OPINION: क्यों Section 377 के खिलाफ फैसला सुना सकता है सुप्रीम कोर्ट?

9 जजों की पीठ में ज्यादातर जजों ने ये माना था कि भले ही इसका असर कुछ लोगों पर पड़े लेकिन निजता का अधिकार देने से मना नहीं किया जा सकता है.

Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 2:48 PM IST
OPINION: क्यों Section 377 के खिलाफ फैसला सुना सकता है सुप्रीम कोर्ट?
इलस्ट्रेशन (NEWS18)
Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 2:48 PM IST
निजता के अधिकार पर 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने सुनवाई करते हुए माना था कि सेक्स लोगों का निजी मामला (right to privacy) है और हर किसी को अपना 'सेक्स' पार्टनर चुनने का अधिकार है. बेंच ने आगे कहा कि गोपनीयता/निजी मामला है जिसमें व्यक्तिगत स्तर पर नजदीकियां, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी, प्रसव, घर और सेक्सुअल ओरिएंटेशन शामिल है. 'निजता' मौलिक अधिकार है. इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट 'गे सेक्स' को अपराध की श्रेणी से बाहर रख सकता है.

9 जजों की संवैधानिक पीठ ने साफ-साफ कहा था कि निजता का अधिकार और सेक्सुअल ओरिएंटेशन की रक्षा मौलिक अधिकार में आता है. संविधान की धारा 14, 15 और 21 के तहत इन सारी चीज़ों की गिनती मौलिक अधिकार के तहत होती है.



ऐसे में सुप्रीम कोर्ट Section 377 पर फैसला LGBTQ कम्युनिटी के हक में सुना सकता है. आमतौर पर न्यायिक प्रकिया में देखा गया है कि बड़ी बेंच या फिर संवैधानिक पीठ ने छोटी बेंच के लिए उदाहरण पेश किया है. ऐसे में छोटी बेंच फैसलों को लेकर परंपरा निभा सकती है.

यानी पांच जजों की बेंच, जिसे Section 377 पर फैसला सुनाना है वो 9 जजों की संवैधानिक पीठ के फैसले को मानने के लिए बाध्य होंगे. ऐसे में पांच जजों की बेंच भी सेक्सुअल ओरिएंटेशन और निजता के अधिकार को लेकर वहीं बातें कह सकते हैं जो संवैधानिक पीठ ने कही थीं.

इतना ही नहीं साल 2013 में निजता के अधिकार केस को लेकर 9 जजों में से 5 ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को हरी झंडी नहीं दी थी जिसमें Section 377 को फिर से अपराध की श्रेणी में रखा गया था.

9 जजों की पीठ में ज्यादातर जजों ने ये माना था कि भले ही इसका असर कुछ लोगों पर पड़े, लेकिन निजता का अधिकार देने से मना नहीं किया जा सकता है. बेंच के मुताबिक इसका असर संवैधानिक अधिकारों पर नहीं पड़ता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले को संसद को भी सौंपने से मना कर दिया था. कोर्ट ने ये सुनिश्चित किया कि किसी के मौलिक अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए. अगर ऐसा हो रहा है तो उस कानून को खत्म कर दिया जाना चाहिए.
Loading...

ऐसे में ये लग रहा है कि Section 377 को सुप्रीम कोर्ट अपराध की श्रेणी में नहीं रखेगा.

ये भी पढ़ें:

समलैंगिकता पर क्यों बंटी है दुनिया!

मॉब लिन्चिंग पर सोशल मीडिया साइट्स के टॉप अफसर होंगे जिम्मेदार? बनेगा सख्त कानून
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...