सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जश्न मनाते हुए सावधानी क्यों बरते आम आदमी पार्टी?

अनिल बैजल और अरविंद केजरीवाल  (फाइल फोटो -  PTI)

अनिल बैजल और अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो - PTI)

मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली विधानसभा संघ सूची के अंतर्गत कानून व्यवस्था के मामलों और राज्य सूची से भूमि पर कानून नहीं बना सकती है.

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सिद्धार्थ मिश्रा



आम आदमी पार्टी को सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सावधानी के साथ बड़ी राजनीतिक जीत के तौर पर जश्न मनाना चाहिए. फैसले ने कम शब्दों में राज्य की कार्यकारी शक्तियों को जोड़ते हुए निर्वाचित सरकार का समर्थन किया है. 3 ऐसे बिन्दु हैं जिन पर विचार किया जा सकता है जो संक्षेप में दिल्ली सचिवालय और राजनिवास के बीच किसी भी भौतिक परिवर्तन की अनुमति नहीं देंते. ये तीन बिन्दु हैं-



A) सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 9 जजों की बेंच के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसने दिल्ली के पूर्ण राज्य की मांग को खारिज कर दिया.





B) इसने दिल्ली विधानसभा की सीमित शक्तियों को बढ़ाया नहीं है.
C) सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को अलग नहीं किया है, जिसने 21 मई, 2015 की एमएचए अधिसूचना को बरकरार रखा था.



इस मामले में बहुमत के फैसले को देखते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा, "पहले नौ जजों के फैसले को देखते हुए दिल्ली में पूर्ण राज्य की शक्तियां नहीं हो सकतीं."



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अपने अलग लेकिन सहमति वाले फैसले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, "निर्णय लेने का वास्तविक अधिकार चुनी हुई सरकार को होता है. वे विधायिका की जिम्मेदारी लेते हैं. दिल्ली की विशेष स्थिति और दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी के रूप में मौलिक चिंताओं पर विचार करना होगा.'' राज्य की राजनीति के साथ और राष्ट्रीय राजधानी के रूप में दिल्ली की विशेष स्थिति को कायम रखने के साथ ही आदेश ने आप के लिए हाल ही में लॉन्च किए गए राजनीतिक अभियान को खारिज कर दिया.



अगला बिंदु जिसकी जांच की जानी चाहिए, वह यह है कि क्या दिल्ली विधानसभा की कानून बनाने की शक्तियों में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ जोड़ा है? बुधवार को इस मामले में दिए गए बहुमत के फैसले ने कहा, "विधायी विधानसभा की कार्यकारी शक्तियां अपनी विधायी शक्तियों के साथ सह-अस्तित्व में हैं. केंद्र सरकार के पास भूमि, पुलिस और सार्वजनिक आदेश पर विशेष शक्ति है. स्वतंत्रता की कुछ आवश्यक सीमा दिल्ली सरकार को दी जानी चाहिए. लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल मंत्रियों की परिषद के कार्य और सलाह से बंधे हैं. जब तक संविधान की अनुमति ना हो लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकते. "



मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली विधानसभा संघ सूची के अंतर्गत  कानून व्यवस्था के मामलों और राज्य सूची से भूमि पर कानून नहीं बना सकती है. इस व्यवस्था के तहत, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम, दिल्ली पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण का प्रमुख लेफ्टिनेंट गवर्नर को बनाता है.



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बुधवार के आदेश के जरिए इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश नहीं की गई है. सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के जरिए दिल्ली सरकार एंटी करप्शन ब्रांच को अपने तहत नहीं ला सकती, साल 1990 से दिल्ली पुलिस का हिस्सा है. लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री को सौंपी है.



सुप्रीम कोर्ट का आदेश कानून बनाने की प्रक्रिया पर भी चुप है. सभी विधेयकों वित्तीय  को दिल्ली के कैबिनेट द्वारा पारित होने से पहले गृह मंत्रलाय द्वारा मंजूरी लेनी होगी और बाद में दिल्ली विधानसभा में पेश किया जाएगा. इस तरह के विधेयक उसी नियम का पालन करना जारी रखेंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 21 मई, 2015 की गृह मंत्रालय की अधिसूचना को खारिज नहीं किया है. यह दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले की आलोचना नहीं करता और इसे बरकरार रखा गया है.



जस्टिस अशोक भूषण ने अपने अलग फैसले में कहा, "इस प्रकार, हमारा विचार है कि 1991 के अधिनियम और 1993 के नियमों में मंत्री मंत्रिपरिषद / मंत्री द्वारा (एलजी के लिए) उनके कार्यकारी निर्णयों के पूरे तरीके और प्रक्रिया को शामिल किया गया है, और कार्यान्वयन और पूरे प्रशासन को उसी अनुसार चलाने के लिए है.1993 के नियम कहते हैं कि मुख्य सचिव और संबंधित विभाग के सचिव इन नियमों के सावधानीपूर्वक पालन के लिए अलग-अलग जिम्मेदार हैं और जब उनमें से कोई भी मानता है कि कोई भौतिक प्रस्थान हुआ है, तो वह इसे प्रभारी मंत्री , मुख्यमंत्री और एलजी की जानकारी में लाएगा.



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मुख्य न्यायाधीश ने अपना आदेश देने के दौरान सही कहा, 'किसी को भी यह महसूस नहीं करना चाहिए कि उसे बहुत महत्व दिया गया है.. आपसी सम्मान जरूरी है.'
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