भी पढ़ेंः इस बड़े नेता के कारण उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार के बीच आई दरार

हालांकि आरएलएसपी की तरफ से पार्टी के विस्तार को लेकर कुछ दावे भी किए जाते हैं. पार्टी के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ सुबोध कहते हैं कि पिछले दिनों जेडीयू जितनी कमजोर हुई है आरएलएसपी उस मुकाबले उतनी ही ताकतवर हुई है. वो कहते हैं, ‘जब हम कुछ नहीं थे तो गठबंधन में हमें तीन सीटें मिली थीं. अब देखिए इस दौरान हमारी पार्टी तो मजबूत हुई है लेकिन जेडीयू कमजोर पड़ी है. नीतीश कुमार के साथ पहले कुशवाहा समाज के नेता नागमणि ने साथ छोड़ा, फिर उपेन्द्र कुशवाहा पार्टी से निकले, जीतनराम मांझी ने भी साथ छोड़ दिया, फिर शरद यादव भी अलग हो गए. इन चारों ने चार पार्टियां बनाई. जेडीयू से निकलकर बनी इन चार पार्टियों की वजह से जेडीयू तो पहले ही कमजोर हो गई है. और हम जहां 2013 पर खड़े थे. वहां से काफी आगे निकल चुके हैं.’

लेकिन बात इतनी भर नहीं है. सवाल है कि अगर 2014 में पूरे देश में मोदी लहर नहीं होती तो क्या उपेन्द्र कुशवाहा अपनी बदौलत 2014 के चुनाव में 3 सीटें ला पाते? अगर यही बात थी तो आरएलएसपी 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में ऐसा ही शानदार प्रदर्शन क्यों नहीं दोहरा पाई? 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव भी आरएलएसपी ने एनडीए के छत्रछाया तले लड़ी. पार्टी ने 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन सिर्फ 2 सीटें हासिल कर सकी.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू और आरजेडी ने महागठबंधन बनाया था. इस महागठबंधन में जेडीयू और आरजेडी के साथ समाजवादी पार्टी, जेडीयू सेक्युलर और आईएनएलडी जैसी सारी समाजवादी पार्टियों ने महागठबंधन बनाया था. डॉ सुबोध कुमार कहते हैं कि 2015 के चुनाव के लिए सिर्फ हमारे अकेले की बात क्यों की जाए? 2015 में एनडीए के सभी पार्टियों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए बयान को लालू यादव ने अच्छे से भुना लिया. जिसकी वजह से एनडीए को नुकसान पहुंचा. खामियाजा हमें भी उठाना पड़ा.



आरएलएसपी अपने लिए बड़े राजनीतिक जमीन की तलाश में है
आरएलएसपी किसी भी तरह से अपने को कम नहीं आंक रही है. और मौजूदा हालात में एनडीए में ऐसी परिस्थिति दिख नहीं रही है कि उसे 2 से ज्यादा सीटें मिल पाए. उपेन्द्र कुशवाहा ने जिस तरह माहौल को भांपते हुए 2014 में बड़ा फैसला लेकर बड़ा दांव मारा था. 2019 में इस प्रयोग के दूसरे चरण की शुरुआत कर सकते हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और आरएलएसपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दसई चौधरी कहते हैं, ‘सीट शेयरिंग को लेकर एनडीए के सभी दलों की बैठक होगी. जब तक बैठक नहीं होती है तब तक सीट शेयरिंग के किसी भी फॉर्मूले वाली खबर को तरजीह देना बेकार की बात है. जहां तक आरएलएसपी की बात है तो पिछली बार हमने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा थे और तीनों ही सीटों पर जीत हासिल की थी. अब हमारी पार्टी बड़ी हुई है हमारी ताकत में विस्तार हुआ है. अब हमें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम मोदी से उम्मीद है कि वो हमारी बढ़ी हुई ताकत के आधार पर सीटें देंगे.’

ये भी पढ़ेंः इस बड़े नेता के कारण उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार के बीच आई दरार

हालांकि ये समझा जा सकता है कि बीजेपी जेडीयू और आरएलएसपी को एक ही पलड़े पर रखकर क्यों तौलेगी? निश्चित तौर पर जेडीयू के आगे आरएलएसपी को अभी लंबा सफर तय करना होगा. इस बीच बीजेपी की तरफ से कुशवाहा वोट बैंक को दुरुस्त करने के लिए उपेन्द्र कुशवाहा के एक विकल्प की तलाश भी कर ली गई है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कहा जा रहा है कि उपेन्द्र कुशवाहा के एनडीए से अलग होने की स्थिति में बीजेपी सम्राट चौधरी को आगे करने वाली है.

सम्राट चौधरी कुशवाहा नेता हैं और पहले राबड़ी देवी फिर जीतनराम मांझी के सीएम रहने के दौरान मंत्री रह चुके हैं. सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज के बड़े नेता रहे शकुनी चौधरी के बेटे हैं. बीजेपी अब उनको आगे रखकर कुशवाहा वोटर्स को लुभाने के फेर में है. सम्राट चौधरी लालू यादव और नीतीश दोनों के साथ काम कर चुके हैं.

ये भी पढ़ेंः समय आने पर करेंगे PM मोदी के विरोधियों के नामों का खुलासा - कुशवाहा

तमाम राजनीतिक विश्लेषणों में एनडीए के भीतर आरएलएसपी के लिए बड़ी ही सीमित जगह छोड़ी गई है. हालांकि आरएलएसपी की तरफ से कहा जा रहा है कि एनडीए से पार्टी के बाहर जाने की बात मीडिया के जरिए कुछ लोग प्लांट कर रहे हैं. एनडीए के भीतर न बीजेपी, न एलजेपी और न जेडीयू का ऐसा रुख है. एनडीए के बैठक होगी तो ऐसे सारे मुद्दों पर बातें साफ हो जाएंगी.
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर